Wednesday, December 2, 2020

लघुकथा मायका

 रमा इकलौती लड़की थी तीन भाइयों में घर उसकी एक इशारे पर हर चीज हाथों पर उपलब्ध हो जाती थी मम्मी पापा और भाई भोजाई सबकी चहेती की रामा रमा की उम्र धीरे-धीरे बढ़ने लगी अब वह विवाह के योग्य हो गई थी तो सभी को चिंता सताने लगी पता नहीं रमा को ससुराल कैसी मिलेगी वह ससुराल में एडजस्ट होगी कि नहीं आंखें बहुत दिनों बाद अच्छा रिश्ता होने पर रमा का विवाह कर दिया गया रमा कुछ दिन ससुराल में रही तो पता चला

             यहां तो सब मायके से विपरीत था यहां हर कोई उसे हर काम के लिए मना कर देता था प्रेम करना की वह तुझे बहू नहीं बेटी के समान रखें परंतु रमा को कुछ ऐसा होते हुए नहीं दिख रहा था एक दिन वह सूटकेस के साथ मायके आ गई  और मां से बोली  मां मैं कह कर आई हूं अब कभी ससुराल नहीं जाऊंगी वहां मेरा कोई सुनता ही नहीं है बहुत दिनों तक देखा

वहा तो उन लोगो मेमकोई परिवर्तन नही है तभी बाबूजी देखो बेटा रामा ससुराल और मायके में जमीन आसमान का अंतर होता है हम पहले ही बता रहे थे बेटा अरे बाबूजी यह सब मां का किया धरा है न लाड पयार से बिगाडती न रमा  बिगड़ती  हर एक रमा को सीख दे रहा था तभी बाबू जी बिटिया तुम वहां के लोगों को थोड़ा सनेह देकर  देकर तो देखो उनकी सेवा तन मन से   करके तो देखो मेरी तुम्हें उतना ही प्रेम करेंगे जितना कि हम करते थे अब रमा कि वह पूछ परख मायके में नहीं थी जो पहले थी 

                    हर एक रमा के काम को अनसुनी कर रहा था यहां तक की यहां तक कि काका भी अब रमा को सीख देने लगे थे बेटी विवाह के बाद ससुरा ही सब कुछ होता है जीना मरना सब ससुराल में होता है मायके तो बस अधिक होता है बिटिया बस उन्हें तुम अपना समझ कर देखो और अपने बाबूजी और माई के समान उनकी सेवा कर के देखो बिटिया वो सब तुम्हें अपने बाबूजी और मां से ज्यादा प्रेम करें रमा को अब लगने लगा था कि उसकी वह पूछ परख अब मायके में नहीं है जो पहले थी यहां तक कि छोटू भी कह देता था दीदी जीजाजी के फोन जब रोज जाने के आ रहे हैं अब मैं समझ सकती हूं कि ससुराल ही मेरा असली घर है 

                वहां की सब मेरे ही मैं तन मन से सेवा करके सभी को अपना बना लूंगी रमा के परिवर्तन में ससुराल का नया रास्ता खोल दिया था और रामा का मायका रमेश बाबू और अम्मा की खुशियों के पीछे काफी दूर छूट गया था! 

Thursday, November 19, 2020

लघु कथा

 लघुकथा कपटी 


मोहन सफेद धोती पीला  कुर्ता पहने पीला  गमझा कंधे  पर डाले और माथे पर चंदन का तिलक और टोपी  लगाकर जब घर से निकलता था तो रास्ते मे जो भी मिलते सबसे राधे राधे कहता जाता था बड़ा ही ही विनम्र स्वभाव से एकदम साधू पुरूष दिखाई देता था


          मगर जब भी वह मंगो बाई के घर के सामने से गुजरता तो मंगो बाई का मुंह चालू हो जाता कपटी कुटिल बगला भगत मुह मै राम बगल मे छुरी बड़ा भगत बनता है हरामी नामाकूल नरक मे भी जगह नही मिलेगी सब समझता है भगवान तेरी भक्ति को मुआ मरे तेरी पुसते भोगेगी


             मंगो के सामने वहभी चालू हो जाता बुढिया मरेगी सड सड कर के कोई पानी वाला भी नही मिलेगा जा पापिनी चांडालनी कुलटा न जाने क्या क्या

बहुत दिनो तक यही चलता रहा आखिर ऐक दिन ऐपिसोड होनै के बाद मै मंगो के पास गया अम्मा तुम ऐसा क्यों कहती हो अरे बेटा मेरे पति के  पुरखो  की जमीन जायदाद सोने चांदी के गहने  लील गया मुझे झोपड़ी मे रहने को मजबूर कर दिया कुछ हजार रूपये का बयाज लेकर सब खतम कर दिया काका दादा की संपत्ति हडप कर गया और कयाबताऊ बेटा हर गरीब की प्रापरटी पर फन लगाए बैठा है कमबख्त भगत नही बगला भगत है कपटी

अम्माँ फिर चालू हो ग ई थी तो बंद होनै का नाम नही ले रही मै चुपचाप बैठा सोच रहा था यदि भगवान ऐसे भकतो का साथ देता है फली भूत  सुख संपन्न करता है तो फिर लाचार अम्माँ जैसो का धयान रखने वाला भगवान कहा है...........

