Wednesday, January 30, 2019

गजल

तलाश पूरी हुई
मिल गया कोई तो तलाश पूरी हुई
आश जीवन की जो  मेरी पूरी हुई

हो गए अरमान सारे के सारे पूरे मेरे
गयी रात जब बात उसकी पूरी हुई

वो दरिया समुन्दर झील का किनारा
 उस शाम दो दिलो की दूरी कम हुई

खिल गया चांद आकाश मे चुपके से
 वो शाम सी जब जब भी सिंदूरी हुईं

खोजता रहा जिसे मै उम्र भर अपनी
वो मेरी किशमत से ही नसीब हुई

ओर कोई नही श्रीकांत वो कविता मेरी
शब्द की साधना  से जब  तुम पूरी हुई

मनोज दुबे श्रीकांत

Sunday, January 27, 2019

गजल

 दो ग़ज़ले

           1....रंग मेरे

जमाने के रंग  देख देख बदला हूँ
आज मै गिरगिट सा हुआ हू

भाप न सका रंग  जमाना मेरा
जहा बेठा हूँ उसी रंग का हुआ हूँ

काम क्रोध मद मोह लोभ रंग मेरे
संसार का  विकारी सा हुआ हूँ

फास लू शिकार मे कभी भी तुझको
  जटिल मकड़जाल जाल सा हुआ हूँ

तू कोन और आया कहा से क्या मतलब
 अपने लिए ही स्वार्थी सा हुआ हूँ

मत पूछो मतलब रंग क्यो बदला श्रीकांत
वातावरण के अनूकूल सा हुआ हूँ

         2...दरख़्त तेरे आगन का

कई गम खुशी और आसू सहे मैनै
मै तेरे दर्द का हमदर्द हुआ  हूँ

करता रहा छाव घनी घर पर तेरे
आगंन की बूढ़ा दरख़्त हुआ हूँ

फैला कर शाखाएं खड़ा रहा तन के
जड़ से इतना मजबूत हुआ हूँ

बिखराई खुशबू फूलो की दिए फल फूल
 तेरे परिवार अन्न दाता हुआ हूँ

चुका रहा हूँ मै  कर्जा तेरा कई जनमो से
मूलधन  चक्रवर्ती ब्याज हुआ हूँ

मिट न सकेका नाम श्रीकांत का कभी
तेरी मिट्टी से ही सोना हुआ हूँ

मनोज दुबे श्रीकांत

Saturday, January 26, 2019

गजल


मै रहता हूँ तेरे दिल मे
मै रहता हूँ तेरे दिल मे सदा जमाने से
तु समझ न सका कभी मुझे जमाने से

