Sunday, May 10, 2020

गजल

ताश के पत्ते सा मै

कभी थे बादशाह  घर के हम
आई बेगम तो गुलाम हो गए

गृहस्थी के कामकाज मे लग
 किसी तुरुप के इक्के हो गए

नहला पर दहला मारते रहे लोग
 पंजा छक्का से बेकार हो गए

उतार-चढ़ाव में जिंदगी के अक्सर
 बाजार मे सट्टा अटठा के भाव गए

 दिया नहीं किसी ने मान तो हम
अपमान से दुक्की  तिक्की  हो गए

होते रहे  कभी अंदर कभी बाहर
जुए की फड़ के जो दाव हो गए

करने को टाईम पास बेकारी मे
 पत्ते लाल काले पान ईट चूड़ी हो गए

मनोरंजन करने को लोगो के लिए
देहला बेगम पकड़ गुलाम चोर हो गए

पिसते रहे श्रीकांत जिंदगी के गेम मे
ताश की गड्डी के जो बावन पत्ते हो गए

         मनोज दुबे श्रीकांत

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