मनोज दुबे श्रीकांत

व्यंग

 करवा चौथ के बाद 


कल के वृत  के बाद पत्नी

 ऐसी बरसी

जो लगी कही बिजली कडकी

कल का प्यार गुस्सा बन बरस रहा था

और मै मन ही मन अपनी

गलती खोज रहा था

उसकी कल  की आवभगत

की बात मेरे पहले ही गले

 नही ऊतर रही थी करवा चौथ

की न जाने कोन सी गलती

आज भारी पड रही थी

सोच रहा था

रात नौ बजे तक के हर ऐक

काम लिस्ट के अनुसार किए  थे

जो जो काम कहे थे

एक एक सब किए  थे

  साड़ी के साथ गिफ्ट मिठाई भी

लाना नही भूला था फिर भी पत्नी

 का मुह आज गुस्से से  क्यो फूला था

कल के स्वादिष्ट भोजन पकवान

और ढेर सारे प्रेम की

बाते हवा हो रही थी

पत्नी न जाने कौन सी बात पर

आग बबूला हो रही थी आज

 तो जनाब बमुश्किल ही

चाय मिल पाई है रोटी

सबजी  न जाने कब

कहा नसीब पाई है कल की

 सरलता सहजता  की

शांति मेरी गृहस्थी को भारी

पड़ रही थी और भाई साहब

मेरी गृहस्थी करवा चौथ के बाद

 के तुफान से गुजर  रही थी


मनोज दुबे श्रीकांत

लघु कथा

व्यंग

 आन लाईन कलास का पंगा 


कल आन लाईन कलास मे

 हमने कैमरा आन करने का

 बोला कुछ छातरो का

 मन भय से डोला

 पंद्रह बीस छात्रों मे से

 क ईयो ने कैमरा नही खोला

दो चार छात्रों मे जिनने खोला

उनमे से किसी का

भाई बहन ही बोला

 ऐक छात्र की लिंक पर

उसका पेरेंट आ गया

मेऔर मेरे से ऊल जूलूल

बाते कहने लगा

विगत पंद्रह दिनो

 से मै ही बच्चे की

कलास जवाईन कर रहा हूँ

और आन लाईन कलास के

नेटवर्क मे उलझ रहा हूं

कभी कुछ समझ  नही आता है

 मेडम सर क्या पढा रहे है 

दिमाग मे नही आता है 

 और तो और आजकल स्कूल

प्रशासन फीस पर

दवाब बना रहा है

शिक्षको को पेमेंट देने

की बात बता रहा है

पर सर जी हमे पता है विदयालय

आपको कितना वेतन दे रहा

लाक डाऊन का भार हम

और आप पर एक सा पड रहा है

फीस जमा नही करने पर 

 बच्चे को आन लाईन

 कलास से भगा रहा है

वो तो आप ने कैमरा

आन करवा के

सबको आज देख लिया

वर्ना गुडडू उनके दोस्तो को

  बुला  रहा था

 और मैदान पर क्रिकेट क्रिकेट

 खेलने की बोल रहा था

अभी अभी आपकी कलास के

 तीन बच्चे मेरे घर

पर बतिया रहे है

और उनके  भाई

बहन कैमरा आफ

कर आन लाईन कलास

जवाईन रहे है

 सर जी लाकडाऊन मे

 हाफ पेमेट का दर्द हम

 भी समझ रहे है

 पर बच्चे तो बच्चे भाई बहन

 पेरेंट सभी आन लाईन

कलास सेत्रस्त हो रहे है

इस आन लाईन व्यवस्था ने

बच्चो को इंटर्नेट का कीडा बना दिया है

 पढना बढना रहा ऐक तरफ

पूरा फेसबूकिया बना दिया है

 मोबाईल हमारै घर मे कलेश

 का कारण बन गया है

 और सर जी  आजकल

हमारा बेटा हमारा ही बापबन गया है

 अब इस ताम झाम को

यही बंद कर दीजिए और सकूल

खोल कर  हमारे बच्चे को वही

अनुशासित शिक्षा और

 उज्जवल भविष्य दीजिए

 हमे पता है हमारे बच्चो को

आपकी रोक टोक डाट डपट

सजा दंड  और अनुशासन के

साथ सीखता है घर पर वो कहा

किसी की सुनता है किताब के

साथ साथ बसता कई दिनो से

 बंद पड़ा और मेरे बच्चे का

उज्जवल भविष्य केवल

मोबाइल पर ही अडा है

  सर जी हम आपकी साल

भर की  पूरी की

 पूरी फीस भर देगें

सर  गरआप हमे इस

 आन लाईन कलास की

मुसीबत पीछा छुड़ा देंगे 


मनोज दुबे श्रीकांत

गजल

 तुमहारी मुस्कुराहटो से 


तुम्हारी मुस्कुराहट से ही  सब धन बरस जाता है

मेरा घर आंगन कौना कौना खुशियों से भर जाता है


तुम लक्ष्मी अन्नपूर्णा सी  जब मेरे घर मे रहती हो

 मेरे घर का अन्न धन का   सारा भंडार भर जाता है


हीरे  जवाहरात सोने चांदी रत्न सब फीके पड जाते

 सरल सहज सौम्य तुम्हारा व्यवहार झलक जाता है


धन दौलत सुख संपन्नता ऐश्वर्य सब कुछ ही तुम हो

तुमहारे साथ होने से सब कुछ सहज मिल जाता है


क्या  दशहरा दीपावली  होली   या और कोई त्यौहार

तुम्हारी खुशियों से ही मेरा हर दिन उत्सव  हो जाता है


प्रिय तुम हो श्रीकांत के संग तो कोई गम नही और 

सुख दुख चाहे हो जीवन मे सब  सूकून से गुजर जाता है 


मनोज दुबे श्रीकांत

दिवाली

दीपावली व्यंग

 रात का सपना 


कल रात को दीपावली की

पूजा के बाद जब मे सोया

गहरी नींद मे सपनो मे खोया

तो एक अजीब सपना आया

 लक्षमी जी का वाहन उललू आया

कहने लगा भैया तुम लक्ष्मी

 जी के आने के चककर मे

अपने हाथ की लक्ष्मी गवा देते हो

साफ सफैयत लीपा पोती

सजावट लड़ पटाखा मे

कितने रूपये गवा देते हो

इसी खर्चे को लेकर धन तेरस से

दीपावली तक अक्सर तुममे और

तुमहारी पतनी मे खटक जाती है

और भाई साहब अपने घर की

 लक्ष्मी माता लक्षमी की

प्रसन्नता की खातिर रूठ जाती है

पहले अपनी अपनी गृह लक्ष्मी को

 मनाया कीजिए वो जो बोले

 वो वो ही किया कीजिए

 कयोकि श्रीमन शास्त्र भी

झूठ नही बोलते  हैं  जहा रहती है

पत्नी प्रसन्न वही देवता रमते है

 धन दोलत सुख ऐश्वर्य

सब कुछ सहज ही मिल जाता है

और भाई साहब पत्नी की

प्रसन्नता से और माता लक्ष्मी का वरदान भी

फल जाता है

मैने कहा उललू महाराज आप

बिलकुल सही फरमा रहे है

माता लक्षमी का इंतजार है

हमे आखिर कब बुला रहे है

तभी मेरी आखो के सामने

 बहुत तेज प्रकाश छा गया।

माता लक्ष्मी का मुस्कुराती

 छवि का दीदार हो गया

फिर उनहोने मुझे धन धान्य

 सुख संपन्नता का वर तो दिया

पर जाते जाते मेरा मन खट्टा कर दिया

कहने लगी गृह लक्ष्मी को खुश

 रखोगे तो दीपावली पर मेरी कृपा

सहज ही पा जाओगे

और घर लिपाई पुताई लड़ बम पटाखा

मिठाई नए कपडे लतते के

खर्चे से बच जाओगे ऐसा सुनकर 

मेरा सपना टुट गया और मेरा

मन पतनी को खुश रखने की उधेडबुन मे लग गया

पत्नी को हर वक्त खुश रखना टेढ़ी खीर लग रहा था

दीपावली के  सारे खर्चे का बोझ

 उससे कही हलका लग रहा था 


मनोज दुबे श्रीकांत होशंगाबाद

कुत्ता व्यंग्य

 तैसार होते देख


कल हमे तैयार होते

 देख कुत्ता गुरराया

बहुत दिनो बाद सकूल 

जा रहे हो फरमाया

क ई दिनो से  लाकडाऊन मे 

पडे पडे खा रहे थे

घर मे पत्नी बच्चो 

को टोक रहे थे

रात भर तुम्हारे घर की 

रखवारी के बाद

दिन मे दिन मे सोना 

मुशिकल कर रहे थे

तुम्हारे स्कूल जाने से मेरा

 भी जायका बदल जाएगा

और बहुत दिनो से रुखी रोटी से

 कुछ अचछा मिल जाएगा

तुमहारी आधी पीएमएस से 

घर खरच नही चल रहा है

भाभी जी और तुम्हारी 

बहस मे मेरा टेंशन बढ रहा है

भगवान करे अब तुम्हारे 

सकूल कभी बंद न हो

और थरटी फिफटी 

पेमेंट से जलदी ही फुल हो

मैने कहा गांव बसा नही 

और लुटेरो सी नजरे गढा रहा है

अभी सकूल को निकला 

नही तू नजर लगा रहा है

दुबे जी नजर नही ये बंदा 

भैरव के रूप मे आशीर्वाद दे

 रहा है और करोना लाकडाऊन 

फिपटी थरटी पेमेंट का  वक्त 

अब जा रहा है ईश्वर तुमहारे

 रोजगार वेतन को सलामत 

रखता रहे 

और तुमहारे   

दुशमनो का मुह काला  करता रहे

मनोज दुबे श्रीकांत

आदत गजलय

 आदत


तेरी आदत ही कुछ ऐसी थी कि मै बदल न सका

 अपने आप को तुझमे कभी खुद को  ढाल न सका


बगावती तू था दुर्जन  जलता मन ही मन मुझसे

तरककी को मेरी तू  कभी पेट  मे पचा न सका


बदलने को कोशिश की बहुत कि तुझे बदल दू 

दुर्जन से तुझे सज्जन कभी मै बना न सका


तेरे शबदो का कोई ईलाज बचा नही था पास मेरे 

चाहकर भी मै मन से  कभी तुझे माफ न कर सका


क्या कहे श्रीकांत तुझे जालसाज नमक हराम

तु काला धब्बा का दोष  कागज से मिटा न सका


मनोज दुबे श्रीकांत

लघु कथा

 लघुकथा मुआवजा

अरे राम भैया नर्मदा मैया की बाढ उतरे महीना हो गए जा तुम्हरी टपरिया की मरम्मत अब तक काहे नही भ ई ठंड और धूप मे पडे रहोगे तो बीमार पड जाओगे अब का बताए भैया सोच रहे है नर्मदा मैया को तनक प्रसाद मिल जातो तो टपरियां सुधार लेतो सुनो है कल तहसील से बाबू आर रहे है इनसपेकसन काजे नुकसान को पता लगाए सोच रहो है देख जाते लिख के ले जाते कछु ब ई आस मे बैठे पननीऊ चददर तान के और का इंतजार कर रहे है

कुछ महीने बाद अरे कक्का अब तो ठंड ई आ ग ई अबे तक न ई करी मरम्मत शीत लहर चलन लगी अब बैटा सोच रहे थे कि मिल जातो कछु सरकार से नुकसान को अरे कक्का मुआवजा हा बेटा और का वो तो बटे कजन कित्ते दिन हो गए दो महीना हो ग ए बटे सब शहर मे बट गयो तुम्हे नही मिलो कल तहसील मे जाके मिल ल ईयो बाबू सेआधार कार्ड ले जाके

अगले दिन कक्का आफिस मे ही मिल ग ए बेटा दिखवाए ले हमार मुआवजा को का भयो

फाईल मे देखते ही जब पढ के बताया तो कक्का के होश उड ग ए फाईल मे लिखा

था नर्मदा के एप्रोच क्षेत्र के अतिक्रमण पर किसी प्रकार का मुआवजा देय नही होगा.......

कक्का की टपरियां पर कल काम जोर शोर से चल रहा था और मुआवजा लेने का सपना फटी पनी सा दूर उड रहा था......

Saturday, November 14, 2020

रात का सपना

 रात का सपना 


कल रात को दीपावली की

पूजा के बाद जब मे सोया

गहरी नींद मे सपनो मे खोया

तो एक अजीब सपना आया

 लक्षमी जी का वाहन उललू आया

कहने लगा भैया तुम लक्ष्मी

 जी के आने के चककर मे

अपने हाथ की लक्ष्मी गवा देते हो

साफ सफैयत लीपा पोती

सजावट लड़ पटाखा मे

कितने रूपये गवा देते हो

इसी खर्चे को लेकर धन तेरस से

दीपावली तक अक्सर तुममे और

तुमहारी पतनी मे खटक जाती है

और भाई साहब अपने घर की

 लक्ष्मी माता लक्षमी की

प्रसन्नता की खातिर रूठ जाती है

पहले अपनी अपनी गृह लक्ष्मी को

 मनाया कीजिए वो जो बोले

 वो वो ही किया कीजिए

 कयोकि श्रीमन शास्त्र भी

झूठ नही बोलते  हैं  जहा रहती है

पत्नी प्रसन्न वही देवता रमते है

 धन दोलत सुख ऐश्वर्य

सब कुछ सहज ही मिल जाता है

और भाई साहब पत्नी की

प्रसन्नता से और माता लक्ष्मी का वरदान भी

फल जाता है

मैने कहा उललू महाराज आप

बिलकुल सही फरमा रहे है

माता लक्षमी का इंतजार है

हमे आखिर कब बुला रहे है

तभी मेरी आखो के सामने

 बहुत तेज प्रकाश छा गया।

माता लक्ष्मी का मुस्कुराती

 छवि का दीदार हो गया

फिर उनहोने मुझे धन धान्य

 सुख संपन्नता का वर तो दिया

पर जाते जाते मेरा मन खट्टा कर दिया

कहने लगी गृह लक्ष्मी को खुश

 रखोगे तो दीपावली पर मेरी कृपा

सहज ही पा जाओगे

और घर लिपाई पुताई लड़ बम पटाखा

मिठाई नए कपडे लतते के

खर्चे से बच जाओगे ऐसा सुनकर 

मेरा सपना टुट चुका था मन

 पतनी को खुश रखने की उधेडबुन मे लग चुका था


मनोज दुबे श्रीकांत होशंगाबाद

Monday, November 2, 2020

करवा चौथ

 

विषय करवा चौथ

विधा स्वैच्छिक 

दिनांक  २ ११ २०२०


करवा चोथ वृत


बड़ी जतन से  दिन भर किया उपवास मैने

खुद को  वस्त्र गहनो से सजाया सवारा मैने


मनाया गणेश को  शाम करके पूजन अर्चन

अरग  चांद को परछ  करक  से  दिया मैने


देखा मुखड़ा  मैने पिया का संग संग चंदा के

तिलक कर छू  के चरण  वर उनसे मांगा मैने


पानी से अघा गई नही  अघाई प्रेम से पति के

कहावत कहके  ऐक ऐक घूट पिया पानी मैने


रहू सदा सुहागन संगनी मै हर जन्म मे  तुम्हारी 

जन्म जन्मांतर  तक  साथ  तुम्हारा पाया  मैने


आरजू श्रीकांत की भी  रहो तुम ही जीवन साथी

किसी  युग युगांतर मे जो  मानव तन  पाया मैने

मनोज दुबे श्रीकांत

होशंगाबाद नर्मदा पुरम

Sunday, October 18, 2020

कविता

 जन्म दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं पुत्र

ईश्वर सदा तुम्हारी कामनाएँ पूरी करे

ईसी आशीर्वाद के साथ समस्त दुबे परिवार 


तुम सदा ही रहना आगे 

.