लगा रहा रात दिन करता हाय हाय
फुर्सत नही मिली तुझे कमाने से

ढूढ लिए मंदिर मस्जिद चर्च गुरूद्वारे  कई
भरमाते रहै लोग तुझे  मुझसे मिलाने से

मिलता रहा  हर शख्स मे कही न कही
 इंकार करता रहा मुझे पहचानने से

पाकर के भी तु पाया न सका कभी मुझे
अटका रहा भटकता  तू कई जमाने से

जान ले मान ले भाप ले अब मुझको
राम रहीम नानक ईशु मे ही जमाने से

मै बसता हूँ सदा तेरे ही दिल में श्रीकांत
देखता तू ही नही जाने क्यो जमाने से

मनोज दुबे श्रीकांत 

Friday, January 25, 2019

मुक्त गजल


मेरे देश को हिंदुस्तान रहने दो

मेरे देश में अब अमन चैन रहने दो
हिंदुस्तान में हिंदुस्तानियों को रहने दो

मत बाटो देश को  मेरे जाति धर्मो मे
मंदिर मस्जिद को मन में ही बसने दो

खुदा और राम बसे एक ही दिल में
होली दीवाली ईद साथ साथ मनने दो

वोट की राजनीति का हुआ खेल बहुत
राजनीति से देश को अब दूर रहने दो

 दूर रखे विषाद सब अपने मनके सदा
राष्ट्र की अनैकता मे एकता बसने दो

 अटल मोदी राहुल चाहे बने प्रधानमंत्री
मुझे गांधी सरदार नेहरू का देश रहने दो


मनोज दुबे श्रीकांत 

Thursday, January 24, 2019

मुक्त गजल

तुम रहो आसपास ही

तुम रहो आस पास मेरे ही जहां मे रहू
तुम चलो मेरे साथ साथ ही जहा मै चलू

चुन लेना वो मोती अरमानो के बरसे जहां
समय की तातो का जाल मै जहा पर बुनू

कर लैना जीवन तरंग मयी सरिता सा तुम
प्रेम सागर सा बन जब जब भी मैं उमडू

कर लेना बाते दो चार जिंदगी की बैठकर
जिस दिन  बैठकर पास  मै सुकून से सुनू

सुख दुख जीवन के पहलू से गुजरनै लगे
जख्म मिलने  पर कभी मैं मरहम सा रहू

थम जाएगा वक्त पल भर देखने को हमे
जब जब जहां भी साथ में  मै तुम्हारे  रहू

चल देना हाथ थामकर श्रीकांत कही भी
जब चाहे जहा जहा मै तुम्हे भी ले चलू

मनोज दुबे श्रीकांत


Tuesday, January 22, 2019

कविता

 विद्यार्थियों  और अपने लिए  एक बार अवश्य पढ़ें
बातें याद आती है उनकी

सर मेडम ने बहुत समझाया पर नही हम समझे
 स्कूल कालैज लाइफ मे हम कुछ ऐसे थे बिगड़े
बदल न पाई हमे  सजा डाट और न मार इनकी
मम्मी पापा दादा दादी की प्रेम की बातो से अकडे

साल दर साल मसताते रहे हम बेफिक्र  होकर
दोसतो के संग धूमते फिरते  रहे हीरो  बनकर
नए शोक हमारे  पूरे करवाती रही चुपके से मम्मी
पता चलने पर फिजूल खर्ची पर पापा चाहे भडके

सुथार न पाई सीख हमे दादा की न पापा के ताने
 न ही सुधरे कभी हम रिजल्ट का परिणाम पाके
करते रहे ऐश सारे के सारे केरियर से दूर रहकर
अपने ही  दोसतो के बीच के स्वार्थ जाल में फसके

याद  आती है अक्सर दादा दादी पापा मम्मी की बाते
कक्षा के सर मेडम की डाटे और प्राचार्य की बाते
उलझी राहे जिंदगी की जब कठिन समस्या पाकर
देख रहे होता सब उल्टा पुलटा हम केवल पछता के

करने को कर जाते बहुत कुछ सरल राह अपनाकर
नाम करते जग में सबका रोशन अपना नाम कमाकर
मिल जाता सब कुछ सरल सहज तुम्हे जीवन मे अपने
रहते सदा माता पिता और गुरू के आज्ञाकारी बनके

मनोज दुबे श्रीकांत


Monday, January 21, 2019

मुक्त गजल


सब तुम्हारे ही आसपास

सबकी लव स्टोरी घूमती कालेज के आसपास
पर मेरी  स्टोरी तो केवल प्रिय  तुम्हारे ही आसपास

तुम्हे पता है जबसे तुमने हाथ मेरा थामा 
वक्त ठहर सा गया है प्रिय जबसे तुम्हारे ही आसपास

 किताब रजिस्टर पेन और कालेज का कैप्सस
आगन मे बस सा गया है प्रिय तुम्हारे ही आसपास

नए नए फैशन के सूट और दुपट्टे पुराने से हो गए
 जो सिंदूर बन बिखर गए हैं प्रिय तुम्हारे ही आसपास 

परंपरा रीति रिवाज मे बंध कर सुहागन हुई  जबसे 
बिंब जीवन के कई  निखरे हैं प्रिय तुम्हारे ही आसपास 

गीत गजल छंद  मुक्तक सी विधा तुम श्रीकांत की
रूप कविता के सारे बसे है प्रिय तुम्हारे ही आसपास 

मनोज दुबे श्रीकांत

Sunday, January 20, 2019

गजल

पुरानी किताब सी तुम 

बात तुम जब भी मुस्कुराकर करती हो
कुछ कुछ अजब गजब सी लगती हो
करीने से सजी एल्बम की तस्वीरों सी 
कालेज  की कोई लडकी  सी लगती हो
कालेज के मैदान का पुराना पेड सा मै 
 तुम पेड के नीचे टिपटी सी लगती हो
बिखरते हैं जहा से प्रेम के रंग आज तक 
बसंत की बसंती सरसो सी लगती हो 
वनस्पति की कक्षा की वो खिडकिया 
बाटनी की किताब सी  तुम लगती हो 
गुजरते कालखंड ने बदल डाला सब 
कोई परिक्षा के परिणाम सी लगती हो 
उलट लेता है पन्ना श्रीकांत कभी कभी 
जिदगी की पुरानी किताब सी लगती हो 
मनोज दुबे श्रीकांत 




