Sunday, August 4, 2019

गजल

सभी मित्रजनो मित्रता दिवस की शुभकामनाएं

ये वादा हे मेरा

रहे  मेरा मित्र और मित्रता कुछ रहे न रहै
मेरे मित्र और मित्रता का संबंध अमर रहे

न रहे द्वेष कभी मेरे और उसके मन मन मे
मै रहू मित्र के दिल मे वो मेरे दिल मे रहे

चलती रहे कटटी गुस्सा का दोर कभी कभी
मेरा मित्र मन से  कभी मुझसे जुदा न रहे

हस्ते मुस्कुराते रहे सदा हिलमिलकर दोनो
सुखो की छाव रहे गम जरा भी न रहे

होगा न दूर पल भर को श्रीकांत तुझसे कभी
 वादे बचपन के बस एक दूसरे को याद रहे

मनोज दुबे श्रीकांत
सभी मित्रजनो मित्रता दिवस की शुभकामनाएं 

ये वादा हे मेरा 

रहे  मेरा मित्र और मित्रता कुछ रहे न रहै
मेरे मित्र और मित्रता का संबंध अमर रहे

न रहे द्वेष कभी मेरे और उसके मन मन मे
मै रहू मित्र के दिल मे वो मेरे दिल मे रहे

चलती रहे कटटी गुस्सा का दोर कभी कभी
मेरा मित्र मन से  कभी मुझसे जुदा न रहे

हस्ते मुस्कुराते रहे सदा हिलमिलकर दोनो
सुखो की छाव रहे गम जरा भी न रहे

होगा न दूर पल भर को श्रीकांत तुझसे कभी
 वादे बचपन के बस एक दूसरे को याद रहे

मनोज दुबे श्रीकांत

Saturday, August 3, 2019

गजल

एक तेरा गुस्सा

एक तेरा गुस्सा भी लाजमी था
मै भी तो आखिर आदमी ही था

घर गृहस्थी मे उलझाती रही तु
संसार  तो आखिर जाल ही था

तेल शक्कर दाल चावल  सब्जी
काटता रहा जैब तो तंगहाली ही था

ये मुआ मुह और दाल मसूर की
ढोऊ गधा गृहस्थी का तो मै ही था

डांटती रही डपटती रही लडती रही
 रूठने पर मनाने वाला  तो मे ही था

जप तप तेरा रहना दिन दिन भर भूखा
 पति तेरा और परमेशवर तो मै ही था

चलती रहे ऐसी ही श्रीकांत अपनी गाडी
एक चका.गृहसथी की तू दूजा मै ही था

मनोज दुबे श्रीकांत

Monday, April 15, 2019

कविता

व्यंग्य
चुनावी सीख

भैया कल तक पार्क मोहल्ला
 घाट पर फालतू घूमते थे
 आजकल तो बिल्कुल भी
दिखाई नही दे रहे हो लगता है
 आजकल आप लोग
ज्यादा व्यस्त दिख रहै हो
तूमहारा भोकना धमा चोकडी
 करना काउ काऊ करके
 चिल्लाना आजकल बिल्कुल भी
 सुनाई नही दे रहा है
मोहल्ला  गली  घाट पर अब
आपका हल्ला सुनाई नही दे रहा है
दुबे जी आजकल हम पर चुनावी रंग
  इस कदर चढ रहा है
वोट राजनीति रैली भाषण के
सिवाय और कुछ नही सूझ रहा है
भैया आजकल खाना पीना रहना खाना
सब कुछ फी मिल रहा है और जीवन की
 मत पुछो दुबे जीवो तो
बडा मस्त गुजर रहा है
भोकने चिल्लाने रोटी के
लिए लडने की जद्दोजहद
भी कम हो रही है जिदगी अपनी
आजकल चुनावी दोर मे
मतदान सी कट रही है
रात को थक हार के पार्टी
आम सभा के टैट मे ही
सो जाते है पार्टी के नमक
 का कर्ज हम तुरंत उतार देते है
तो हम ने कहा आजकल
तुम बढिया चोकीदार निभा रहै
 हो और हम ने जो तुम है
पाला पोसा बचपन से उसे भुला
रहे हो चुनाव के बाद बेटा हम
तुम्हारा एक एक हिसाब पूर्ण कर
 देगे जी एस टी काट
कर  ही रोटी पानी  देगे
फिर मत हिलाना न दिखाना
पेट न चाटना तलवा और न
करना पहरे दारी  ओर बन
जाना आवारा गरीब कुत्ता
फिर हाथ मिलाउंगा पारटी
नेता रेली कितने
काम आते है बताऊगा
तुम कुत्ते थे कुत्ते और
कुत्ते ही रहोगे न सुधरे हो
न सुधरे थे और न कभी सुधरोगे
दुबे जी आप तो खाम खा गुस्सा हो रहे है
अरे चुनावी माहोल का
आप भी आनंद लीजिये
अपनी बेरोजगारी के दिनो मे
आप भी रोज गार पाईये
चुनाव रैली आमसभा रोड सो मे
रोजाना पाच सो खाना पीना मुफ्त पाइए
मनोज दुबे श्रीकांत

Monday, March 25, 2019

मुक्त. गजल

राम जी जाने

जाने होगा क्या  अब राम ही जाने
कोन की बने सरकार अब राम ही जानै

मंदिर मस्जिद पर जो लड लड बैठे 
उनके मन की   बात अब राम ही जाने

टैट मै बैठे  इंतजार  मे निकल गए वर्षो
 सुप्रीम कोर्ट का फैसला अब राम ही जाने

कुर्सी के लालच नेता बदलते रहे धर्म
 हिंदु मुसलमान कोन  अब राम ही जाने

 उखाड़ फेके किसे जनता किसे दे दे कुर्सी
 क्या चुनाव का फैसला अब राम ही जाने

क्या राहुल क्या मोदी क्या ममता अखिलेश
होगा कोनपी एम  देश का अब राम ही जाने

छला गए  वोट मे राम ओर रहीम दोनो श्रीकांत
क्या मंदिर क्या मस्जिद  अब राम ही जाने

मनोज दुबे श्रीकांत

Tuesday, March 19, 2019

मुक्त गजल

दर पर आने से पहलै अपना बटूआ नही दिल खोल लेना
मै नही तेरे रूपयो दो रूपयो का भूखा वो गरीबो को दे देना

मेरे दर पर दान देने वालो की लाइने लगी है लंबी और चोडी
तेरी सीरत को जरा उनकी सीरत से मिलाकर के देख लेना

ये दिखावै का दान धर्म प्रसाद मिन्नते रखले पास अपने ही
कभी कभी खाली हाथ  दर पर मेरे आकर के देख लेना

मै कर दूँगा हिसाब तेरा सब दिया लिया बराबर अब तक
फुर्सत मिलेगी दुनिया से तुझे तब मुझसे चैन से मिल लेना

लिखा रखा है मैनै लेख क ई जनमो का अपने बही खाते मे
अपने नसीब का ही तु हर जन्म मे मुझसे आकर के ले लेना

तु खीज लेना चिल्ला लेना कह देना मुझे भला बुरा क ई बार
सबक  पिछले जन्म के कर्मो का  एक बार तू देख लेना

मै तुझे दे सकता हूं स्वर्ग नर्क लोक परलोक धन दोलत सब
बस एक बार दू छोड छाड के सब  विकार मुझे अपना लेना

भगवान होते है अदितवीय अदभुद अतुलनय अनंत श्रीकांत
कभी प्रेम से तू उन्हे अपना बनाकर  के एक बार देख लेना

वो आएगै दोडे चले हरने को तेरे दुख दर्द और क्लेश सारे मन
कभी एक बार उन्हे अपने सच्चे मन से पुकार के तु देख लेना
मनोज दुबे श्रीकांत