पुत्र  तुम सदा रहना आगे ही आगे

पीछे मुडकर कभी मत देखना

देकर के ध्यान न किसी बातो पर 

अर्जुन  सा  बन लक्ष्य अपना साधना


मत डिगना तुम तूफान झंझावातो मै

अडिग अटल हिमालय से रहना 

हारकर बैठना न कभी समसयाओ से 

साहस सौर्य धैर्य से डटे ही रहना


रहना दृढ़ संकल्पित मन मे सदा 

सुख दुख से कभी विचलित न होना 

कहे कुछ भी चाहे  जमाना तुमसे 

पर बात सदा तुम मन की सुनना


मिलैंगे कई  भटकाने को राहे दो राहे

तुम सदा  मंजिल को चलते ही रहना 

 असफलताएं कभी  आ भी जाए तो 

मन से सदा मजबूत तुम रहना


अपना कर कै थोड़ा अनुशासन 

परिश्रम से अपनी किशमत लिखना 

सफलता के शिखर पर पहुचकर भी 

तनक कभी अभिमान न रखना


रहना सदा सरल सहज ही तुम 

अवगुणो से दूर रहकर  सदा सदगुणी रहना 

कहूँ कुछ यदि  कभी सिखाने तुम्हे  तो 

बातो को मेरी  अपने मन न रखना


अच्छे बुरे का  भेद बताने को  

पथ प्रदर्शक  अपना तुम मुझे समझना 

पंख हो तुम मेरे सपनो के प्रिय पुत्र 

बात जरा तुम कभी न भूलना


 साथ मेरा तुम्हे रहेगा हर पल हर जगह 

कभी तुम मुझे अलग मत समझना

देव वर सा  रहूगा  सदा साथ तुम्हारे 

पुत्र कभी  भी तुम  चिंतित न रहना


मनोज दुबे श्रीकांत

Saturday, September 26, 2020

लघु कथा

 

अनलाक फोर और राखी 


लाक डाऊन के बाद शहर मे धीरे धीरे अन लाक चालू हो रहे थे पर विदयालय नही खुल रहे थे राखी के पेरेंट और उसको चिंता थी इस बार उसका बारहवी की बोर्ड परिक्षा थी आन लाईन कलाश मे पर्याप्त मार्ग दर्शन नही मिल पा रहा था कही कोई कोचिंग संस्थान भी नही लग रहे थे

बडे दिन बाद विदयालय खुलने की परमीशन सरकार के दवारा दी गई इससे उसकी खुशी का कोई ठिकाना नही रहा वह उसकी काफी किताब बैग जमा रही थी स्कूल जाने के लिए तभी फोन बजा मै सी बी बी एस सी विदयालय से प्रिंसिपल बोल रहा हूं आपकी बेटी की शेष फीस जमा कराकर एडमीशन शुल्क भी जमा करा दीजिये तभी हम बच्ची को परामर्श कक्षा मे प्रवेश दे पाएगे

 कितना होगा सर जी यही कोई पंदरह बीस हजार सर एक दम से इतना रूपय तो जमा नही पाएगा लाकडाउन के चलते विगत महीनो से पगार नही है घर खर्च भी नही हो पा रह है आप अभी कुछ रियायत दे दे तो उचित होगा

नही रमेश जी हमारे मालिक का हुकुम है हमे भी टीचरो को पेमेंट मेंटनेस करना पडता है रमेश इधर सोच रहा था मेरा मंझला बेटा उसी के जैसे विदयालय मे शिक्षक है उसे तो लाकडाऊन के दोरान पेमेंट नही मिला और अब भी बमुश्किल पचास पर्सेंट मिल रहा है मगर फीस के लिए दवाब कैसा इस समय  मे ऊपरवाला ही जाने सरकार के नियम कानून रमेश गहरी सास लेकर अपनी पत्नी से गोरी तुम्हरे ऐक जोडी कंगनहो तो वही दे दो गिरवी रख बिटिया की फीस जमा कर आऊ

राखी पिता की मजबरी भाप रही थी और अपनी आखो से आसू पोछते हुए बैग से किताब निकाल कर अलमारी मे  रख रही थी कहते हुए बाबू जी मेरा नाम सी बी एस सी से निकालकर पास के ही ऐम पी बोर्ड के विदयालय मे करा दीजिये वैसे भी परसेट ऐम पी बोर्ड मे अचछे से बन जाएगे कालेज मे दाखिला अंकसूची बेस पर नहीपरसेंट बेस पर होता है 


मनोज दुबे श्रीकांत 

Wednesday, September 23, 2020

गजल

 बड़ी ही खूबसूरत लगती हो फेसबुक और तुम 

मुझे तो तुम अपनी लगती हो फेसबुक और तुम


 लाइक टैग कमेंट पर गुजर जाता है वक्त मेरा  

मोबाइल पर जब आती हो फेसबुक और तुम


 आन लाइव रूम से बहल जाता है मन मेरा

 बात जब कभी कर लेती हो फेसबुक और तुम


 सुंदर दोनों  लगती हो इसमें कोई दो बात नहीं

 बड़ी ही हसीन लगती हो फेसबुक और तुम 


अदाए तुम दोनो की है ऐक से बढकर के ऐक 

 कितना जुल्म सा  करती हो फेसबुक और तुम


मन मेरा भरने लगता है उड़ान अनंत आकाश

मन जब समा जाती हो फेसबुक और तुम 


 रहती हो पास तो अच्छा लगता है मन को मेरे 

दूर हो  तो  बेचैन कर देती हो फेसबुक और तुम


 मोहब्बत हुई है श्रीकांत को दोनों से इस कदर

 दिल के पास पास लगती हो फेसबुक और तुम



Tuesday, September 22, 2020

गजल

 हाथो मे हाथ जरा रहने दे


मेरे  हाथों में तेरा हाथ जरा रहने दे

 कुछ बाते मेरे मन की जरा कहने दे


 बैठू कुछ पल को तेरे सामने तो मैं

 मेरी आंखों  आंखों को जरा मिलने दे


 कुछ कह दूं मैं और कुछ कहते तू अपनी

 बातें   दिलो की गौर से जरा सुनने दे 


अभी अभी तो बैठी हो मेरे पास में तुम

 4:00 बज गए  है अभी जरा ढलने  दे


 सुहानी शाम से ढलती रात तक रुको तुम 

 बातें प्रेम की अपनी परवान जरा चढने दे


मोहबबते मेरी बिंदास है समझ ले श्रीकांत

कोई नयी कहानी अपनी भी जरा बनने दे 


मनोज दुबे श्रीकांत

Sunday, September 20, 2020

पिता जब तुम थे

 16 – पिता जब तुम थे 


पिता जब तुम थे 

तब तक सही था 

सब खामोश थे 

तुम्हारे दबदबा में 

किसी ने चूं  तक 

नहीं की थी 

सब हाँ में हाँ 

मिलाते थे आपकी 

जो भी कहते थे आप 


पिता जब तुम थे 

तो हम निष्फिक्र थे 

हम भान नहीं था 

रीति रिवाज परंपरा का 

जो थे 

समाज में व्याप्त अपने 


पिता जब तुम थे 

तो 

जमाना कितना 

सस्ता था 

बाजार से ले 

आते थे 

सब कुछ 

मुट्ठी भर 

पैसों में 

खरीद कर 

अपनी खुशियाँ 


पिता जब तुम थे

तो रस था




त्योहारों में 

उत्सव में 

होली दशहरा 

दीपावली सब 

लगते थे 

मन को अच्छे 

क्योंकि नहीं होता था 

कोई द्वेष विरोध 

लोगों के मन में 

और न ही 

होती थी चिंता 

पर्यावरण की 


पिता जब तुम थे 

तो लहलहाते थे 

खेत 

फसलों के 

अन्न – धन से 

भरे रहते थे 

भंडार 

बोरों से बंडा तक 

टचाटच 

नहीं होता था 

अनाज का खालीपन 

ओर टोटा 

बोरों सा 

बट जाता था 

मजदूरों और समाज में 


पिता जब तुम थे तो

घर चलता था 

सरपट 

दौड़ता पटरी 

पर गृहस्थी की 




बिना तू – तू  मैं – मैं के 

सब परिवार के 

“वसुदैव कुटुम्बकम”

साथ का सन्देश देते 

समाज के 

और तुम 

करते थे काम 

मुखिया से 

आगे होकर 

घर के आंगन 

का बरगद

 होकर


पिता जब तुम थे 

तो समय कब 

निकल जाता था 

घोड़ों पर 

सवार 

पता ही नहीं चलता था 

मंजिलों का 

वे कब मिल जाती थी 

ईमानदारी की 

मेहनत से 

थोड़े ही परिश्रम से  


पिता जब तुम थे

तो भान 

नहीं था हमें

कुछ भी कर

लेते थे हम 

बिंदास बेधड़क 

हमें पता 

होता था पीछे 




आपका साथ 

जो हमें 

लड़ने की संभावनाओं 

प्रबल बनाता था जीवन 

की समस्याओं में 


पिता जब तुम थे 

तो मेहरबान 

था मौसम 

सर्दी – गर्मी – बरसात 

का 

बसंत का भी 

जब खिलते थे 

पुष्प लहलाते थे 

श्वेत जिन पर 

मंडराती थी तितलियों 

के साथ 

भौरें करते थे 

गुंजन 

घर की दीवारों 

की चौखट 

में बना कर घर 

अपना 


पिता जब तुम थे

तो कितना

आसान था

घर बनाना 

चार दीवारी का 

यही विश्वास था 

कच्चे घर के 

आँगन में 

मिल जाती थी 




खुशियाँ 

अनायास ही 

जीवन में 

अपने में 

कही थी 

चुपके से

किसी भी बहाने से 


पिता जब तुम थे 

रिश्ते बनते थे 

सहज ही काका 

दादा - मामा 

बुआ – फूफा 

 चाचा – चाची सबके 

सब मिलते थे 

छुपी ख़ुशी 

मिलते मिलाते 

बढ़ाते माधुर्य 

परिवार में 

कोई भी नहीं 

होना चाहता था 

अलग 

अपने लोगों से 

उन दिनों 


पिता जब तुम थे 

तो 

दुरुस्त था सब 

इम्युनिटी से 

लेकर शरीर

तक बीमारियाँ 

नहीं होती थी 

कभी किसी को 




सब रहते थे

स्वस्थ तंदरुस्त 

घूमते खाते 

सुबह की हवा 

ब्रह्ममुहूर्त 

में उठकर के 

अपने घर के बाहर 


पिता जब तुम थे 

तो नहीं था 

कोई बेईमान 

और न ही 

बेईमानी ज़माने 

में सब 

भक्त थे एकदूसरे 

के कामों के 

और क्लीयर 

रखते थे 

अपना – अपना 

हिसाब जो 

जड़ बनता था 

झगड़े की  

कभी - कभी 

  परिवार में 

जब कभी भी 

होता था बंटवारा 


पिता जब तुम थे 

तो नहीं थे 

टेक्नोलॉजी के 

कोई समान

सब मित्रवत 

रहते थे  




बतियाते चौपाल 

चौक – चौराहों 

गुमठियों पर 

नहीं रहते थे 

चौपाल खाली 

जब हाथ भले 

रहते थे 

खाली 

आजकल तो 

हाथ में सबके 

रहता है मोबाइल 

और सबका मुंह 

रहता है बंद 

आज के ज़माने में 

टुच टुचाते कीबोर्ड 

हों या 

सरकाते 

स्क्रीन की टच को 

अपने मोबाइल की 

अपनी अँगुलियों 

अनसुनी करते 

बातों को अपनों 

के बीच की 


पिता जब तुम थे 

तो 

उपज आ 

जाती थी 

भरपूर 

दानों में 

फसलों की फली 

में

मूंग – मटर – चना 




मसूर 

सोयाबीन सब 

होते थे 

और कटती थी 

फसल 

मनचाही 

एवरेज से 

लबरेज होकर 

गाड़ी भर – भर कर 

भूसा भी 

गायों के लिए 

आ जाती थी घर पर 

और आज 

ढूँढ़ते फिरते हैं 

चारा 

ट्रैक्टर ओर हार्वेस्टर 

युग में 

हम गाँव – गाँव 

हम अपने गौधन के लिए 


पिता जब तुम थे तो 

थी गाय कई 

ओर आठ जोड़ी 

बैल 

बंधते थे सार में 

सुबह शाम लगता 

था दूध 

ग्लास भर भर    

पीते थे सब 

जब माँ 

पकाती थी 

कड़ाईया में 

डालकर



 

