Sunday, May 24, 2020

गजल

            निपटा दिया उन्होने ऐसे

   



पहले उन्होने हमे बातो से निपटा दिया
बनी न बात तो फिर हाथो से निपटा दिया

फिर प्रेम करने की दी ऐसी सजा उनने
अपनी लडकी से विवाह करके निपटा दिया

फिर निपटे हम अपने आप से ही जेसे तैसे
बड़े होने पर  फीर बच्चो ने निपटा दिया

निपटते रहे घर समाज जमाने के तानो से
कुछ निपटे प्रेम से कुछ गुस्से ने निपटा दिया


निपटने का सिलसिला रूका ना श्रीकात अपना
कभी लोगो ने आधा तो कभी पूरा निपटा दिया

मनोज दुबे श्रीकांत

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