Monday, March 18, 2019

गजल

पल दो पल को बैठ भी ले पास मेरे आकर
सुख दुख  सारे बाट भी ले मेरे पास आकर
मै दे दूँगा तुझे सब कुछ सहजता से ही
छोटा बनकर  माग भी ले मेरे पास आकर
रखूगा कुछ नही तेरा जो कुछ दिया लिया
हिसाब तेरा भी कर ले मेरे पास आकर
लेखा जोखा सब कुछ लिखकर बैठा हूँ मै
मिले जो तुझे ले भी ले पास मेरे आकर
स्वर्ग नर्क लोक परलोक बैकुंठ सब पास मे
 फिर चाहे मुझको ही मांग ले पास मेरे आकर
मै राम कृष्ण शिव विष्णु ब्रम्हा सब कुछ हू
अनेक रूप देख तू भी ले पास मेरे आकर
तुम कर दोगे निहाल श्रीकांत को बिन मांगै
कभी  जान लो  हाल तुम भी मेरे पास आकर
मनोज दुबे श्रीकांत


लोग कहा अच्छे बुरे होतै है
अच्छे बुरे तो व्यवहार होते हैं
नीर के समान ढल जाते है
 लोग जो मन से निर्मल होते हैं
कुछ सुनाकर निकाल लेते भडास
कुछ सुनकर खुश हो जाते है
मुद्दा ए बहस मे  और के जनाब
रिश्ते कुछ खराब हो जाते है
क्या ईमान क्या धर्म क्या
राजनीति मे सब एक हुए जाते है
हुआ क्या पूछ तो ले हाल मेरा
कुछ लोग हवा हुए जाते है
कुछ चले गए कुछ जाने को है श्रीकांत
स्वर्ग नर्क सब एक हुए जाते है
मनोज दुबे श्रीकांत 

Friday, March 15, 2019

लोक गीत

सखी जब  जब चुनाव आए जात है
कन्फ्यूज हम होए जात

बी जेपी कांगेस को रोल
वादे हो रहे गोलमगोल
सपा बसपा को लोटा गोल
मेनिफेसटो पर धूल पड़ी जात है

राहुल सोनिया के हाल बेहाल
अखिलेश माया उलझे मकडजाल
मोदी शाह हो रहे खुशहाल
ममता केजरी के प्राण सूखत जात है

सखी जब जब चुनाव आए जात है
कन्फ्यूज हम होए जात

सुप्रीम कोर्ट की जय जय कार
सरजीकल स्ट्राइक  की मार
आतंकी की मची जूतम पैजार
हाल पाकिस्तान को कहो नही जात है

सखी जब जब चुनाव आए जात है
कन्फ्यूज हम होए जात है

चिल्ला चिल्ला के मर गए सारे
टुकडा टुकड़ा गेंग जुड गए सारे
जुड गकर फिर बिखर ग ए सारे
मोदी की जीत इनसे पची न जात है

सखी जब जब चुनाव आए जात है
कन्फ्यूज हम होए जात है

देवे अपनो कोन को वोट
हर एक हम पर कर रहे चोट
नेता सबमे एकई खोट
 जनतंत्र लोक तंत्र मे पिस पिस जात है

सखी जब चुनाव आए जात है
कन्फ्यूज हम होए जात है








Tuesday, March 12, 2019

गजल


तख्त ए ताज मेरा सब ले लो

तख्त ए ताज  तुम मेरा सब ले लो
शहर  गली मोहल्ला मेरा सब ले लो

छोड दो बस दो लबज मोहब्बत के
इश्क हुस्न  शबाब मेरा सब ले लो

सबब इतना कि तु  न ला मुझको
खत गुलाब डायरी  मेरा सब ले लो

गुजरना न कभी भूलकर राहो से मेरी
चौक चोराह मंजिल मेरा सब ले लो

दे दो एक झरोका झाकने को तुम्हे
खिडकी दरवाजा मकान मेरा सब ले लो

छिपाकर भी छिपा न सकोगे तुम कभी
मोहब्बत के जो नाम दिया मेरा सब ले लो

जी लूंगी  फकीरी मे ही जीवन को अपना
 तुम नींद  सुख चैन ख्वाब मेरा   सब ले लो

मन्नत खुदा से मागती हूँ श्रीकांत हर वक्त ही
महफूज  रखना उन्हे  खुदा दुआ मेरी सब ले लो

मनोज दुबे श्रीकांत




Monday, March 11, 2019

मुक्त गजल.

हे राधे तुम जमना किनारे आ जाती
तान मुरली की मधुर तुम सुन जाती

मै होता तुम होती और न होता कोई
रास उस दिन तुम  साथ.रचा जाती

मैं कहता कुछ तुमसे अपने मन की
तुम कुछ अपने मन की  कह जाती

होती लहरे जमना जी की कदम पेड
किसी शाम को तुम अकेली आ जाती

कह देता जाने से पहले कुछ बाते तुमसे
तुम मथुरा जानें से पहले मिल जाती

पहुचाया था संदेश लेकर अकरूर जी को
 काश तुम मेरे मन को जरा समझ पाती

मनोज दुबे श्रीकांत



Sunday, March 10, 2019

कविता

होनै को मै एक कुत्ता हू
कान सीधे दुम टेडी रखता हूँ
गुररा लेता हूँ कभी अपनो पर 
औरो पर भोक लेता हूँ

होने को मै एक कुत्ता  हू
जानी रोनी टाइगर  नाम  मेरे
पर गुस्सा मे कुत्ता
नाम से पुकारा जाता हूँ

होने को मै एक कुत्ता हूँ
करता हूं लाड प्यार
 चुकाने को नमक की कीमत
बदतमीजी करने पर काट लेता हूँ 

होनै को मै  एक कुत्ता हूँ
गली मोहल्ल का आवारा
मेम साहब का प्यारा 
मालिक का राज दुलारा हूँ 

होने को मै एक कुता हूँ 
देशी विदेशी शहर गाव का हूँ 
रहता बिल्डिंग मे घूमता कारो मे 
 अपने इलाके का बादशाह हूँ 

होनै को मै एक कुत्ता हूँ 
धर्म जाति आरक्षण मे बटा नही 
एक रंग मे रंगी अपनी
संस्कृति की पहचान हू 

 होनै को मै एक कुत्ता हूँ
सब जानवरों मे स्थान रखता हूं
आदम जात की मिशालो मे 
वपादारी का इनाम रखता हू

मनोज दुबे श्रीकांत 

Saturday, March 9, 2019

गजल

आज संडे तुम मना ही लो

सब्र का इम्तहान अब तुम मेरा ले ही लो
आज चाहे जितना जी भर कर सो ही लो

उठ आया हू मै सुबह जल्दी से आज भी
तुम अपना भरपूर संडे तो मना ही लो

दूध लाकर बाजार से चाय बना ली मैने
  तुम गर्मा गर्म चाय  बिस्कुट तो ले ही लो

मुझे इंतजार है तुम्हारा उठकर कहने का
 कुछ काम आज तुम भी तो कर ही लो

परेशान रहती हूं रोज के कामों से ही मै
बच्चो के कामों को आज तुम देख ही लो

सुधार कर कुछ सब्जी ओर भाजियो को
किचन थोड़ा सा तुम भी संभाल ही लो

रहतै हो तुम भी तो व्यस्त सप्ताह भर के
कुछ समय हमारे लिए भी तुम निकाल ही लो


कर देगा श्रीकांत काम सब तुम्हारे कविता
तुम्हे कहना है जो जो सब आज कह ही लो

मनोज दुबे श्रीकांत 

Thursday, March 7, 2019

कविता

महिला दिवस की शुभकामनाएं

तुम मुस्कुराती रहो

तुम मुस्कुराती रहो फूलो सी
मै सुमनगंध बिखेरता रहूँ
खुशियों कै मोतियों को
 अपने आंगन मे बिखेरता रहूँ

  तुम बुनती गढती रहो ख्वाब
 मै साकार उन्हे करता रहूं
दामन तुम्हारा खुशियो से
 मै रोज रोज भरता रहूँ

 तुम चलती रहो तूलिका सी
मै कैनवास  सा होता रहू
जीवन के बेरंग बिम्ब मै
 सात रंगो उकेरता रहूँ

तुम होना रिमझिम फुहार
मै सावन सा होता रहूं
मेघदूत सा बन कर प्रिय
प्रेम को बरसाता रहूँ

