रमा इकलौती लड़की थी तीन भाइयों में घर उसकी एक इशारे पर हर चीज हाथों पर उपलब्ध हो जाती थी मम्मी पापा और भाई भोजाई सबकी चहेती की रामा रमा की उम्र धीरे-धीरे बढ़ने लगी अब वह विवाह के योग्य हो गई थी तो सभी को चिंता सताने लगी पता नहीं रमा को ससुराल कैसी मिलेगी वह ससुराल में एडजस्ट होगी कि नहीं आंखें बहुत दिनों बाद अच्छा रिश्ता होने पर रमा का विवाह कर दिया गया रमा कुछ दिन ससुराल में रही तो पता चला
यहां तो सब मायके से विपरीत था यहां हर कोई उसे हर काम के लिए मना कर देता था प्रेम करना की वह तुझे बहू नहीं बेटी के समान रखें परंतु रमा को कुछ ऐसा होते हुए नहीं दिख रहा था एक दिन वह सूटकेस के साथ मायके आ गई और मां से बोली मां मैं कह कर आई हूं अब कभी ससुराल नहीं जाऊंगी वहां मेरा कोई सुनता ही नहीं है बहुत दिनों तक देखा
वहा तो उन लोगो मेमकोई परिवर्तन नही है तभी बाबूजी देखो बेटा रामा ससुराल और मायके में जमीन आसमान का अंतर होता है हम पहले ही बता रहे थे बेटा अरे बाबूजी यह सब मां का किया धरा है न लाड पयार से बिगाडती न रमा बिगड़ती हर एक रमा को सीख दे रहा था तभी बाबू जी बिटिया तुम वहां के लोगों को थोड़ा सनेह देकर देकर तो देखो उनकी सेवा तन मन से करके तो देखो मेरी तुम्हें उतना ही प्रेम करेंगे जितना कि हम करते थे अब रमा कि वह पूछ परख मायके में नहीं थी जो पहले थी
हर एक रमा के काम को अनसुनी कर रहा था यहां तक की यहां तक कि काका भी अब रमा को सीख देने लगे थे बेटी विवाह के बाद ससुरा ही सब कुछ होता है जीना मरना सब ससुराल में होता है मायके तो बस अधिक होता है बिटिया बस उन्हें तुम अपना समझ कर देखो और अपने बाबूजी और माई के समान उनकी सेवा कर के देखो बिटिया वो सब तुम्हें अपने बाबूजी और मां से ज्यादा प्रेम करें रमा को अब लगने लगा था कि उसकी वह पूछ परख अब मायके में नहीं है जो पहले थी यहां तक कि छोटू भी कह देता था दीदी जीजाजी के फोन जब रोज जाने के आ रहे हैं अब मैं समझ सकती हूं कि ससुराल ही मेरा असली घर है
वहां की सब मेरे ही मैं तन मन से सेवा करके सभी को अपना बना लूंगी रमा के परिवर्तन में ससुराल का नया रास्ता खोल दिया था और रामा का मायका रमेश बाबू और अम्मा की खुशियों के पीछे काफी दूर छूट गया था!


