दूध को 

बनाती थी हरी 

शाम को 

खिलाती थी 

कभी दूध – भात 

जब आते थे 

सब घर 

के सदस्य 

या 

रूठ जाता था 

मैं अपनी 

जिद में 


पिता जब तुम थे 

नहीं थे

बनावटी रिश्ते 

कोई नहीं हटता था

 अपनी बात

 से 

सब के सब 

बंधे थे एक 

सूत्र में 

रेशम के 

धागे से 

निभाने को 

अपनी 

रिश्तेदारी

निःस्वार्थ 

बिना किसी

भेदभाव के 

सींचते अपने 

रिश्ते को 

केवल एक 




मुस्कुराहट 

पर 

झुकते देखते थे 

हम दुश्मनों 

को घुटने के बल पर 

आत्मसमर्पण करते 


पिता जब तुम थे 

दो रिश्तों की 

माधुर्यता छलकती थी 

दोस्त और दोस्ती 

की मिसाल थी 

नहीं खोदते थे 

दोस्त अपनों

के लिए गड्ढा 

और न ही 

आल्हादित होते थे 

अपने मित्र की 

बुराई पर 

न ही जलते थे 

सफलता पर 

अपने मित्र की   

आपके बाद

 बदल गया

सब कुछ 

कब पता नहीं चला 

दबे पाँव 

जैसे वक़्त 

निकल गया

टिक – टिक करता 

घड़ियों के काँटों में 


पिता जब तुम थे 




तो नहीं थे 

मनोरंजन के ज्यादा साधन 

कुछ श्वेत – श्याम फिल्मों 

के साथ 

नाटक – नौटंकी रासलीला   

रामायण , रामसत्ता थे 

जिनमें सीख थी 

समाज को 

एक दिशा देने की 

मर्यादा से लेकर 

अत्याचारों के 

दमन की कहानियों 

में 

प्रमुख भूमिका 

दिखाई देती थी रामराज्य 

के राम की कल्पना में 

तो श्री कृष्ण के 

गीता के संदेशों में 

कर्म की प्रधानता को 

विध्वंश और सृजन 

सब कुछ 

दिख जाता था सहज ही 

मौखिक केवल वृतांत से ही 

समय गुजर जाता था 

भाव भक्ति के साथ 

कुछ नया करने को 

परलोक के लिए 

गाकर कुछ पद – चौपाई 

दोहा सारे या पढ़कर श्लोक 


पिता जब तुम थे 

तो जमाना ही 

अलग था 




पता है मुझे

सब चलता था 

नदी के प्रवाह सा 

बहता कल - कल  

निर्मल – निश्छल 

प्रेम बरसाता 

टिमटिमाता बूंदों 

की बारिश सा 

जगमगाता सितारों 

सा 

खिलता फूलों

 सा 

सुमनगंध 

से महकाता 

कोना – कोना 

मन का 

दूर कहीं से 

मन की गहराईयों  

में उतरकर 

बनाता घर 

आँगन को 

रिश्ते की 

मधुरता को 

पहले से कल तक 

और कल से आज तक 

वैसे ही जैसे 

तुम आते – जाते 

थे कभी घर से 

बाहर 

और आते थे 

लौटकर कभी 

घर में





लेकर खुशियों 

के लड्डू 

और मुस्कानों 

को 

जो देती थी 

हमें एहसास 

सुखों के पलों 

का 

जब – जब 

हम हार जाते 

थे कभी 

अपनी जिंदगी की 

उन समस्याओं के 

मकड़जाल में 

तब आ 

जाती थी 

तुम्हारी 

स्मृतियाँ 

उबारने को 

हमें बनकर 

आशीर्वाद 

करने को 

कालजयी समय के फेर में 

जीतकर गढ़ने को 

अपना स्वर्णिम 

भविष्य    


मनोज दुबे श्रीकांत 

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Saturday, September 19, 2020

कविता


सानेट का ऐक


प्रयाश


कल वो मुझसे कुछ ऐसा बोली

खलती रहे मुझे उसकी भाषा बोली

गुनता रहा मे मन ही मन मे सब

घर से बाहर न निकला जब वो निकली

चलता रहा मन मे अजीब अंतर्द्वंद

छलकर के वो मुझे कुछ ऐसी डोली

जलता रहा मै और जलती रही वो

झमकती लता सी होकर ऐसी होली

टूटता सा  काच सा चरमराय करके

ठुमक ठुमक के वो  बनके निकली

डब डबाती आखो से निकलते आसू

ढलती शाम  उस दिन की ऐसी निकली 

तुम ऐसी तो थी नही कभी फिर बदली कैसे

थमे निशचल नीर कोई हलचल हो जैसे 

दमकती रही दामिन तुम डाराती मन को

धुनता रहा मन मे उधेडबुन मे खुशियो मे

मनोज दुबे श्रीकांत 


Friday, September 18, 2020

मेरे पिता




मेरे पिता 


घर आंगन परिवार मेरे पिता 

नीम बरगद छाव  मेरे पिता

सुख समृद्धि यश धन वैभव

ईशवर का वरदान मेरे पिता


 घर दीवार आंगन छत  मेरे पिता 

सुख दुख  धूप  छांव मेरे पिता 

 नदी तालाब झरना  से निरझर 

उमड़ता घुमडता सागर मेरे पिता 


ग्रह नक्षत्र तारे सितारे  मेरे पिता 

 सूरज चंदा चांदनी मेरे पिता 

 पर्वत वन  लता वृक्ष और पत्ते 

 वन उपवन  और बाग मेरे पिता


 वर्षा शरद ग्रीष्म मेरे पिता

सावन भादो  फागुन  मेरे पिता

फलते फूलते वृक्ष जो आगन के

रितुराज  बसंत से  मेरे पिता  


अनार आम क ख ग घ मेरे पिता 

मात्रा बारहखडी शब्द मेरे पिता

कागज कलम स्लेट और कापी 

 पढाते सिखाते  पाठ  मेरे  पिता


खेत खलिहान हल मेरे पिता

लहलहाती फसल मेरे पिता

मेहनत लगन इच्छा मेरे मन की 

कर्तव्य पथ अनुशासन मेरे पिता


धन धान्य  और अनाज मेरे पिता 

घर बाजार होटल  रेसतरा मेरे पिता 

साग सबजी का छोला का रखे हाथ 

चलती फिरती कोई दुकान मेरे पिता 


जन्मदिन त्योहार उत्सव मेरे पिता 

रीति रिवाज और  परंपरा मेरे पिता 

घर  के कर्तव्यों का निरवाहन सदा 

 पजाने माने  प्रतिष्ठित  मेरे पिता 


बारात  बैड बाजा तुरही मेरे पिता 

ढोल ढमाका डी जे डांस  मेरे पिता 

माता पूजन गणेश पूजन  मंडप 

कन्या दान पाव पखराई मेरे पिता 




अखबार मैगजीन  मेरे पिता 

टीवी मोबाइल टेबलेट मेरे पिता 

मेमोरी  रख सम्हालते वर्र्षो की 

 कोई सुपर कम्पयूटर मेरे पिता 


समाचार खबरों विज्ञापन मेरे पिता 

जांच परख परीक्षण मेरे पिता 

लगा लेते हैं अनुमान सच झूठ का

एकदम  सटीक  पैमाना मेरे पिता


 दया करुणा आशीष मिश्रा मेरे पिता

दुख दर्द  दवा खुराक  मेरे पिता

 मरहम से हर लेते हैं पीआ सब 

डाक्टर वेद हकीम मेरे पिता


सोना चांदी लोहा  तांबा मेरे पिता 

रत्न हीरे जवाहरात मेरे पिता 

सोलह श्रंगार मां के तीज तयोहार 

सौभाग्यवती का आशीर्वाद मेरे पिता


कल आज परसो नरसो  मेरे पिता 

दिन सप्ताह महीनो  मेरे पिता 

जन्म से जीवन भर निभाते साथ 

साल दशक शताब्दी मेरे पिता 


सरल सहज सौम्य मेरे पिता 

जीवन कर्तव्य पथ मेरे पिता

जटिल समस्या विकट घडी मे 

कोई साल्यूशंन से  मेरे पिता


अनंत अनवरत अडिग मेरेपिता 

द्रढ संकल्प इच्छा शक्ति मेरे पिता

पूजा पाठ रीति रिवाज परम्परा 

ईमान करम  धरम  मेरे  पिता 


मन के सपने रात दिन मेर पिता 

स्वछंद आकाश मे उडान मेरे पिता 

इच्छा शक्ति अनंत जिजीविषा मन की 

लगन परिश्रम  मंजिल  मेरे पिता  


डंडा घड़ी चश्मा एल्बम मेरे पिता 

 यादो की तशवीर से मेरे पिता 

 गाव शहर राह और  पगडंडी 

 मेरे मन की मंजिल से मेरे पिता 


रामायण कुरान गीता मेरे पिता 

धर्म संस्कृति परमपरा मेरे पिता 

रंग गुलाल अबीर पिचकारी 

होली दिवाली दशहरा मेरे पिता। 


लड पटाखा फुलझरिया मेरे पिता 

खील बताशे  मिठाईया मेरे पिता। 

अनार चकरी राकेट आफताब 

तयोहारो की खुशियां मेरे पिता 


देव मनुज  सज्जन  मेरे पिता 

सरल सहज सुगम मेरे पिता 

भावना इच्छा मनोकामना मन की 

मन्नत  दुआ प्रार्थना  मेरे पिता 


गुणा जोड घटाना भाग मेरे पिता 

गिनती पहाडे  संख्या मेरे पिता 

हल एक कठिन सवाल   का गणित 

सरल सहज  सुगम विधी मेरे पिता 


सरल सहज लघु दीरघ  मेरे पिता 

प्रश्न  कापी  उत्तर  मेरे पिता 

पेपर परीक्षा टाईम टेबल मेरे पिता 

 परिक्षक निरीक्षक शिक्षक मेरे पिता 


लहरे पल्लर जलतरंग मेरे पिता 

स्तब्ध निशचल नीर मेरे पिता 

कल कल से निर्झर रहते सदा

अमृत जल बिंदु से मेरे पिता 


धरा पर्वत नदी सागर मेरे पिता

लोक परलोक दे धाम मेरे पिता 

वरद-हस्त और कृपा ईशवर की

मन्नत जन्नत  कामना  मेरे पिता 



साहस धैर्य  ओर संकल्प मेरे पिता 

अविरल अडिग अचल मेरे पिता 

करने को खवाब पूरे मेरे मन के 

उममीद  आशा की उडान मेरे पिता


तिलांजली अंजुली भर  जल मेरे पिता 

पुरखा पाठ धूप दीप नेवेद  मेरे पिता

करने को दान धरम और कुछ पुण्य 

तिथि श्राद्ध मान और  दान मेरे पिता


मनोज दुबे श्रीकांत

Thursday, September 17, 2020

 कुछ यादे मन को ताजा कर जाती है और वो बाते जो हमारे जीवन की अहम तो फिर कहने ही क्या है हर ऐक के जीवन का वह दौर जब वो रूबरू होता है अपनी पहली मोहब्बत से दूसरी तीसरी से नही