 तुम  होना जूही लाजवंती सी
  मै बसंत सा होता रहूँ
होकर के रंग हरा लाल
फागुन मे बरसता रहूँ

तुम होना कभी  नदियो सी
 तो मै सागर सा होता रहूं
क्षितिज बन दूर  कही
आकाश धरा सा मिलता रहूँ

जीवन की परिणय बेला मे
 मै वचन सात सा होता रहू
थामकर हाथ तुम्हारा धामकर
बस दूर तक चलता ही रहू

तुम होना रिश्तो की कडी सी
मै घर  आंगन सा होता रहू
हौ संगनी तुम श्रीकांत की कविता
साथ  तुम्हारा ईश से मांगता रहूँ

मनोज दुबे श्रीकांत

Monday, March 4, 2019

गजल

तमन्ना
तमन्ना तो है  कि घुसकर मारकर आऊ
पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करके आऊ

आतंक की फैक्टरी के जो कारखाने बने
बम गोलो मिसाइल से उडाकर आऊ

एक कर  दू फिर  अपने हिंदुस्तान को
लाहोर कराची रावलपिंडी जीत कर आऊ

मागते है जो हिसाब शहादत का सेना से
लाश उनके ही घर पर बिछा मै के आऊ

राजनीति मे जो घसीट रहै है देश को
घसीट घसीटकर उनको मारकर आऊ

बढेते रहे आगे देश मेरा दिन ब दिन यू ही
गददारो को मन ही मन मै जलाकर आऊ

लडाते रहते जो हिंदु मुसलमान को देश मे
धर्मनिरपेक्षता का उनका मुखोटा लोचकर आऊ

गीत जो गा रहे  खाकर माल  अपने देश का
 उनको निकाल देश से पाकिस्तान छोडकर आऊ

तमन्ना श्रीकांत  बस इतनी चुनाव मे अबकी
हिसाब मांगने वालो का हिसाब पूरा कर आऊ

मनोज दुबे श्रीकांत
शनिचरा मोहल्ला कोरीघाट होशंगाबाद म प्र

गजल

क्या दे सबूत

देश के कुछ लोग को सबूत चाहिए
अपने नाम की  ही पहचान चाहिए
देश धर्म ईमान से कोई मतलब नही
जीत के लिए इनको बस वोट चाहिए
सेना पी एम से मांगते रहते हैं हिसाब
राजनीति करने का एक मोका चाहिए
रहते खाते पीते सोते है हिंदुस्तान मे
गुणगान करने को पाकिस्तान चाहिए
अमन देखकर होता है पेट मे दर्द इनके
तुष्टीकरण का ईनहै जुलाब चाहिए
डर है मिल न जाए हिंदु और मुसलमान
गिन लेते शहादत को सत्तर सालो मे
लासो का  जिन्हे सेना से हिसाब चाहिए
हिसाब दैना बराबर चुनाव मे अबकी इन्हे
टुकडे टुकड़े गैंग का फटटा साफ चाहिए
वतन पर जिनहे अपने अभिमान नही श्रीकांत
सुकून पाने को जिन्हे लोगो की लाश चाहिए
मनोज दुबे श्रीकांत






Saturday, March 2, 2019

कविता

हाल मेरे देश का बदला है दोसतो
**************************'
हाल मेरे देश का कुछ बदला है दोसतो
 खौफ नही जीत का जोश है दोसतो
सौर्य है ताकत है साहस है मन मै
मिटाने को दुश्मन कोसंकल्प है दोसतो

तेजस है मिराज है सुखोई साथ मे
उडने को अनंत आकाश है दोसतो
करने को दो दो हाथ दुश्मन से
फोलाद सा हमारा सीना है दोसतो

अग्नि है आकाश है प्रथवी है साथ मे
साधने को अचूक टार्गेट है दोसतो
धरती आकाश और सागर की लहरों पर
सेना की पदचाप का सोर है दोसतो

गुलाब है  कमल  है पंजा है साथ मे
शांति का कबूतर और बंदूक है दोसतो
लडलै वोट पर एक दूसरे से दिखाने को
देश के लिए  हम सब एक है दोसतो

 बदूक है टैक है तोप है मिसाइल
गर्जना करने को गोला बारूद है दोसतो
मिटाने को  जैश आतंकी पाकिस्तान को
हिन्दुस्तानियो का जज्बा ही काफी हे दोसतो

मनोज दुबे श्रीकांत

Thursday, February 28, 2019

गजल

अब रुकना नही मोदी जी

ऐसा न हो शहीदो की शहादत को भूल जाए
पुलवामा को भूल अभिनंदन मे लग जाए

कुछ वतन परसतो की बातो मे  हम लगकर
घाटी मे शांति के कबूतर उडाने मे लग जाए

भूलकर पाकिस्तानीयो की काली करतूतों को
  हम आतंकवादीयो की खिदमत मे लग जाए

निकले थे नेसनाबूत करने को जड़ से जिनहै
उन्हे फिर से हम  पालने पोसने मे लग जाए

कांगेस बीजेपी की राजनीति के चक्कर मे
 कही  हम अपने राष्ट्रीय धर्म को न भूल जाए

झूकने नही  देना श्रीकांत देश को मोदी जी
 देश द्रोहीयो की फोज चाहे धरने पर बैठ जाए

मनोज दुबे श्रीकांत

Tuesday, February 26, 2019




भारतीय सैनिको की वीरता को
शत शत नमन

विमान थे सो उड़ चले

विमान थे सो उड़ चले
वीर बाके चल दिए
बर्बाद करने दुश्मन को
मोत का सामान लिए

मेघ सा गर्जन किए 
दामिनी की चमक लिए 
दहकाने को दुश्मन को
 अग्नि देव का रूप लिए

समझ सके न भाप सके
दुश्मन हमको माप सके
सरहद पार जब उड चले
पवन देव का वेग लिए

वीरता ओर सौरय लिए
भारत मा की आन लिए
शहीदो की शहादत का
बदला लेने के लिए

भेदने को भेद दिए
टार्गेट पूरे कर दिए
मोत बाटने वालो को
मोत बाटकर चल दिए


मनोज दुबे श्रीकांत


Monday, February 25, 2019

मेरी बातो को तुम नजरअंदाज कर देना
मै कहू कुछ तो तुम मुझै  माफ कर देना

चलती हैं गृहस्थी तेरी और मेरी समझ सै
तालमेल मुझसे तुम अपना तुम लेना

रूठो तुम मनाऊ मै करके जतन कितने ही
मै रूठू तो तुम अपना  समर्पण कर लेना

कहना सुनना पहलू हैं अपने जौवन के
किस्सा कहानियों मे तुम संवाद कर लेना

रंग जीवन के बिखरते रहै आंगन में
मोती खुशियों के एक एक कर चुन लैना

कट जाएगी जिंदगी अपनी श्रीकांत ऐसे ही
वचन विवाह के कभी तुम पूरे कर लेना
मनोज दुबे श्रीकांत











गजल

बेकार हूँ मै

होने को  बिल्कुल बेकार हू मै
भरी दुपहरिया बेरोजगार हूँ मै

करने को कुछ काम नही पास
निजी संस्था का कामगार हूँ मै

भाग दोड मे लगा रहा दस महीने
दो महीने के लिए बेकार हूँ मै

जैबे तंग हाल रहती है आजकल
 पेकेज के जमाने तनखा हूँ मै

कैची करती है सितम वक्त वे वक्त
 पंजी मे एबसैंट एलबी डब्ल्यू हूँ मै

अनुशासन की पाबंदी की बेड़ियाँ
  किसी कोने मे टंगा कोई घंटा हूँ मै

बजा देता है कोई भी वक्त आने पर
 घड़ी मे गुजरता कालखंड हू मै

मत पूछो श्रीकांत से क्या मिला तुम्हे
गुजरते वक्त का एक कारवा हूँ मै

मनोज दुबे श्रीकांत

Saturday, February 23, 2019

गजल

होकर के मै मोबाईल सा हो गया हूँ
सुबह शाम की राम राम हो गया हूँ

 मिलते हैं रोज मुझे सोते जागते लोग
फेस बुक ट्वीटर वाटस अप हो गया हूँ

लिखते है लोग स्टेटस कमेन्ट  ट्वीट
  टैग ईवैंट पोस्ट  और ड्राफ्ट हो गया हूँ

वीडियो पोस्ट लाईक यूजर अन लाईक
सैलफी  गुरूफ फोटो स्टोरी हो गया हूँ

फेहरिस्त लगी हैं फ्रैंड की लंबी चोडी
  मेसेएजिंग कालिग चेटिंग हो गया हूँ

की पेड बेटरी  चार्जर टच स्क्रीन कवर
हैड फोन ब्लू टूथ वाई फाई हो गया हूँ

लाइव आनलाईन एक्टिवेट और डिएकटिव
यू ट्यूब हाट स्टार जियो टी वी हो गया हूँ

करते लोग उपयोग मेरा भरपूर आजकल
सेमसंग वीवो ऐपल ओपपो नोकिया हो गया हूँ

रखने लगे हैं वास्ता लोग श्रीकांत मुझसे ऐसे
 व्यवहार मे उनके आजकल गेजेट हो गया हूँ