Saturday, January 19, 2019

मुस्कुराते बच्चे

मुस्कुराते बच्चे

बच्चो की मुस्काने  मे  ही भगवान बसते हैं
इनके खिलखिलाने से ही फूल खिलते हैं

अरमान पूरे उनके हो जाते हैं  सारे पल में
जिनके घर  और आगन में बच्चे  खेलते  हैं

सुख दुख गुजर जाते है धूप छाव से जीवन
समय के पाव को  जैसे पंख लगने लगते हैं

सपने सतरंगी से आसमान मे बिखर जाते
दिन होली दीवाली और  ईद से  लगते हैं

रुठ जाए गर बच्चे तो मना लेना श्रीकांत
राम  कृष्ण मंदिर मे नही बच्चो मे ही मिलते हैं

मनोज दुबे श्रीकांत

Friday, January 18, 2019

गजल


    अखबार वाला

समाचार जाने कितने दे गया
वो सुबह सुबह अखबार दे गया

हर खबरो का समावेश था उसमे
दुख सुख  वो सब साथ दे गया

राजनीति  साहित्य और समाज
 ज्ञान विज्ञान खेल की बाते दे गया

 साथ रंग बिरंगा सतरंगी सा पन्ना
 नए विज्ञापनों का पैगाम दे गया

 आवश्यकता  के कालम के संग
किसी नोकरी का अरमान दे गया

देश विदेश प्रदेश क्षेत्र की खबरे
वो चंद पन्नो मे घर बैठे दे गया

दैखतै है उठकर सुबह से पंचाग
किशमत के नए कनैक्शन दे गया

साधने को गृह नक्षत्र सबके
  हर रोज का राशि फल दे गया

चंद  पन्नो मे छपे शब्द श्रीकांत
वो अखबार मे दिन के  रंग दे गया

मनोज दुबे श्रीकांत






गजल

तुम ऐसी तो न थी

तुम ऐसी तो नही थी जैसे पहले दिखती थी
मेरे मन मंदिर में तुम कोई मूरत सी बस्ती थी

आजकल हो जाती हो जाने क्यो पलाश सी
कभी लाजवंती बन नजाकत से झुकती थी

कभी महकती थी बन मधु मालती मधुकामनी सी
जाने क्यो कभी मेथी और मिर्ची सी लगती थी

हल्दी कुम कुम सुहाग मंगल सूत्र की मिन्नत सी
तपस्या मे रत  कभी कभी साध्वी सी लगती थी

दिखा देती हो रास्ता कभी कभी वैराग्य का
 अप्सरा मेनका और कभी रंभा सी लगती थी

 लगती थी देखने मे जन्नत की कोई हूर सी कल
बातो मे जाने क्यो अटपटी अटपटी सी लगती थी

क्या करे देख ये परिवर्तन तुम्हारे श्रीकांत आज
गृह लक्ष्मी से पहले  कोई प्रेमिका सी तुम लगती थी

मनोज दुबे श्रीकांत

Thursday, January 17, 2019

ग़ज़ल

              1. तुनक मिजाजी उनकी

जो बात करते थै कभी  हमारे साथ जाने की
उन्हे फुर्सत नही अब हमसे बतियाने की

कुछ शब्दो मे ही हमसे यू किनारा कर गए
हद हो गई उनके इस तुनक मिजाजी की

वो वादे करके कसमे खाते रहे दम भर  कर
जमती रही वादो पर परत दर परत धूल की

डर लगता है  जीवाश्म न बन जाए हम दोनो
बात करेगा जमाना फिर हमारी कई सदियो की

मिट मिट कर सवारता रहा श्रीकांत तशवीरो को
जो सजी थी एल्बम मे सबब सी तेरी यादो की

                2.   तजुर्बा

तजुर्बा ही अपना काबिले तारीफ रहा
जैब  ए  दिनाब से हरदम फखत रहा

बुलंदियों के बुल बांधते रहे हवाओ में
पिलर ए पुल हमेशा धसकता ही रहा

गुजर गए मेरी राहो  से  तीन दो पांच
हम राही  सदा ही नो दो ग्यारह रहा

स्वप्न में भी सुकून न मिलने दिया कभी
चिंताओं की सुई ले  कोई कचोटता  रहा

दोडता रहा राहो पर मंजिलों की आश मे
समय चाबुक दो चार अपने भी लगाता रहा

कसर किसी ने छोडी मुराद पूरी करने की
मिला जो गले उसके हाथो मे  खंजर रहा

क्या गुनाह कर दिया होकर के लाजमी
सितम जिंदगी तेरा भी कोई कम न रहा

मिल जाए आराम कही श्रीकांत दो पल
दरख़्त  घना कोई ताउम्र तलाशता रहा

        3. तुम ऐसी तो न थी

तुम ऐसी तो नही थी जैसे पहले दिखती थी
मेरे मन मंदिर में तुम कोई मूरत सी बस्ती थी

आजकल हो जाती हो जाने क्यो पलाश सी
कभी लाजवंती बन नजाकत से झुकती थी

कभी महकती थी बन मधु मालती मधुकामनी सी
 जाने क्यो कभी मेथी और मिर्ची सी लगती थी

हल्दी कुम कुम सुहाग मंगल सूत्र की मिन्नत सी
तपस्या मे रत  कभी कभी साध्वी सी लगती थी