   कहो तो ले चलू तुमको 





तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर तुमको

देखने को उसको जी भर के फिर से 

कालेज के  उस जमाने फिर तुमको


करा दू याद पहली मोहब्बत को

इश्क के वादे कशमे सब तुमको

देखना उसका पलटकर के लजा के

दोस्तो के संग मुस्कुराना तुमको

तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर तुमको 


चाहना बार बार मिलना उससे 

घंटो  उससे बात करना  तुमको 

कालेज के वो पेड़ों के झुरमुट मे 

टिपटी पर संग मे बैठना तुमको 


तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर तुमको


हथेली  पर नाम लिखना उसका 

किताब मे रख खत देना तुमको 

जवाब मे उसकी हा सुनने को 

कलास मे बेताब होना तुमको 

तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर तुमको

गली मोहल्ला करना उसका एक 

सज सवरकर देखना  तुमको 

चुपके चुपके से निकल कर घर से 

छत पर शाम को देखना तुमको 

तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर 

अपने मन की सब  बातो को 

छोटी बहना को बताना तुमको

बात बात पर बाबू जी का डाटना 

मा को साथ तुम्हारा देना तुमको 

तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर तुमको


बाते कुछ मीठी मीठी खटटी खटटी सी 

निकालकर यादो के एलबम से तुमको 

पहली बार की पहली पहली उससे  

मोहब्बत की वो   मुलाकात   तुमको 

तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर तुमको

देखने को उसको जी भर के फिर से 

कालेज के  उस जमाने मे तुमको



मनोज दुबे श्रीकांत 



Sunday, August 9, 2020

कविता

अनंत पर सवार कावय संगृह से ली गई कविता

मेरा मन

धरा से उडकर  मेरा मन कभी कभी
आसमान तक चला जाता है
वहा से फिर घूमने को जहा दोड़ आता है
ढूढ लाता मोती गहरे सागर से
 खुशियो की सुमन गंध को फैला जाता है
मेरा मन मेरे मन की उसकी मुसकान हुआ जाता है
मेरा मन मन से  कभी कभी अनंत मे घूम आता है

जाने कब  उसके मन से
 दिल के करीब पहुच जाता है
हाथ मे हाथ थाम थडकता
 सासो का सपंदन हुआ जाता है
निहारता राहे कभी किसी पार्क या
 किनारे दरिया के टिक टिक करता
समय सा निकल जाता है
मेरा मन  मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है

मेरा मन पहुच जाता है
कभी कभी सज्जन के मन से दुर्जन के
 पास  प्रेम से विषाद की ओर मुड़ जाता है
 ढूंढने को कुछ संबध की थाह
अपनो की मन की गहराईयो मे उतर जाता है
देखनो को संबध के कच्चे
धागो को खीचतान मचा कर मन मे
अजीब  अंतर्द्वंद  का मंथन मचा जाता है
मेरा मन  मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है

कभी कभी निकल जाता घर गृहस्थी से
 दूर ढूढने को वैराग्य की शांति प्रभु के
श्री चरणो से तीन लोक चोदह भुवन से
 उनके धाम तक पहुच जाता है
करके अपना हिसाब मन से ही
मनगणत गणित मे उलझ कर रह जाता है
भव सागर मे खाता गोता विकारो का
वापस फिर जन्मकर बालक हुआ जाता है
मेरा मन  मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है।

मेरा मन रखता गिदध सी
 पैनी नजर देखने को मन की  सबकी
 पैमाना सा बदल बदल कर
आकलन  करने  को बातो बातो
मे उसकी मेरी सबकी तुमहारी
 तो कभी रातो मे  अखियो के सपनो से
दिवास्वप्न सा सपनो सा धरा पर धमक आता है
मेरा मन  मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है
मनोज दुबे श्रीकांत

Saturday, August 8, 2020

कविता

मल्टी सब्जेक्ट स्पेशलिस्ट

कल घर के सामने ऐक गधा
जोर जोर से रैक रहा था।
जाने वो क्या कहने की सोच रहा था
फिर उसने हद ही कर दी



घर के गेट पर दो लतती जड दी
मै ताव  मे लठ लेकर घर से बाहर आया
गुससै मे उससे फरमाया
अबे गधे जाता है
कि दो चार लठ पुटठे पर  जमाऊ
अपनी पिछली बार वाली
औकात पर आऊ
वह बोला भैया मेरे गले
एक बात हजम नही  हो रही है
और आपकी कोचिंग मे आजकल
 हर विषय की पढ़ाई हो रही है
आपके बोर्ड की डिग्रियां भी
 मेरे पल्ले नही पड रही है
B A BSc BCom MA M Sc M Com
सब  ऐक सी  लग रही  है
इतनी सारी डिग्रियों के नाम
और बोर्ड देखकर मेरा सर चकरा रहा है
 ऐक शिक्षक गणित भोतिक रसायन
कामर्स आर्ट सब कैसे पढा रहा है
यही देख देख कर मेरा दिल और
  दिमाग फैल हो रहा है
मेरा गधापन दुबे जी आजकल
 सरचढ कर बोल रहा है
मैने कहा भैया आजकल
हमारी कोचिंग मे ये सब
नए नए अपाइंट हुए
शिक्षक  महोदय पढा रहे है जो
 अभी अभी  ग्रेजुएट होकर  आ रहे है
 ऐसे तो फिर दुबे जी विषय विशेषज्
 कहा  रह पाएगा और हमारा शिक्षा तंत्र
 बीरबल की खिचड़ी बन जाएगा
 अपने गधे पन का ऐक आईडिया
आपको भी दिए जा रहा हूं
 और अब आपके बोर्ड के  नीचे
मल्टी सब्जेक्ट स्पेशलिस्ट लिखा जा रहा हूँ

मनोज दुबे श्रीकांत

Friday, August 7, 2020

गजल

मनचली गजल

जब चाहे जिधर से निकली
इठलाती बलखाती निकली

मुड़कर पीछे पलट पलट के
 देखते मुस्कुराती निकली

घुमाती फिरी सबको पीछे
गली मोहल्ले से निकली

चर्चे चलते रहे उसके ही
चौक चौराहो से निकली

करते  इंतजार सब उसका
सुबह शाम दोपहर   निकली

बिखेरती अदा श्रीकांत अपनी
  मनचली  जहाँ  से निकली

मनोज दुबे श्रीकांत

Thursday, August 6, 2020

कविता

नमक हलाली  का मतलब 

मालिक के पीछे दौडते कुत्ते को
घाट के कुछ आवारा कुत्तो ने
रोका टोकते हुए भौका
बड़ी वफादारी निभा रहे हो भैया
मालिक के पीछे पीछे फालतू मे
 क्यो दोड़ रहे हो भैया
तुमहारे मालिक थुल थुल शरीर के
साथ अपनी तोंद कम कर
वजन घटा रहे
और आप अपने आप को
जबरदस्ती थका रहे है
तभी उनमे से एक खबीस
 अवारा कुत्ता बोला बीडू फुल
वफादार कुत्ता क्या बात है
अपुन साला गवार अवारा
टुकड़े तोड़ता झूटन चाटता
कमाल की जिंदगी जी रेला है
बांस बिंदास मालिक के
सामने दुम हिला रैला है
दोड़ लगाता कुत्ता फबतियो से
खाक हो गया
बिन बोले उससे रहा नही
गया कहने लगा गाडी मेघूमता हू
 ऐसी घर मे रहता हूँ।
दूध मलाई रोटी के साथ
 टोस बिस्कुट खाता हूँ
 और अपनी लाईफ मालिक
के साथ बिंदास बिताता हूऐ
इसमे तुम्हारा कया जाता है
मुझे मेरी इसी जिंदगी मे मजा
 आता पर बीडू तेको गुलामी
की गले  मे पड़ी जंंजीर
गले का पटटा और गुलामी का
 जीवन नजर नही आता तू वफादार नही
नमक हलाली कर रहा है
मालिक के तलवा चाटू जिदंगी जी रहा है
अपुन  कुत्तो की जमात
पर तू धब्बा सा लगता
तु जिसे ऐस की जिंदगी समझता है बीडू 
अपुन को तो फासी का फंदा लगता है