मनोज दुबे श्रीकांत



Friday, February 22, 2019

भीम बैठका से कलम का सफर

अनुपम प्रकृति और तुम

 एक अनुपम सौंदर्य प्रकृति का ओर तुम
 पत्ते लताए वृक्ष डाली. पुष्प  और तुम

पक्षी चहचहाते फुदकते शाखाओ  पर
नीड  मे  बच्चो का कलरव और तुम

राहे टेढी मेढी सघन वृक्षों से घिरी घिरी
सफर मे  मील का पत्थर और तुम

उछल कूद करते वानर दल चोपाए
 कोयल मोर चकोर मृगनयनी ओर तुम

उची उची पहाडि़यों का मंजर हसीन
 मानव जातिवृत की निशानिया और तुम

दफन इतिहास समय के पन्नो मे वर्षो का
 माह बरष शताब्दी और सह शताब्दी तुम

भीम बैठका के पहाडो की कृति श्रीकांत
 यादे संस्मरण शब्द मात्रा और कविता तुम

मनोज  दुबे श्रीकांत

Thursday, February 21, 2019




दिखाएगा रंग कितने तू अपने मुझखो 
एक दो तीन चार पाच छह सात मुझको  

मैं ढाल लूगा  होकर इंद्र धनुष सा रंग 
 अपने से अलग समझ न तू  मुझको

 लाल नीला हरा पीला जामुनी हो जा 
 दमकूगा सफेद सा मिलाकर मे तुझको 

चाल रंग ढाल वेष भूषा सब जानता 
समझना ऐसा वैसा अब तो तु  मुझको

रंग तेरे मेरे सबके मिल जाएँगे श्रीकांत 
रंगेगा  अपने प्रेम रंग मे जब तु मुझको 

मनोज दुबे श्रीकांत 

Friday, February 15, 2019

गजल

अब ओर नही पुलवामा चाहिए

अब हमे और नही पुलवामा चाहिए
दुशमनो के कटे हुए शीश चाहिए

लेगे  बदला  शहीद बेगुनाहों का अब
खून की बूंद बूंद का हिसाब चाहिए

अमन चैन शांति सौहार्द की भावना नही
अब रण  भेरियो विजयी गूंज चाहिए

न रहै अब आतंक ओर न ही आतंकवादी
  अब सारा पाकिस्तान  ही साफ चाहिए

वतन परसतो के नाम पर पैरवी नही हो
370 और अलगाववाद का अंत चाहिए

तैयार है लडने को देश सारा श्रीकांत जंग
राजनेताओं ओर सेना का बस साथ चाहिए

मनोज दुबे श्रीकांत

Thursday, February 14, 2019

गजल


                          एक फूल तेरे लिए 



एक  लाल फूल गुलाब का तुम्हारे लिए 
मेरा सर्वस्व समर्पण बस तुम्हारे लिए

काटो में घिरी रहे चाहे मेरी जिंदगी 
सुख के बरगद की छाव तुम्हारे लिए 

तेरे सिवा नही है कोई मेरा यहा पर
गली मोहल्ला  और शहर तुम्हारे लिए 

सांस सांस पर लिखा  बस नाम तेरा ही
दिलो जान तुम और धडकन  तेरे लिए

मै प्रेम का संदेश फैलाता कोई नगमा सा
वैलैनटाइन डे  का तोहफा तुम्हारे लिए 

चलता रहा श्रीकांत कई जनमो से साथ 
 इस बार भी साथ  मेरा सिर्फ तुम्हारे लिए 

मनोज दुबे श्रीकांत 

Wednesday, February 13, 2019

गजल


मै जब होऊ गणित मैं
मै जब  होऊ अंक गणित तुम रेखा बन जाना 
जीवन के गुणा भाग मे दशमलव बन जाना

मै जोड़ घटाना सा होता रहू  जब कभी  कभी 
तुम सम  और  विषम  की संख्या बन जाना

मै  वृत आयात त्रिभुज चतुर्भुज  सा हो जाउ जब
तुम टिगनामेटरी जयामितीय सांख्यिकी बन जाना 

 मै दूरी समय गति  और वेग का पैमाना बनू जब 
तुम मापने को उन्हे मात्रा की इकाई बन जाना 

मै बनू  जब अंकगगणित समाकलन बीज गणित 
तुम गणितज्ञ की परिभाषा  और थयोरम बन जाना  

कर लेगा हल श्रीकांत जीवन के सब गणित पल में 
तुम   गणित के उत्तर की सरल सहज  रीति बन जाना 

मनोज दुबे श्रीकांत 




Monday, February 11, 2019

गीत

               नर्मदा जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं
                    ज्ञान पुंज साइंस अकादमी
                शनिचरा मौहलला कोरीघाट होशंगाबाद

   है मात नर्मदा 


           मात नर्मदा हम तेरे उपकारी मां 
             तेरी गोद मे बिताए उमरिया सारी मां 
              देते रहना मा सहारा सदा हमे तुम 
           भूल करना सदा माफ तुम हमारी मां 
                  तेरी गोद मे खेल कर ही बडे़ हुए मां  
            साकार स्वप्न सारे ही तुमसे पूर्ण हुए मां 
              तुमनै ही सब  देकर हमे निहाल किया 
               हम जो चरणो की धूल से चंदन हुए मां

               कंकर सै शंकर बन न पाया तेरा मां
             न धोया पाप धाप न तन मैने मेरा मां
             करता रहा प्रणाम बस मन से यदा कदा 
              अर्जी मेरी अब तुम  तो सुन लो मां 

                न मागू धन दोलत सुख ऐश्वर्य मेरे लिए मां 
               न धूप छाव दुख सुख का ऐहसास मेरे लिए मां 
                    करना है तो बस उपकार इतना कर देना 
                    बरसा देना अपना सनैह सदा मेरे लिए मां

                  जन्म जनमांतर से तेरे तट पर बैठा मां
               भव से पार लगाने की एक लिए आश मां
                 निर्मल निश्चल नीर सा मन मेरा पढ लेना 
                अबकी पार मुझे इस भव से कर देना मां

                   मनोज दुबे श्रीकांत

Friday, February 8, 2019

गजल

तुम बसंती हो जाना 

मै प्रेम और तुम रंग बसंती सी हो जाना
मन में तुम अनुराग जगा प्रेम बरसा रंग जाना

खिले कामिनी और मधुमालती आगन में
मन को मेरे तुम सुमन गंध सा महका जाना

हो जाए निस्तब्ध निशा जब  कभी कभी 
बनकर चाँद तुम मेरे आंगन में उतर जाना

मै हू निर्मल निश्चल नीर  सा किसी झील का 
 रूप सौन्दर्य तुम अपना कभी सवार  जाना

बनकर तूलिका चलके कैनवास पर मेरे मन के 
 खुशियो कै वो सात रंग  तुम बिखेर जाना 

  रितुराज सा श्रीकांत बिखरै जहा होकर बसंत 
वहा वहा खिलकर  तुम सरसो बसंती हो  जाना

मनोज दुबे श्रीकांत

Sunday, February 3, 2019

गीत

नर्मदा के घाट से
नर्मदा गीत

नर्मदा मे डुबकी लगा के
तनक पुन्य कमा लो रे
पाप धाप सब धो के
आपन भाग्य जगा लो रे

पान प्रसाद ध्वजा
धूप दीप फूल बाती ले आओ रे
माई के दरश के काजे
आज दोडे चले आओ रे

माई रेवा सुन के तुमरी
सब पुकार बिगड़ी बना देहे रे
सोहे भाग् कई जन्म के
 सबके जगा देहे रे

