मनचली गजल
जब चाहे जिधर से निकली
इठलाती बलखाती निकली
मुड़कर पीछे पलट पलट के
देखते मुस्कुराती निकली
घुमाती फिरी सबको पीछे
गली मोहल्ले से निकली
चर्चे चलते रहे उसके ही
चौक चौराहो से निकली
करते इंतजार सब उसका
सुबह शाम दोपहर निकली
बिखेरती अदा श्रीकांत अपनी
मनचली जहाँ से निकली
मनोज दुबे श्रीकांत
जब चाहे जिधर से निकली
इठलाती बलखाती निकली
मुड़कर पीछे पलट पलट के
देखते मुस्कुराती निकली
घुमाती फिरी सबको पीछे
गली मोहल्ले से निकली
चर्चे चलते रहे उसके ही
चौक चौराहो से निकली
करते इंतजार सब उसका
सुबह शाम दोपहर निकली
बिखेरती अदा श्रीकांत अपनी
मनचली जहाँ से निकली
मनोज दुबे श्रीकांत
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