सानेट का ऐक
प्रयाश
कल वो मुझसे कुछ ऐसा बोली
खलती रहे मुझे उसकी भाषा बोली
गुनता रहा मे मन ही मन मे सब
घर से बाहर न निकला जब वो निकली
चलता रहा मन मे अजीब अंतर्द्वंद
छलकर के वो मुझे कुछ ऐसी डोली
जलता रहा मै और जलती रही वो
झमकती लता सी होकर ऐसी होली
टूटता सा काच सा चरमराय करके
ठुमक ठुमक के वो बनके निकली
डब डबाती आखो से निकलते आसू
ढलती शाम उस दिन की ऐसी निकली
तुम ऐसी तो थी नही कभी फिर बदली कैसे
थमे निशचल नीर कोई हलचल हो जैसे
दमकती रही दामिन तुम डाराती मन को
धुनता रहा मन मे उधेडबुन मे खुशियो मे
मनोज दुबे श्रीकांत

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