माई रेवा माई सी अपनी
ममता बरसा दे हे रे
झोली जिन जिन की खाली
सबरी भर देहे रे

निपूतन को पूत
निर्धन को धन दे देहे रे
रोग दोष ताप हर के
सुख की छाव कर देहे रे

काट के तुमरे पाप सब
पुन्य जगा दे हे रे
तट के कंकर से शंकर कर
भव पार कर देहे रे

मनोज दुबे श्रीकांत

Friday, February 1, 2019

गजल


तुम्हारे सिवा और कोई नही

तुम हो खूबसूरत इसमे सवाल नही
तुम्हारे जैसी और कोई मिशाल नही

मन में सिर्फ हो और तुम्हरा नाम ही
किसी और का मन मे खयाल नही

आते हो तो भूल जाता हूँ सब कुछ
तुम्हारे सिवाय कोई और विचार नही

तुम्हरे आने से निखर जाता हूँ और
 तेल उपटन चंदन की कोई आश नही

तुम मिल जाते हो  अनायास कही भी
किसी   स्थान विशेष की बात नही

तुम्हारे मिलने से मिल जाता है सब
कुछ न मिलनै का मन मे मलाल नही

थामा है हाथ तुमने  ही मेरा जनमो से
तुम सा कोई जीवन मे हमराही नही

तुम हो सर्वेश्वर श्रीकांत के प्रभु सदा
तुम से दूर रहना पल भर मुनासिब नही

मनोज दुबे श्रीकांत 

मुक्त गजल

              बजट
वो पिटारा सा लेकर आए हैं
कि बजट पेश करने आए हैं

नए नए रंग और  नए  तराने
योजनाए  कई लेकर आए हैं

अमीर मिडिल वर्ग किसान गरीब
सबकी पो बारह लेकर आए हैं

हुआ कुछ सस्ता  महँगा सामान
कुछ नया पैगाम लेकर आए हैं

 भर गई कई की झोलिया खाली
चुनावी बजट  जो लेकरआए हैं

ताने देता रहे विपक्ष कितने ही
सरकार बजट  लेकर आए हैं

कर दिया  चारो खाने चित श्रीकांत
मोदी जी नया दाव लेकर आए हैं

मनोज दुबेश्रीकांत

Wednesday, January 30, 2019

गजल

तलाश पूरी हुई
मिल गया कोई तो तलाश पूरी हुई
आश जीवन की जो  मेरी पूरी हुई

हो गए अरमान सारे के सारे पूरे मेरे
गयी रात जब बात उसकी पूरी हुई

वो दरिया समुन्दर झील का किनारा
 उस शाम दो दिलो की दूरी कम हुई

खिल गया चांद आकाश मे चुपके से
 वो शाम सी जब जब भी सिंदूरी हुईं

खोजता रहा जिसे मै उम्र भर अपनी
वो मेरी किशमत से ही नसीब हुई

ओर कोई नही श्रीकांत वो कविता मेरी
शब्द की साधना  से जब  तुम पूरी हुई

मनोज दुबे श्रीकांत

Sunday, January 27, 2019

गजल

 दो ग़ज़ले

           1....रंग मेरे

जमाने के रंग  देख देख बदला हूँ
आज मै गिरगिट सा हुआ हू

भाप न सका रंग  जमाना मेरा
जहा बेठा हूँ उसी रंग का हुआ हूँ

काम क्रोध मद मोह लोभ रंग मेरे
संसार का  विकारी सा हुआ हूँ

फास लू शिकार मे कभी भी तुझको
  जटिल मकड़जाल जाल सा हुआ हूँ

तू कोन और आया कहा से क्या मतलब
 अपने लिए ही स्वार्थी सा हुआ हूँ

मत पूछो मतलब रंग क्यो बदला श्रीकांत
वातावरण के अनूकूल सा हुआ हूँ

         2...दरख़्त तेरे आगन का

कई गम खुशी और आसू सहे मैनै
मै तेरे दर्द का हमदर्द हुआ  हूँ

करता रहा छाव घनी घर पर तेरे
आगंन की बूढ़ा दरख़्त हुआ हूँ

फैला कर शाखाएं खड़ा रहा तन के
जड़ से इतना मजबूत हुआ हूँ

बिखराई खुशबू फूलो की दिए फल फूल
 तेरे परिवार अन्न दाता हुआ हूँ

चुका रहा हूँ मै  कर्जा तेरा कई जनमो से
मूलधन  चक्रवर्ती ब्याज हुआ हूँ

मिट न सकेका नाम श्रीकांत का कभी
तेरी मिट्टी से ही सोना हुआ हूँ

मनोज दुबे श्रीकांत

Saturday, January 26, 2019

गजल


मै रहता हूँ तेरे दिल मे
मै रहता हूँ तेरे दिल मे सदा जमाने से
तु समझ न सका कभी मुझे जमाने से

लगा रहा रात दिन करता हाय हाय
फुर्सत नही मिली तुझे कमाने से

ढूढ लिए मंदिर मस्जिद चर्च गुरूद्वारे  कई
भरमाते रहै लोग तुझे  मुझसे मिलाने से

मिलता रहा  हर शख्स मे कही न कही
 इंकार करता रहा मुझे पहचानने से

पाकर के भी तु पाया न सका कभी मुझे
अटका रहा भटकता  तू कई जमाने से

जान ले मान ले भाप ले अब मुझको
राम रहीम नानक ईशु मे ही जमाने से

मै बसता हूँ सदा तेरे ही दिल में श्रीकांत
देखता तू ही नही जाने क्यो जमाने से

मनोज दुबे श्रीकांत 

Friday, January 25, 2019

मुक्त गजल


मेरे देश को हिंदुस्तान रहने दो

मेरे देश में अब अमन चैन रहने दो
हिंदुस्तान में हिंदुस्तानियों को रहने दो

मत बाटो देश को  मेरे जाति धर्मो मे
मंदिर मस्जिद को मन में ही बसने दो

खुदा और राम बसे एक ही दिल में
होली दीवाली ईद साथ साथ मनने दो

वोट की राजनीति का हुआ खेल बहुत
राजनीति से देश को अब दूर रहने दो

 दूर रखे विषाद सब अपने मनके सदा
राष्ट्र की अनैकता मे एकता बसने दो

 अटल मोदी राहुल चाहे बने प्रधानमंत्री
मुझे गांधी सरदार नेहरू का देश रहने दो


मनोज दुबे श्रीकांत 

Thursday, January 24, 2019

मुक्त गजल

तुम रहो आसपास ही

तुम रहो आस पास मेरे ही जहां मे रहू
तुम चलो मेरे साथ साथ ही जहा मै चलू

चुन लेना वो मोती अरमानो के बरसे जहां
समय की तातो का जाल मै जहा पर बुनू

कर लैना जीवन तरंग मयी सरिता सा तुम
प्रेम सागर सा बन जब जब भी मैं उमडू

कर लेना बाते दो चार जिंदगी की बैठकर
जिस दिन  बैठकर पास  मै सुकून से सुनू

सुख दुख जीवन के पहलू से गुजरनै लगे
जख्म मिलने  पर कभी मैं मरहम सा रहू

थम जाएगा वक्त पल भर देखने को हमे
जब जब जहां भी साथ में  मै तुम्हारे  रहू

चल देना हाथ थामकर श्रीकांत कही भी
जब चाहे जहा जहा मै तुम्हे भी ले चलू

मनोज दुबे श्रीकांत


Tuesday, January 22, 2019

कविता

 विद्यार्थियों  और अपने लिए  एक बार अवश्य पढ़ें
बातें याद आती है उनकी

सर मेडम ने बहुत समझाया पर नही हम समझे
 स्कूल कालैज लाइफ मे हम कुछ ऐसे थे बिगड़े
बदल न पाई हमे  सजा डाट और न मार इनकी
मम्मी पापा दादा दादी की प्रेम की बातो से अकडे