मनोज दुबे श्रीकांत

Monday, August 3, 2020

गजल

मिर्ची गजल

खेत से घर जब आई मिर्ची
हरी लाल काली कहाई मिर्ची

बनाई जब तरकारी उसने
  मुह मे जमके लगाई मिर्ची

तेज तरार वो भी ऐसी की
लोगो मे  खुद  कहाई  मिर्ची

बातो से कभी कभी तो उसने
दिल मे सबके लगाई मिर्ची

जल भुन  गए देख के उसको
तरक्की की जो बताई मिर्ची

सुनाकर खरी खोटी मन से
 उसने जब   जब लगाई मिर्ची

भाई बहन दोस्त सहेलियों संग
 रिसतेदारो को  भी लगाई मिरची

लग जाती किसी को  भी श्रीकांत
दुनिया मे   जब से  आई  मिर्ची

मनोज दुबे श्रीकांत

Friday, July 31, 2020

गजल

पारिवारिक गजल

अपने परिवार को सदा  ऐक बना के रखना
बुरी नजरो से  सबकी उसको  बचा के रखना

सुन लेना  कभी सबके मन की बातो को
अपने मन की  सदा मन मे दबा के रखना

न रखना  भेद कभी अपने तुपने का मन मे
 व्यवहार सबके साथ एक सा  बना के  रखना

क्या तेरा  क्या मेरा  न लाना  मन मे  कभी
 जमीन जायदाद की दूरियो. को  बढा के रखना

 चार दिवारी न बन जाए कभी  घुटन का घर
अपने घर को सदा ऐक  घर   बना के रखना

लडने को मत लड़ जाना अपनो से द्वापर से
 अपने घर को    महाभारत से बचा  के रखना

रहना राम लखन भरत शत्रु घन भाई से सदा
दुर्योधन शकुनी की नीति  से बचा के रखना

काका दादा के नाम मत करना भेद कभी  भी
स्नेह सब पर   ऐक सा सदा   बना के   रखना

पनपने न देना काटे कभी श्रीकांत बैर के
  घर के आंगन मे  प्रेम बीज बचा के रखना

मनोज दुबे श्रीकांत

Sunday, July 26, 2020

गजल


बरसती गजल



घिर के आए बदरा तो बरसी ऐसी
बिन पानी के जो महीनो तरसी ऐसी

चमकी बिजुरिया  बनके आकाश मे
डरा करके मन को  जो  दमकी  ऐसी

रिमझिम रिमझिम सी बरसती बूंदे
 तन मन को मेरे  जो भिगाती ऐसी

सूखे दरख्त पर लाती बहार अक्सर
कर पल्लवित  डाल पर कोपल ऐसी

झूमकर डोलता श्रीकांत वन उपवन मन
बूंद अमृत की सावन जो बरसी ऐसी

मनोज दुबे श्रीकांत


गुस्सैल गजल


गुस्सैल गजल




पास मेरे आई ऐसे भनभना के
जैसे   बदरा हो कोई घनघना के

चला दिए कई शब्दो के बाण उसने
आई हो जैसे कि पास मन बना के

 आई  लाल मरचा सी  बनके उस दिन
 मेरे सामने ऐसे  कि तमतमा के

मार देती दो चार छापड तो क्या
बात  करती रही  दिन मे दनदना के

ऐसा रुप  देखकर  उसका भैया
रह गया मै अटपटा  सनसना के

बैठा रहा श्रीकांत दिन भर चुपचाप
गृहस्थी से अपनी अब अनबना के

मनोज दुबे श्रीकांत

गुस्सैल गजल


गुस्सैल गजल




पास मेरे आई ऐसे भनभना के
जैसे   बदरा हो कोई घनघना के

चला दिए कई शब्दो के बाण उसने
आई हो जैसे कि पास मन बना के

 आई  लाल मरचा सी  बनके उस दिन
 मेरे सामने ऐसे  कि तमतमा के

मार देती दो चार छापड तो क्या
बात  करती रही  दिन मे दनदना के

ऐसा रुप  देखकर  उसका भैया
रह गया मै अटपटा  सनसना के

बैठा रहा श्रीकांत दिन भर चुपचाप
गृहस्थी से अपनी अब अनबना के

मनोज दुबे श्रीकांत

गुस्सैल गजल


गुस्सैल गजल




पास मेरे आई ऐसे भनभना के
जैसे   बदरा हो कोई घनघना के

चला दिए कई शब्दो के बाण उसने
आई हो जैसे कि पास मन बना के

 आई  लाल मरचा सी  बनके उस दिन
 मेरे सामने ऐसे  कि तमतमा के

मार देती दो चार छापड तो क्या
बात  करती रही  दिन मे दनदना के

ऐसा रुप  देखकर  उसका भैया
रह गया मै अटपटा  सनसना के

बैठा रहा श्रीकांत दिन भर चुपचाप
गृहस्थी से अपनी अब अनबना के

मनोज दुबे श्रीकांत

गजल

     घंटा गजल






नही कोई ज्ञान लिख रहै है  क्या घंटा गजल
तरननुम है नही गा रहे हैं  क्या घंटा गजल

न शेर  है न  शायरी है न  मिश्रे का कोई तुक
बिना रदीफ काफिए के है क्या घंटा गजल

बहर तुक मे आ नही रही कही से कही तक
  बे हया बेकार बेजार  है क्या घंटा गजल

न इश्क न मोहब्बत और नजाकत  की बाते
 गम ए  बेवफाई के बिना है क्या घंटा गजल

करते रहे गजल ऐक से बढकर एक श्रीकांत
मिले न दाद शेर पर तो है क्या घंटा गजल

मनोज दुबे श्रीकांत


Tuesday, July 7, 2020

बदनाम गजल









                           बदनाम गजल
           



इश्क की बातो से  गुलजार हो गई
निकली गलियो से तो बदनाम  हो गई

ऊडते रहे पैसे और महकते रहे जाम 
ऐयासो के मनोरंजन का मकाम हो गई

 नाजीज कनीज पाकीजा सी नाचती रही
बनारस की गलियो का   नाम हो गई

 छीनती रही स्वतंत्रता उनकी बाई ऐसे ही
 देह  उनकी. रूपयो की गुलाम हो गई

चलता रहा सब ऐसे ही श्रीकांत उनका सब
   कब सुबह  दोपहर रात और   शाम हो गई

मनोज दुबे श्रीकांत





Monday, July 6, 2020

अपनी गजल

                           अपनी गजल
         


               


कुछ अजब गजब  अपनी गजल
 रदीफ काफिया की अपनी गजल

बंधकर के बहर मे जो निकली
घर की बहू बेटी सी अपनी गजल

मिश्रा मक्ता और सेर  ए  शायरी
 मोहबबत की खुशियां अपनी गजल

झुमकती ठुमकती लाजाती शरमातीम
इठलाती बलखाती अपनी गजल

निकलती सज सवरकर जब  श्रीकांत
सारे शहर की जान अपनी गजल

मनोज दुबे श्रीकांत

Thursday, July 2, 2020

आज के मुक्तक

भारत चीन के रिशतो पर

दोस्त बन कल तक तलवे चाटता रहा
खाया जिस थाली मे छेद करता रहा
नमक हराम नामाकूल बेईमान सा तू
दोस्ती के रिशते को दागदार करता रहा

समर्पण को  तू मजबूरी समझता रहा
वक्त बे वक्त आखे भी दिखाता रहा
मै मानता रहा तुझे अपना अजीज
मिलकर गले पीठ पर  छुरा घोपता रहा

वक्त तुझको भी बता देगा ऐक दिन
हिसाब तेरा भी कर देगा पूरा ऐक दिन
काटो को बोकर फूल मिलेगे कब तक
दिल को लहूलुहान कर देगा ऐक दिन

मनोज दुबे श्रीकांत

गजल


                       टपोरी गजल


           ऐक लड़की अपनेको भी पटा दे बाबा
           फूल प्रेम  का दिल मे खिला दे बाबा

            बरसो से घूम रहा हूँ  बनकर टपोरी
            ऐक गर्ल फ्रेंड् अपनी  भी बना दे बाबा

                निकलू घर से बाहर जब जब उसके
               नजरो को बस   दीदार करा दे बाबा

               चोक चोराह स्कूल कालेज  या  मंदिर
                 ऐक बार कही  तो  उससे मिला दे बाबा

                  लगा कर कुछ जुगाड मेरी  भी उससे
                    अब चक्कर अपना भी चला दे बाबा

                      कर दूंगा जैसा भी तु चाहेगा वैसा ही
                  उसको अपना सब कुछ  बना दे बाबा

                    क्या क्या करू श्रीकांत उसको पाने को
                 मंत्र  वसीकरण का अब तो  बता दे बाबा

                     
मनोज दुबे श्रीकांत





Wednesday, July 1, 2020

आज के मुक्तक

भारत चीन के बिगडते रिश्ते



कहने को  और क्या कह दू दोस्त तुझे
गददार एहसान फरामोस कह दू तुझे
लगाकर गले करता रहा वार पीठ पर
आस्तीनों का साप क्या कह दू तुझे

दूध  मै अपने होथो से पिलाता रहा
तू सुधा को गरल  सा  करते  रहा
नही समझा मेरे जजबातो को कभी
होकर के अजगर तू  मुझे डसता रहा

अब बढा ली दुश्मनी  जो तूने इतनी
की थी कभी दोस्ती तूने नही जितनी
देता है साथ आजकल मेरे  दुश्मनो का
दोसती की कीमत थी  क्या बस इतनी

मनोज दुबे श्रीकांत




     
              वक्त की ताकत




वक्त क्या क्या जुगाड़ लगा देता है जनाब
अंधे के हाथ मे  बटेर लगा देता है जनाब

फाके पडते रहते है किसी के घर मे देखो
 कई गधो को पंजीरी खिला देता है जनाब

आता जाता भले ही नही कुछ बिल्कुल उसे
अंधो मे काना राजा बना देता है जनाब

करते रहते है जुगाड़ आगे बढने की लोग
उललू  उसका  सीधा करा देता है जनाब

कया कहे श्रीकांत वक्त मारता है जब भी
सौ टका हिसाब पूरा कर देता है जनाब

मनोज दुबे श्रीकांत



Tuesday, June 30, 2020

गजल


                            पत्नी जब घर आएगी
       

         बहुत दिनो बाद पत्नी मायके से फिर आएगी
         बड़बड़ाते हुए मेरा  सारा घर फिर  जमाएगी

       मै घर मे न रहू  तो तुमहारा काम न चले बिलकुल
          नोकरानी हू क्या घर  इस की फिर  फरमाएगी

         निकालेगी कचरा घर के  कोने कोने का झाड़ू से
        मैले कपड़ो  धोकर  घड़ी करके   फिर जमाएगी

        अलमारी अस्त व्यस्त बिखरी बिखरी देखकर के
       बच्चो के साथ साथ मुझ पर फिर  बिफराएगी

         फिर जाकर किचिन देखेगी क्या है या नही
     राशन की लिस्ट सब्जी का झोला फिर  थमाएगी

      बनाकर गरमा गरम रोटी सबजी और  दाल चावल
     खाना खा लो जी आज  किचिन से फिर  चिल्लाएगी

        सच पूछो तो श्रीकांत उसके मायके से आने पर
         शात से घर आंगन मे  रौनक  फिर  बरसाएगी


                            मनोज दुबे श्रीकांत



Monday, June 29, 2020

लघु कथा

लघु कथा
आन लाईन कलास
गाव मे बहुत दिनो से विदयालय नही खुले थे
रवि चिंतित उसके पुराने बस्ते की किताब काफी पेंसिल को निकालकर बार बार देख रहा था तो कभी अपनी टूटी सलेट मे से झाकते कह रहा था बाबू जी पटेल साहब की बिटिया कल हमारे साथ खेल रही थी तो उसकी मम्मी चिल्लाते हुए कह रही थी सोनू आन लाईन  कलास जवाईन नही करनी देर हो रही है बाबू जी ये आन लाईन कलास कया होती बाबू जी मूक थे और सोच रहे थे काश उनके पास भी एक ऐंडराईड मोबाइल होता तो रवि भी पटेल साहब की सोनू जैसा आन लाईन पढता
मनोज दुबे श्रीकांत


मुक्तक

राष्ट्र नमन

हम युद्ध को नही अमन चैन चाहते
 ये न समझना कि लडना नही जानते
निकाल कर रख देते है हम हेकड़ी सारी
आखो मे आख डाल कर जब बात करते

रखते है दिल हाथो पर अपने दोस्त की खातिर
रखते हैं जान हथेली पर  दुश्मनों के खातिर
घोपता है  छुरा  जो पीठ  मे लगाकर गले
माफ करते नही गददार जो दोस्त हो शातिर

 हम करे  सुरक्षा सीमा की तुम अपनी की करो
करने को कब्जा की  मनशा दूर ही करो
इंच इंच फुट फुट नाप लेंगे हम  कदमों से
चीन   तु हमारे  दम को   देखा न करो

