घंटा गजल
नही कोई ज्ञान लिख रहै है क्या घंटा गजल
तरननुम है नही गा रहे हैं क्या घंटा गजल
न शेर है न शायरी है न मिश्रे का कोई तुक
बिना रदीफ काफिए के है क्या घंटा गजल
बहर तुक मे आ नही रही कही से कही तक
बे हया बेकार बेजार है क्या घंटा गजल
न इश्क न मोहब्बत और नजाकत की बाते
गम ए बेवफाई के बिना है क्या घंटा गजल
करते रहे गजल ऐक से बढकर एक श्रीकांत
मिले न दाद शेर पर तो है क्या घंटा गजल
मनोज दुबे श्रीकांत
नही कोई ज्ञान लिख रहै है क्या घंटा गजल
तरननुम है नही गा रहे हैं क्या घंटा गजल
न शेर है न शायरी है न मिश्रे का कोई तुक
बिना रदीफ काफिए के है क्या घंटा गजल
बहर तुक मे आ नही रही कही से कही तक
बे हया बेकार बेजार है क्या घंटा गजल
न इश्क न मोहब्बत और नजाकत की बाते
गम ए बेवफाई के बिना है क्या घंटा गजल
करते रहे गजल ऐक से बढकर एक श्रीकांत
मिले न दाद शेर पर तो है क्या घंटा गजल
मनोज दुबे श्रीकांत

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