साल दर साल मसताते रहे हम बेफिक्र  होकर
दोसतो के संग धूमते फिरते  रहे हीरो  बनकर
नए शोक हमारे  पूरे करवाती रही चुपके से मम्मी
पता चलने पर फिजूल खर्ची पर पापा चाहे भडके

सुथार न पाई सीख हमे दादा की न पापा के ताने
 न ही सुधरे कभी हम रिजल्ट का परिणाम पाके
करते रहे ऐश सारे के सारे केरियर से दूर रहकर
अपने ही  दोसतो के बीच के स्वार्थ जाल में फसके

याद  आती है अक्सर दादा दादी पापा मम्मी की बाते
कक्षा के सर मेडम की डाटे और प्राचार्य की बाते
उलझी राहे जिंदगी की जब कठिन समस्या पाकर
देख रहे होता सब उल्टा पुलटा हम केवल पछता के

करने को कर जाते बहुत कुछ सरल राह अपनाकर
नाम करते जग में सबका रोशन अपना नाम कमाकर
मिल जाता सब कुछ सरल सहज तुम्हे जीवन मे अपने
रहते सदा माता पिता और गुरू के आज्ञाकारी बनके

मनोज दुबे श्रीकांत


Monday, January 21, 2019

मुक्त गजल


सब तुम्हारे ही आसपास

सबकी लव स्टोरी घूमती कालेज के आसपास
पर मेरी  स्टोरी तो केवल प्रिय  तुम्हारे ही आसपास

तुम्हे पता है जबसे तुमने हाथ मेरा थामा 
वक्त ठहर सा गया है प्रिय जबसे तुम्हारे ही आसपास

 किताब रजिस्टर पेन और कालेज का कैप्सस
आगन मे बस सा गया है प्रिय तुम्हारे ही आसपास

नए नए फैशन के सूट और दुपट्टे पुराने से हो गए
 जो सिंदूर बन बिखर गए हैं प्रिय तुम्हारे ही आसपास 

परंपरा रीति रिवाज मे बंध कर सुहागन हुई  जबसे 
बिंब जीवन के कई  निखरे हैं प्रिय तुम्हारे ही आसपास 

गीत गजल छंद  मुक्तक सी विधा तुम श्रीकांत की
रूप कविता के सारे बसे है प्रिय तुम्हारे ही आसपास 

मनोज दुबे श्रीकांत

Sunday, January 20, 2019

गजल

पुरानी किताब सी तुम 

बात तुम जब भी मुस्कुराकर करती हो
कुछ कुछ अजब गजब सी लगती हो
करीने से सजी एल्बम की तस्वीरों सी 
कालेज  की कोई लडकी  सी लगती हो
कालेज के मैदान का पुराना पेड सा मै 
 तुम पेड के नीचे टिपटी सी लगती हो
बिखरते हैं जहा से प्रेम के रंग आज तक 
बसंत की बसंती सरसो सी लगती हो 
वनस्पति की कक्षा की वो खिडकिया 
बाटनी की किताब सी  तुम लगती हो 
गुजरते कालखंड ने बदल डाला सब 
कोई परिक्षा के परिणाम सी लगती हो 
उलट लेता है पन्ना श्रीकांत कभी कभी 
जिदगी की पुरानी किताब सी लगती हो 
मनोज दुबे श्रीकांत 




Saturday, January 19, 2019

मुस्कुराते बच्चे

मुस्कुराते बच्चे

बच्चो की मुस्काने  मे  ही भगवान बसते हैं
इनके खिलखिलाने से ही फूल खिलते हैं

अरमान पूरे उनके हो जाते हैं  सारे पल में
जिनके घर  और आगन में बच्चे  खेलते  हैं

सुख दुख गुजर जाते है धूप छाव से जीवन
समय के पाव को  जैसे पंख लगने लगते हैं

सपने सतरंगी से आसमान मे बिखर जाते
दिन होली दीवाली और  ईद से  लगते हैं

रुठ जाए गर बच्चे तो मना लेना श्रीकांत
राम  कृष्ण मंदिर मे नही बच्चो मे ही मिलते हैं

मनोज दुबे श्रीकांत

Friday, January 18, 2019

गजल


    अखबार वाला

समाचार जाने कितने दे गया
वो सुबह सुबह अखबार दे गया

हर खबरो का समावेश था उसमे
दुख सुख  वो सब साथ दे गया

राजनीति  साहित्य और समाज
 ज्ञान विज्ञान खेल की बाते दे गया

 साथ रंग बिरंगा सतरंगी सा पन्ना
 नए विज्ञापनों का पैगाम दे गया

 आवश्यकता  के कालम के संग
किसी नोकरी का अरमान दे गया

देश विदेश प्रदेश क्षेत्र की खबरे
वो चंद पन्नो मे घर बैठे दे गया

दैखतै है उठकर सुबह से पंचाग
किशमत के नए कनैक्शन दे गया

साधने को गृह नक्षत्र सबके
  हर रोज का राशि फल दे गया

चंद  पन्नो मे छपे शब्द श्रीकांत
वो अखबार मे दिन के  रंग दे गया

मनोज दुबे श्रीकांत






गजल

तुम ऐसी तो न थी

तुम ऐसी तो नही थी जैसे पहले दिखती थी
मेरे मन मंदिर में तुम कोई मूरत सी बस्ती थी

आजकल हो जाती हो जाने क्यो पलाश सी
कभी लाजवंती बन नजाकत से झुकती थी

कभी महकती थी बन मधु मालती मधुकामनी सी
जाने क्यो कभी मेथी और मिर्ची सी लगती थी

हल्दी कुम कुम सुहाग मंगल सूत्र की मिन्नत सी
तपस्या मे रत  कभी कभी साध्वी सी लगती थी

दिखा देती हो रास्ता कभी कभी वैराग्य का
 अप्सरा मेनका और कभी रंभा सी लगती थी

 लगती थी देखने मे जन्नत की कोई हूर सी कल
बातो मे जाने क्यो अटपटी अटपटी सी लगती थी

क्या करे देख ये परिवर्तन तुम्हारे श्रीकांत आज
गृह लक्ष्मी से पहले  कोई प्रेमिका सी तुम लगती थी

मनोज दुबे श्रीकांत

Thursday, January 17, 2019

ग़ज़ल

              1. तुनक मिजाजी उनकी

जो बात करते थै कभी  हमारे साथ जाने की
उन्हे फुर्सत नही अब हमसे बतियाने की

कुछ शब्दो मे ही हमसे यू किनारा कर गए
हद हो गई उनके इस तुनक मिजाजी की

वो वादे करके कसमे खाते रहे दम भर  कर
जमती रही वादो पर परत दर परत धूल की

डर लगता है  जीवाश्म न बन जाए हम दोनो
बात करेगा जमाना फिर हमारी कई सदियो की

मिट मिट कर सवारता रहा श्रीकांत तशवीरो को
जो सजी थी एल्बम मे सबब सी तेरी यादो की

                2.   तजुर्बा

तजुर्बा ही अपना काबिले तारीफ रहा
जैब  ए  दिनाब से हरदम फखत रहा

बुलंदियों के बुल बांधते रहे हवाओ में
पिलर ए पुल हमेशा धसकता ही रहा

गुजर गए मेरी राहो  से  तीन दो पांच
हम राही  सदा ही नो दो ग्यारह रहा

स्वप्न में भी सुकून न मिलने दिया कभी
चिंताओं की सुई ले  कोई कचोटता  रहा

दोडता रहा राहो पर मंजिलों की आश मे
समय चाबुक दो चार अपने भी लगाता रहा

कसर किसी ने छोडी मुराद पूरी करने की
मिला जो गले उसके हाथो मे  खंजर रहा

क्या गुनाह कर दिया होकर के लाजमी
सितम जिंदगी तेरा भी कोई कम न रहा

मिल जाए आराम कही श्रीकांत दो पल
दरख़्त  घना कोई ताउम्र तलाशता रहा

        3. तुम ऐसी तो न थी

तुम ऐसी तो नही थी जैसे पहले दिखती थी
मेरे मन मंदिर में तुम कोई मूरत सी बस्ती थी

आजकल हो जाती हो जाने क्यो पलाश सी
कभी लाजवंती बन नजाकत से झुकती थी

कभी महकती थी बन मधु मालती मधुकामनी सी
 जाने क्यो कभी मेथी और मिर्ची सी लगती थी

हल्दी कुम कुम सुहाग मंगल सूत्र की मिन्नत सी
तपस्या मे रत  कभी कभी साध्वी सी लगती थी

