Wednesday, May 20, 2020

कविता

लाकडाउन मे रियायत है क्या



लाक डाउन में तुम घर में पड़े रहे
खा खाकर दुश्मन अनाज  के होते रहे

 अब प्रीतम अपने काम पर लग जाओ
   लाक डाउन हटा  बाजार फिर से  खुल रहे

 अब  सोओ तुम देर तक सुबह नो बजे तक
बॉस  रास्ता तुम्हारी आफिस मे देख रहे

चाय नाश्ता भोजन सब कुछ दिया मैन
अब तुम्हारे दिन आराम के लद रहे

चाय पान  चौराहे के मित्र बेचैन मिलने को
 सब्जी राशन के झोले  टंगने हाथ  बेताब हो रहे

 खिल खिलाकर  यू बोली  सखी से पत्नी सबकी
गुईया  बड़े दिन बाद  आज ये काम पर जा रहे

सब की पत्नियों ने  ली  सांस सुकून की श्रीकांत
 बड़बड़ाते खिजियाते घर अब शांत हो रहे

मनोज दुबे श्रीकांत

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