मनोज कुमार दुबे श्रीकांत

Saturday, June 6, 2020

कविता




                मोबाइल पर झगड़ते बच्चे
मोबाइल पर झगड़ते बच्चे
एक दूसरे से छुड़ाते बच्चे
चिल्लाते जम जम कर के
एक दूसरे पर झल्लाते बच्चे

मम्मी को चुप कराते बच्चे
अपनी बात सुनाते बच्चे
डांटने पर पापा के अक्सर
गुस्सा अपना जताते बच्चे

वाटस अप फेस बुक देखते
इंस्टा टिकटाक चलाते बच्चे
जीतने को मोबाइल गेम मे
अपनी आखें गडाते बच्चे

घर के  अंदर अंदर रहते बच्चे
दीवाल से गर्दन टिकाते बच्चे
बार बार देखते मोबाइल अपना
लाईक कमेंट के कायल बच्चे

अपने  अब कैसे होते बच्चे
सच्चे सच्चे से झूठे बच्चे
अपनी बात मनवाने को
अक्सर जिद्दी होते बच्चे


घर मे  अकेले खेलते बच्चे
बाहर नही निकलते बच्चे
दुबले पतले वजन बढाते
टेंशन मे डूबे लगते बच्चे

मोबाईल अपना देखते बच्चे
पाठ याद न करते बच्चे
मा बाप सर की न सुनते
अपनी अपनी धकाते बच्चे

परिवार मे चुपचाप रहते बच्चे
मोबाईल पर चेट करते बचचे
समाज परिवेश से रहकर दूर
डिजिटल वर्ल्ड से होते बच्चे

गुमसुम गुमसुम से रहते बच्चे
दिखते हरपल व्यस्त से बच्चे
मोबाइल की दुनिया मे डूबकर
संस्कारो  से  दूर होते बच्चे

धार्मिक न सामाजिक बच्चे
आज्ञाकारी रहे न बच्चे
इंटर्नेट के अंधे युग मे
सब कुछ ताक मे रखते बच्चे



मनोज दुबे श्रीकांत


Monday, June 1, 2020

गज़ल

                      दो जून की बात




           मिलती नही है रोटी अब दो जून की
              दिखती रोटी जो तस्वीर मून की

               साक सब्जी दाल कहा  मजदूरी मे
                पुडिया भी नही तेल मिर्च नून की
 
             मेहनत हाड़ तोड़ती थका देती है रोज
             पसीना की बूंद जो बह जाती खून की

                मैले कुचले वस्त्र मे दुत्कार देते लोग
               मागने को देते नही  दो मूठी चून की


               थकने को थका देती है बहुत श्रीकांत
               बात जब जब  भी होती है दो जून की

                  मनोज दुबे श्रीकांत

Thursday, May 28, 2020

गज़ल


      मै चलूंगी प्रिय




आ जाऊंगी साथ तुम्हारे प्रिय
तुम जहा ले चलोगे मै चलूंगी प्रिय

सुख मिले या मिले दुख मुझे
तुम जैसा रखोगे मैं रहूंगी प्रिय

  हो कभी नादानियां मुझसे कहीं
माफ करना मुझे मैं चाहूंगी प्रिय

 कहोगे जो लगेगा उचित गर मुझे
 हर कहना  सदा मै मानूंगी प्रिय

 दिए जो वचन परिणय सूत्र मे
एक-एक कर मैं निभाऊंगी  प्रिय

ये वादा मेरा है तुमसे  ही सदा
छोड़ मझधार में मै  ना जाऊंगी प्रिय

  मिले साथ तुम्हारा मुझको ही सदा
बार बार में यही वर मै मागूंगी प्रिय

तुम  हो मेरे मन मीत से श्रीकांत
 कोई कविता  सी मै रहूंगी प्रिय

मनोज दुबे श्रीकांत 


Sunday, May 24, 2020

गजल

निपटा दिया उन्होने ऐसे



पहले उन्होने हमे बातो से निपटा दिया
बनी न बात तो फिर हाथो से निपटा दिया

फिर प्रेम करने की दी ऐसी सजा उनने
अपनी लडकी से विवाह करके निपटा दिया

फिर निपटे हम अपने आप से ही जेसे तैसे
बड़े होने पर  फीर बच्चो ने निपटा दिया

निपटते रहे घर समाज जमाने के तानो से
कुछ निपटे प्रेम से कुछ गुस्से ने निपटा दिया

निपटने का सिलसिला रूका नहीं श्रीकात अपना
कभी लोगो ने आधा तो कभी पूरा निपटा दिया

मनोज दुबे श्रीकांत

निपटाना का तात्पर्य अपने काम से विरोधियों को पस्त करना

गजल

            निपटा दिया उन्होने ऐसे

   



पहले उन्होने हमे बातो से निपटा दिया
बनी न बात तो फिर हाथो से निपटा दिया

फिर प्रेम करने की दी ऐसी सजा उनने
अपनी लडकी से विवाह करके निपटा दिया

फिर निपटे हम अपने आप से ही जेसे तैसे
बड़े होने पर  फीर बच्चो ने निपटा दिया

निपटते रहे घर समाज जमाने के तानो से
कुछ निपटे प्रेम से कुछ गुस्से ने निपटा दिया


निपटने का सिलसिला रूका ना श्रीकात अपना
कभी लोगो ने आधा तो कभी पूरा निपटा दिया

मनोज दुबे श्रीकांत

Wednesday, May 20, 2020

कविता

लाकडाउन मे रियायत है क्या



लाक डाउन में तुम घर में पड़े रहे
खा खाकर दुश्मन अनाज  के होते रहे

 अब प्रीतम अपने काम पर लग जाओ
   लाक डाउन हटा  बाजार फिर से  खुल रहे

 अब  सोओ तुम देर तक सुबह नो बजे तक
बॉस  रास्ता तुम्हारी आफिस मे देख रहे

चाय नाश्ता भोजन सब कुछ दिया मैन
अब तुम्हारे दिन आराम के लद रहे

चाय पान  चौराहे के मित्र बेचैन मिलने को
 सब्जी राशन के झोले  टंगने हाथ  बेताब हो रहे

 खिल खिलाकर  यू बोली  सखी से पत्नी सबकी
गुईया  बड़े दिन बाद  आज ये काम पर जा रहे

सब की पत्नियों ने  ली  सांस सुकून की श्रीकांत
 बड़बड़ाते खिजियाते घर अब शांत हो रहे

मनोज दुबे श्रीकांत

Monday, May 18, 2020

गजल


मिल कही पर
चल कही पर

एक बार आ
तू कही पर

मिल फुर्सत से
फिर वही पर

मै आऊंगा
तेरे घर पर

मिलेगा श्रीकांत
चाहे कही पर

Sunday, May 17, 2020

गजल


             शुक्र है परिवार का

हम खामखा श्रीमती को बदनाम करते रहे
 जमाने के सामने खुद बेईमान होते रहे

 रिश्ते की अहमियत को समझा लाक डाउन में
 जिंदगी भर अपने घर में मेहमान होते रहे

 करती रही जी हजूरी हमारी आई जब से 
कुछ  उसके भी अधूरे अरमान  होते रहे

 समझ मे  आया परिवार कोरोना  काल में
 परिवार के सदस्य अपने कदरदान होते रहे 

कर लेते थे ना नुकुर पहले श्रीकांत उनसे 
अब उनकी खिदमत पर मेहरबान होते रहे

मनोज दुबे श्रीकांत 

Saturday, May 16, 2020

कविता









     लाकडाउन के बाद शहर घूमकर आऊंगा
     



देख लूंगा अपने शहर को आज फिर मन भर के
खुलेगा लाक डाउन तो फिर मै घूमने जाऊंगा
 गली मोहल्ला  रोड चौक चौराहा शहर का 
चप्पा चप्पा  तसल्ली से घूम कर आऊंगा देखूंगा

बहुत दिनो बाद नर्मदा जी मे कूद कूद कर नहाऊंगा
कोरोना की मुक्ती के लिए मनोती मांग आऊंगा
घंघरा फरिया पान प्रसादी चढ़कर के मा नर्मदा को
लाकडाउन के बाद साष्टांग प्रणाम करके आऊंगा


 शहर को अच्छे से घर से निकल कर पर्यटन घाट से
 होकर मोड़ चली चौक होता हुआ बाजार जाऊंगा
 होटल नाश्ते की केला  गुप्ता जी की खुली है या नहीं देखकर 
 अग्रवाल जी नाश्ता कर लाल सिंह जी की चाय पीने जाऊंगा

 घूमूगा  बाजार की एक एक दुकान  आज मै सारी 
चप्पल खरीदने अनिल और मनसा बूट हाउस जाऊंगा
 फिर खरीदूंगा भास्कर से कुछ कपड़े अपने और बच्चो के
पूछने को दाम फैशन हाउस और मंगलम जाऊंगा फिर

 लूंगा सब्जी मंडी से सब्जियां लेने को फल सत रस्ते जाऊंगा
लौटते मेंअपने स्कूल पंडित रामलाल शर्मा को देखूंगा कुछ प
एसएनजी गर्ल्स स्कूल की रोड से वापस घर आऊंगा शाम को घूमने बस स्टैंड से होता हुआ रामजी बाबा की समाधि जाऊंगा

 फिर निकालूँगा  रैलवै स्टेशन के लिए वहां से सुसताकर
 बैठ कर ट्रेन की छुक छुक आवाज सुनकर  वापस आऊंगा
फिर खरीद लूंगा कुछ टोस बिस्किट ब्रेड सुंदरम गोवर्धन बेकरी से घमंडी लस्सी पर फ्रूट जूस और लस्सी पी कर आऊंगा

फिर शाम को मंदिर में काले महादेव खेड़ापति के मत्था टेक सेठानी घाट से फिर  बांके बिहारी राधा वल्लभ मंदिर जाऊंगा
रुकूंगा दो पल को पंडित जी की छोला टिकिया के पास अग्रवाल पुरी भंडार के सेव लेकर फुलकी खाऊंगा

 रात का खाना खाऊंगा बैठकर तसल्ली से परिवार के साथ
 देर रात फिर पर्यटन  घाट की रोड पर टहलने जाऊंगा
सच बेखौफ घूमूगा दिन भरबिना डरे कोरोना ओर पुलिस से
देर रात रामायण  महादेव देख कर फिर सोने जाऊंगा