दिखा देती हो रास्ता कभी कभी वैराग्य का
 अप्सरा मेनका और कभी रंभा सी लगती थी

 लगती थी देखने मे जन्नत की कोई हूर सी कल
बातो मे जाने क्यो अटपटी अटपटी सी लगती थी

क्या करे देख ये परिवर्तन तुम्हारे श्रीकांत आज
गृह लक्ष्मी से पहले  कोई प्रेमिका सी तुम लगती थी


          4. बदलाव

सुना इंसा आजकल कुछ बदल रहे है
खुद के आस्तीन गिरेबान सम्हाल रहे हैं

हो जाते हैं सरे राह बेनकाब लोगो से
आज उन्ही के दिलो को सम्हाल रहे हैं

पूछते फिर रहे हाल ए तबियत  उनसे
लोग जो मरहम चोटो पर लगा रहे हैं

सुना है पास ही के घर मे रहमत बरसती
न जाने क्यूँ फिर खुदा के घर जा रहे हैं

एक फूल रख लेना किताबो के बीच उनका
कल जो विदा होकर अपने घर जा रहे हैं

याद कुछ कुछ है श्रीकांत उन दिनो की ही
दिन आजकल  के तो हवा हुए जा रहे हैं

       5. क्या दोगे राम को जवाब

छोडकर राम को कहा जाओगे
अपने अंदर ही राम  को पाओगे

दोगे हिसाब जाकर के ऊपर क्या
क्या राम से ही झूठ बोल पाओगे

क्या कसमे और क्या वादे मंदिर के
बेईमान हो  किसे मुह दिखाओगै

पडे रहेगे बंगले मोटर और गाडी
सवार हो कंधो पर जब जाओगे

वोट पाकर फरेबी से पा ली कुर्सी
बाधकर क्या ऊपर ले जाओगे

राम दे देगे गर जरा आराम तुम्हे
नाम फिर राम का किसे सुनाओगे

वादा खिलाफी  ठीक नही श्रीकांत
राम के बिना वहा कैसे जाओगे


         6. प्रैमिका सी हो जाओ


छोडकर चोका चूल्हा तुम मेरे पास बैठ जाओ
त्याग कर गृहस्थी सब तुम मेरे साथ आ जाओ

होकर के रही तुम बेहतर पत्नी जीवन भर मेरे
दो पल के लिए प्रेमिका  सी कालेज की हो जाओ

छोडकर सब्जी भाजी नमक मिर्ची तेल के नगमे
गजल फिर कालेज की टिपटी की सुना जाओ

बदलकर लिबास अपना साडी और ब्लाउज का
लाल हरे रंग का शूट और रेशमी दुपट्टे मे आ जाओ

छोडकर चिंता भविष्य पैसो बच्चो ओर दुनिया की
बाटनी की किताब का रखा गुलाब सी हो जाओ।

गुनगुनाने ले कविता श्रीकांत तुम्हे मन से अपने भी
गीत गजल कविता सा मै और तरन्नुम  तुम हो जाओ

          7. प्रियतुम  रूठकर मान जाया करो


बात करती  हो रूठ जाने कीकभी मान भी जाया करो
छोटी छोटी गलतियों को नजर अंदाज कर जाया करो

दिए थे वचन दोनो ने अग्नि के सामने ही एक दूजे को
 कभी मै रूठू तो तुम सहज ही  मुझसे मान जाया करो

खटपट होती है विचारो की मन में कभी कभी अपनो में
कभी उग्र हो जाऊ तो कभी शांत तुम ही हो जाया करो

क्या मेरा क्या तुम्हारा है प्रिय इस गृहस्थी के जीवन में
कभी मै प्राणप्रिय तो कभी तुम सर्वेशवर हो जाया करो

लगा रहता है जीवन में सुख दुख धूप छाव सा जीवन में
कभी मै बरगद तो तो तुम नीम आगन की हो जाया करो

मै रहूगा साथ साथ सदा तुम्हारे ही श्रीकांत हर जन्म मे
मै राही और  तुम हमराही  मेरे जीवन की  बन जाया करो


           8.फुर्सत मिले तुम्हे


चाय मे  थोड़ी चीनी कम मिलाया करो
बात प्रेम के मिठास वाली की किया करो

नमक मिर्च तेल  और हल्दी को छोड़कर
कभी कभी कुंकुम मोती बिंदी हो जाया करो

निकलकर कभी कभी किचन से बाहर
कालेज की रोड पर साथ में चला करो

कैलेनडर पलटती रहती हो हिसाब मे
चोदह फरवरी को थोड़ा रुक जाया करो

देखती है अब भी वो टिपटी पेड की तुम्हे
तुम वनस्पति की किताब हो जाया करो

इंतजार आज भी करता है श्रीकांत वैसे ही
कालेज के जमाने मे कभी लोट आया करो

            9. बात इश्क की किया न करो


बात इश्क की जमाने से तुम न किया करो
अपने आपको आईने में देख लिया करो

तेरे दर पर तो पहरे  हजार लगा कर बैठे
मुझे झरोखो से तुम  छुप  कर देखा न करो

भागती हो  डरती शहमती अक्सर  डायरी में
हकीकतो मे कभी साथ  मेरे हो लिया करो

बंद है  रिवाज कागज में  प्रेम पत्र लिखने का
कभी मोबाइल पर आन लाइन हो जाया करो

ढूंढती हो बहाने क्यो मिलने के श्रीकांत से
 तुम गीत गजल  और कविता  हो जाया करो




           10 अभिनंदन हो


नव वर्ष  तुम्हारा अभिनंदन हो
नूतन दिवस  शुभ मंगल  हो

सुख दुख सब रहे सम जीवन
 इस साल ऐसे गृह नक्षत्र हो

दिन सिदूरी शाम सुनहरी
रात शीतल चांदनी हो

बयार हो सुमनगंध सी
 प्रेम रंग बसंत उत्सव हो

मिल जाए सब सहज ही
आशीष बड़े बुजुर्गों का हो

दुख तीखी धूप रहे तो
सुख छाव नीम बरगद हो

अभिनंदन करे श्रीकांत
तुम्हारा पसारे वाहे नित ही

मै रहू चाहे धूमिल गर्त सा
आगाज तुम्हारा स्वर्णिम हो

मनोज दुबे श्रीकांत

गीत

मंदिर को निर्माण

अब तो मंदिर को निर्माण
राम जी जाने है सरकार
 कांग्रेस बी जे पी को लग रहो
अब तो एक ही व्यवहार

मंदिर मस्जिद पर लडाकर बैठै
राम जी को घर तुडाकर बैठै
ठंड बरसात गर्मी सब सह रहे
टैंट मे अपने राम जी सरकार

            अब तो मंदिर को निर्माण
             राम जी जाने है सरकार

सुप्रीम कोर्ट मे मामला अटको
फैसला पे अब लगो है खटको
तारीख पे तारीख नित बढ रही
चेन की नींद मे मोदी की सरकार

            अब तो मंदिर को निर्माण
             राम जी जाने है सरकार

राम  राम कह चुनाव जीत गए
कुर्सी पाके राम काज भूल गए
संघ विहिप को ताक मे रख के
धर्म निरपेक्ष बन रही अब सरकार

          अब तो मंदिर को निर्माण
             राम जी जाने है सरकार

राम नाम को ओढै के दुपट्टा
मार रहे वोट बैंक पे झपट्टा
शूद्र जन अल्पसंख्यक काजे
घुटना टेक खड़ी सरकार

         अब तो मंदिर को निर्माण
          राम जी जाने है सरकार

 हे धर्म धुरंधर राम लला जी
दिखाओ कछु चमत्कार प्रभु जी
रास्ता देख देख प्रभु हारे
कब आओगे अयोध्या सरकार

           अब तो मंदिर को निर्माण
             राम जी जाने है सरकार

विनती तनक अब मोरी सुनियो
नेता की बात उर न धरियो
जा कल युग कै कालनेमी सब
 जज वकील कोर्ट और  सरकार

 अब तो मंदिर को निर्माण
राम जी जाने है सरकार

   बगुला भगत है सारे के सारे
मुह में राम छुरी के रखवारे
पाच प्रदेश तो निपटा दए
रखियो अल्पमत की सरकार

           अब तो मंदिर को निर्माण
             राम जी जाने है सरकार
             कांग्रेस बी जे पी के लग रहे
            अब तो एक ई व्यवहार

मनोज दुबे श्रीकांत

गजल

नाम तेरा ही है

हर जुबान पर बस तेरा ही नाम है
चोक चोराह नाम से ही आबाद है

रहती है तू जिस गली मे आजकल
वो नाम से  अब तक तेरे बदनाम है

गुजरना चाहता हूं उन राहो से कभी
जहा  आज भी तेरा  वही मकान    है

खिडकी दरवाजे बंद कर लेना तेरे
 मेरा घर तेरे दिल के कौने मै ही है

बात करता हूँ श्रीकांत बस तेरी ही
तशवीर आज भी तेरी एल्बम में है

मनोज दुबे श्रीकांत

Wednesday, January 16, 2019

गजल

गजल

देख ले मुझको एक बार आकर के
नजरो से अपनी नजरे मिलाकर के
बैठा हूँ मै बरसो से इंतजार मे तेरे
सुकून दिला दे दिल को आकर के
राह सूनी है सूना आगन अब तक
जमा दे  रंग बसंती सा तू आकर के
रंग हरा लाल बिखरा दे जीवन में
जीवन पथ की संगनी होकर के
सुना है जमाने और उसकी बातो को
मिटा दे सब शंकाए  तू आकर के
क्या जवाब दे श्रीकांत जमाने को
दे दे जवाब सारे तू ही आकर के

मनोज दुबे श्रीकांत


गजल

ऐतबार नही

मेरी बातो  से तुझको ऐतबार नही
क्या बता तुझको मुझसे प्यार नही
तुम तो कहती थी थामकर  बाहे
क्या मेरे वादो पर  ऐतबार नही
नाम तेरा हथेली  जहन मे मेरे
क्या मोहब्बत पर  ऐतबार नही
हूँ परिदा सा मे और समा सी तू 
क्या जलने पर  मेरा तुझे ऐतबार नही
चला था राहो पर श्रीकांत तेरी ही
क्या मंजिलो पर तेरी ऐतबार नही
मनोज दुबे श्रीकांत



Tuesday, January 15, 2019

Kavita punj

अजीज है जो
        हर कोई मुझे धोकर चला जाता है
        मोटर गाड़ी कपडा बना जाता  है
       बिना सर्फ ऐरियल के चमकता हूँ मै
       शब्दो से दो चार मुझे कर जाता है
       नजाकत उसकी रह जाती कोने में
       सरेयाम बैनकाब जो कर जाता है
       मै मै और तु तु हैं गालिब जमाने में
       फर्क मुझमे तुझमे हो ही जाता है
       देखता हूँ बानगी हर एक शख्स की
      जोहरी किसी हीरे का हुआ जाता है
     क्या रंग तेरा क्या रंग है मेरा पानी मे
    पानी जो निर्मल निश्चल सा रह जाता है
     जख्म दे दे श्रीकांत जमाने कितने ही
     अजीज है कोई सिराने दवा रख जाता है
    मनोज दुबे श्रीकांत
    
      

मुक्त गजल

     
         अजीज है जो
        हर कोई मुझे धोकर चला जाता है
        मोटर गाड़ी कपडा बना जाता  है
       बिना सर्फ ऐरियल के चमकता हूँ मै
       शब्दो से दो चार मुझे कर जाता है
       नजाकत उसकी रह जाती कोने में
       सरेयाम बैनकाब जो कर जाता है
       मै मै और तु तु हैं गालिब जमाने में
       फर्क मुझमे तुझमे हो ही जाता है
       देखता हूँ बानगी हर एक शख्स की
      जोहरी किसी हीरे का हुआ जाता है
     क्या रंग तेरा क्या रंग है मेरा पानी मे
    पानी जो निर्मल निश्चल सा रह जाता है
     जख्म दे दे श्रीकांत जमाने कितने ही
     अजीज है कोई सिराने दवा रख जाता है
    मनोज दुबे श्रीकांत
   
     
   
   
   

मुक्त गजल

नाम तेरा ही है

हर जुबान पर बस तेरा ही नाम है
चोक चोराह नाम से ही आबाद है

रहती है तू जिस गली मे आजकल
वो नाम से  अब तक तेरे बदनाम है

गुजरना चाहता हूं उन राहो से कभी
जहा  आज भी तेरा  वही मकान    है

खिडकी दरवाजे बंद कर लेना तेरे
 मेरा घर तेरे दिल के कौने मै ही है

बात करता हूँ श्रीकांत बस तेरी ही
तशवीर आज भी तेरी एल्बम में है

मनोज दुबे श्रीकांत 

Kavita

एक पिता की सोच

जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे

मेरे सिर और कंधे और ऊचे  होने लगे हैं
जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े  होने लगे हैं
अरमान फिर आखो में नए नए गढने लगे
 ओर पंख मेरे सपनो को फिर लगने लगे हैं

कपडे़ मेरे नए से पुराने  से होने लगे हैं
जूतो को नए  पेर  रास्ते मिलने लगे हैं
कालर के करीने अब और सजने लगे हैं 
 जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे हैं 

दिन फिक्र के अब यू ही गुजरने लगे हैं
 जो आम नीम मेरे आगन बढने लगे हैं
सहारा उन हाथो को मिलनै लगा आज
 हाथ जो  मेरे आजकल कापने से लगे है

दिन  जाने अब. कहा बीत जाने लगे हैं
शहर मोहल्ला अब आगन होने लगे हैं
दिन मेरे बचपन के फिर लोटने लगे हैं 
जिस दिन से मेरे बच्चे बडे होने लगे हैं

घडि़यों के काटे आजकल थमने लगे हैं
दिन एलबमो से तस्वीर मे उकरने लगे हैं
बैठता हूं दहलान के पलंग पर जब भी
सुख दुख फिर बूढे़ बरगद से होने लगे हैं

हाल जानने को मेरे चक्कर लगने लगे हैं 
दिन चिंता के मेरे अब उसके लगने लगे हैं
तलाशता रहता हूँ खुद को अब उनमे ही मै 
जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे हैं 
मनोज दुबे श्रीकांत

मेरी नजर मे अपनो को करीब से देखता हूँ मे दिल को खोलके देखता है मे नजरो को मत झुकाना सामने मेरे नजरो मे झाक कर देखता हूँ मैं तुममे मै और मुझमे तुम ही हूँ बात तुम्हारे मन की जानता हूँ मै रहते हो जिस अंदाज मै आजकल उन जजबातो को भी भापता हूं मै रहनुमाई खुदा होगी एक दिन कभी बात यह सदियो से जानता हूँ मे करता हूं इबादत तेरी ही आजकल खुदा तुझको अपना ही मानता हूं मै मिट जाऊगा श्रीकांत उसके लिए कभी अजीज दिल का जिसे भी जानता हूं मै मनोज दुबे श्रीकांत


व्यंग

 [12/9/2020, 11:56 AM] Manoj Dubey: आन लाईन कलास का पंगा  कल आन लाईन कलास मे  हमने कैमरा आन करने का  बोला कुछ छातरो का  मन भय से डोला  पंद्र...