मनोज दुबे 

Friday, May 15, 2020

गजल

तुम्हारे सिवाय कोई ओर नही





तुम्हारे सिवाय   कोई और नही
तुम्हारे से अनुपम कोई और नही

आता हूं जब भी पास ही तुम्हारे
तुम्हारे से अलग  कोई ठौर नही

जानते हो तुम कोन हो मेरे लिए
अनमोल तुमसे कोई और नही

कह लेता हूँ मन भर के तुमसे ही
ओर किसी पर कोई जोर नही

दे दे बस खुशी के दो पल श्रीकांत
मांगता हूँ थोड़ा तुमसे कोई मोर नही








Thursday, May 14, 2020

गजल

उसका तो हीरो था मै



सबको नापसंद था तो क्या
उसको तो पसंद था मै

औरो की नजरो मे रहू विलेन
उसका तो हीरो न 1 था मै

कोई ढूँढता रहे बुराई मुझमे
उसका तो आदर्श था मै

लंफटू आवारा टपोरी सबके लिए
उसका तो आशिक था मै

कहता था जमाना फिसड्डी भले
उसका तो नंबर 1 था मै

भला बुरा जैसा भी था श्रीकांत
 उसके प्रेम का पुजारी तो था मै

मनोज दुबे श्रीकांत

Wednesday, May 13, 2020

गजल

उड़ाना चाहते है अब मुझको



टहनियां काटने को आतुर है लोग
शाख से उड़ाने को आतुर है लोग

बना ले न आशियाना हम पक्का
 मारने  को पत्थर आतुर है लोग

गिराने को खींचते है टांग मेरी अक्सर
खोदने को  गड्ढा  आतुर हैं लोग

गुजारता हूँ रात जैसे तेसे शाख पर अपनी
भगाने को  कल भोर मे आतुर हैं लोग

बचोगे कहा तक श्रीकांत तुम अपनो से
आस्तीन के साप बनने को आतुर है लोग

मनोज दुबे श्रीकांत

Sunday, May 10, 2020

गजल

ताश के पत्ते सा मै

कभी थे बादशाह  घर के हम
आई बेगम तो गुलाम हो गए

गृहस्थी के कामकाज मे लग
 किसी तुरुप के इक्के हो गए

नहला पर दहला मारते रहे लोग
 पंजा छक्का से बेकार हो गए

उतार-चढ़ाव में जिंदगी के अक्सर
 बाजार मे सट्टा अटठा के भाव गए

 दिया नहीं किसी ने मान तो हम
अपमान से दुक्की  तिक्की  हो गए

होते रहे  कभी अंदर कभी बाहर
जुए की फड़ के जो दाव हो गए

करने को टाईम पास बेकारी मे
 पत्ते लाल काले पान ईट चूड़ी हो गए

मनोरंजन करने को लोगो के लिए
देहला बेगम पकड़ गुलाम चोर हो गए

पिसते रहे श्रीकांत जिंदगी के गेम मे
ताश की गड्डी के जो बावन पत्ते हो गए

         मनोज दुबे श्रीकांत

Saturday, May 9, 2020

कविता







                          बिंदास बेधड़क जी न्यूज
                   


               नही थमेगा नही रुकेगा जी न्यूज
               आगे और  ही आगे बढ़ेगा जी नयूज

               दिखाएगा सच को हमेशा की तरह ही
             झूठ का पर्दाफाश करेगा जी न्यूज

              खोलकर  के सबकी ढोल की पोल को
              असलियत  सामने लायेगा जी न्यूज

             धर्म निरपेक्षता के पहने जो मुखौटे
             उन सबको बेनकाब करेगा जी न्यूज

            दम खम से निडर हो दिखाता है खबर
             किसी की धमकियों से नही डरेगा जी न्यूज

             मुद्दा कोई  भी हो ज्वलंत  वर्तमान का
             बोलने मे कभी नही चूकेगा जी न्यूज
         
             बात सामाजिक राजनेतिक या देश हित की
           डी एन ताल ढोककर मे बोलेगा जी न्यूज

           सेकते है जो रोटी राजनीति की अपनी
           दाल उनकी कभी न  गलने देगा जी न्यूज

             आवारड वापसी हो या टुकड़े टुकड़े गैंग
              उन  सबकी बोलती बंद करेगा जी न्यूज

               हिंदुस्तान मे हिंदुस्तानियों की आवाज
                 फिर से देश मे बुलंद करेगा जी न्यूज

             बिंदास बेधड़क जन जन की आवाज श्रीकांत
            हर एक को सुधीर चोधरी  बनाएगा जी न्यूज


                             मनोज दुबे श्रीकांत





Sunday, May 3, 2020

कविता


लाक डाउन ने सिखा दिया

न मिले  कार बस रेल गाड़ी हवाई जहाज
 बिना घोड़े गाड़ी आटो रिक्शा के रह सकते है

न मिले ब्रेड टोस्ट बिस्किट क्रीम रोल
 बिना पिज्जा बर्गर  हाट डाग के रह सकते है

न मिले आइसक्रीम कोल्ड ड्रिंक फ्रूट जूस
बिना लस्सी श्रीखंड दही के रह सकते

न मिले समोसा कचोरी जलेबी आलूगोंडा
बिना नमकीन बर्फी के रह सकते है

न मिले रसगुल्ला गुलाब जामुन चम चम
बिना जलेबी इमरती रसमलाई के रह सकते है

न मिले इडली डोसा सांभर बड़ा खमण
बिना  खस्ता चाट फुल्की  के रह सकते है

न मिले जरदा पान सुपारी गुटखा खैनी
बिना सिगरेट बीडी  हुक्का के रह सकते है

न मिले पीने को  विलायती दारू या कच्ची
बिना वियर विस्की ब्रांडी के रह सकते है

न मिले  महंगे कोट सूट शूट पेंट शर्ट
बिना टाई बेल्ट जूतों के  रह सकते है

न मिले महंगी साड़ी  कपड़े और ज्वेलरी
बिना पाऊडर  मेक अप के रह सकते

न मिले दोस्त अजीज अपने या और कोई
बिना  हाँके लम्बी गपासटिक के रह सकते

न मिले घूमने को इधर उधर गली मोहल्ला
बिना तफरी के अपने घर मे रह सकते है

न मिले रिश्तेदार पडोस के लोग रोज रोज
बिना इनके परिवार के साथ रह सकते है

न मिले मेहनताना रूजगारी लाकडाउन की
बिना तनखा पगार के कडके  रह सकते है

न करे खर्चा अपना रुपया फालतू कामो मे
बिना शोक के अपन फकीरी मे रह सकते है

सिखा दिया लाक डाउन ने श्रीकांत अबकी
बिना राज सी ठाठ के साधारण रह सकते है

मनोज दुबे श्रीकांत

Friday, May 1, 2020

कविता

                 दरोड़ो के नाम
             

       

 बहुत दिनों से नहीं मिली दर्शन हो
तरस रहे हैं हम तो घूंट पीने को

 चढ़ाते थे बॉटल पर बॉटल उन दिनों
अब मिल भी नहीं रही चखने को

शौक था पीने को बियर व्हिस्की जिन रम
 तरस गए हैं अब देखने भी कच्ची को

 देखता हूं खाली गिलास बार-बार अपना
भूल गया उस्ताद साकी और पैमाने को

लॉक डाउन में ड्राई डे चल रहा ये कैसा
मजबूर. है सेनीटाइजर को सूंघने को

चलना डगमगा कर रोड पर  बोलना अर बर
जा रहा है दरोड़ा तरस रहे  सुनने को

 सोचा ना था यह दिन भी आएंगे श्रीकांत
 मिलेगी बस दवा और तरसेंगे हम  दारु को

मनोज दुबे श्रीकांत

गज़ल


                        डर डंडे से नही लगता बाबूजी




 अब  डर डंडे से नही मार से लगता है बाबू जी
   डर भीख से नही भूख से लगता है बाबू जी

  लाक डाउन मे बंद पड़े है घर महीने भर से
   डर पुलिस से नही घरवाली से लगता है बाबू जी

    इलाज कितना ही हो जाए बीमारी का कोई
 डर कोरोना से नही कवारैंटाईन से लगता है बाबू जी

 करने को कर दे इलाज किसी का भी डाक्टर
डर स्क्रीनिंग से नही हमलों से लगता है बाबू जी

कोरोना की लड़ाई लड़ ले सब हिलमिल कर श्रीकांत
डर धर्म से नही हिंदु मुस्लिम करने से लगता है बाबू जी

मनोज दुबे श्रीकांत





 


Thursday, April 30, 2020

गजल

निकलकर देखू बाहर

निकलकर देखू तो बाहर क्या हो रहा है
 चोक चोराह बाजार मे क्या चल रहा है

क्या खुली है  कोइ दुकाने कही की आज 
समोसा कचोरी और नमकीन मिल रहा है

 क्या किसी गली मोहल्ले के टप पर तुम्हारे
राजसी गुटका पान या जरदा मिल रहा है

  खुली है कही कलारी या मिल रही है कच्ची
बहुत दिनो से पीने का मन चल रहा है

 कहा लगे हैं बेरीगेट और पुलिस के जवान
देखू कोन कोन उनसे  बच के निकल रहा है

लाक डाउन के कहने क्या है अब श्रीकांत
हर कोई घर से निकलने को मचल रहा है

मनोज दुबे श्रीकांत

Wednesday, April 29, 2020

गज़ल

                               उई अम्मा 


                       उई अम्मा  मै मर गई
                        प्रेम मे  क्या कर गई

                     देखकर पहली बार ही
                       दिल मे घर कर गई
    

                      देखने  जब  सात बजे 
                     अपनी छत पर गई

                  भैया देख कर  रोड पर 
                   हाय उनसे मै डर गई

                    प्रेम मे बावरी श्रीकांत
                    ये क्या तु कर गई


      मनोज दुबे श्रीकांत
   



      


Tuesday, April 28, 2020

गजल

                            लाक डाउन मे



                     लॉक डाउन में  बस घर में पड़े हैं
                     बात पर हम अपनी ऐसे अड़े हैं

               सुना देती है वह अपनी और हम भी
                 दिन में कई बार उससे लड़े हैं

                       मनाने को  दिन मे कई बार उसे
                       हुकूम पर उसके हमेशा खड़े हैं

                निकालने को सामान रखा  ऊंचा
              कहने पर कई बार टंट  पर चढ़े हैं

                     हाथ सफलता मे श्रीकांत पत्नी का
                     उसी के दम पर ही हम आगे बढ़े हैं

                                    मनोज दुबे श्रीकांत

Monday, April 27, 2020

गजल

                           गजल
           



               


               काम के नाम परिवार का हिस्सा हूँ
               निकला तो डस्टबिन का डब्बा हूँ


                  हिंदी की कोई किताब का
                 अधूरी कहानी का  किस्सा हूँ

                 इसी बात को लेकर अनबन सी
                   तुम्हारे व्यवहार से गुस्सा हूँ

                    मजबूरी में अक्सर तुम्हारे साथ
                      गेहूँ संग घुन सा पिसता हूँ

                 बनाने को स्वाद  को मिला लेते हो
                  चाट की दुकान का जो खस्ता हूं

                    मजबूर लाचार जिंदगी में श्रीकांत
                      जटिल समस्याओं का बस्ता हूँ

मनोज दुबे 

व्यंग

 [12/9/2020, 11:56 AM] Manoj Dubey: आन लाईन कलास का पंगा  कल आन लाईन कलास मे  हमने कैमरा आन करने का  बोला कुछ छातरो का  मन भय से डोला  पंद्र...