दिखा देती हो रास्ता कभी कभी वैराग्य का
 अप्सरा मेनका और कभी रंभा सी लगती थी

 लगती थी देखने मे जन्नत की कोई हूर सी कल
बातो मे जाने क्यो अटपटी अटपटी सी लगती थी

क्या करे देख ये परिवर्तन तुम्हारे श्रीकांत आज
गृह लक्ष्मी से पहले  कोई प्रेमिका सी तुम लगती थी


          4. बदलाव

सुना इंसा आजकल कुछ बदल रहे है
खुद के आस्तीन गिरेबान सम्हाल रहे हैं

हो जाते हैं सरे राह बेनकाब लोगो से
आज उन्ही के दिलो को सम्हाल रहे हैं

पूछते फिर रहे हाल ए तबियत  उनसे
लोग जो मरहम चोटो पर लगा रहे हैं

सुना है पास ही के घर मे रहमत बरसती
न जाने क्यूँ फिर खुदा के घर जा रहे हैं

एक फूल रख लेना किताबो के बीच उनका
कल जो विदा होकर अपने घर जा रहे हैं

याद कुछ कुछ है श्रीकांत उन दिनो की ही
दिन आजकल  के तो हवा हुए जा रहे हैं

       5. क्या दोगे राम को जवाब

छोडकर राम को कहा जाओगे
अपने अंदर ही राम  को पाओगे

दोगे हिसाब जाकर के ऊपर क्या
क्या राम से ही झूठ बोल पाओगे

क्या कसमे और क्या वादे मंदिर के
बेईमान हो  किसे मुह दिखाओगै

पडे रहेगे बंगले मोटर और गाडी
सवार हो कंधो पर जब जाओगे

वोट पाकर फरेबी से पा ली कुर्सी
बाधकर क्या ऊपर ले जाओगे

राम दे देगे गर जरा आराम तुम्हे
नाम फिर राम का किसे सुनाओगे

वादा खिलाफी  ठीक नही श्रीकांत
राम के बिना वहा कैसे जाओगे


         6. प्रैमिका सी हो जाओ


छोडकर चोका चूल्हा तुम मेरे पास बैठ जाओ
त्याग कर गृहस्थी सब तुम मेरे साथ आ जाओ

होकर के रही तुम बेहतर पत्नी जीवन भर मेरे
दो पल के लिए प्रेमिका  सी कालेज की हो जाओ

छोडकर सब्जी भाजी नमक मिर्ची तेल के नगमे
गजल फिर कालेज की टिपटी की सुना जाओ

बदलकर लिबास अपना साडी और ब्लाउज का
लाल हरे रंग का शूट और रेशमी दुपट्टे मे आ जाओ

छोडकर चिंता भविष्य पैसो बच्चो ओर दुनिया की
बाटनी की किताब का रखा गुलाब सी हो जाओ।

गुनगुनाने ले कविता श्रीकांत तुम्हे मन से अपने भी
गीत गजल कविता सा मै और तरन्नुम  तुम हो जाओ

          7. प्रियतुम  रूठकर मान जाया करो


बात करती  हो रूठ जाने कीकभी मान भी जाया करो
छोटी छोटी गलतियों को नजर अंदाज कर जाया करो

दिए थे वचन दोनो ने अग्नि के सामने ही एक दूजे को
 कभी मै रूठू तो तुम सहज ही  मुझसे मान जाया करो

खटपट होती है विचारो की मन में कभी कभी अपनो में
कभी उग्र हो जाऊ तो कभी शांत तुम ही हो जाया करो

क्या मेरा क्या तुम्हारा है प्रिय इस गृहस्थी के जीवन में
कभी मै प्राणप्रिय तो कभी तुम सर्वेशवर हो जाया करो

लगा रहता है जीवन में सुख दुख धूप छाव सा जीवन में
कभी मै बरगद तो तो तुम नीम आगन की हो जाया करो

मै रहूगा साथ साथ सदा तुम्हारे ही श्रीकांत हर जन्म मे
मै राही और  तुम हमराही  मेरे जीवन की  बन जाया करो


           8.फुर्सत मिले तुम्हे


चाय मे  थोड़ी चीनी कम मिलाया करो
बात प्रेम के मिठास वाली की किया करो

नमक मिर्च तेल  और हल्दी को छोड़कर
कभी कभी कुंकुम मोती बिंदी हो जाया करो

निकलकर कभी कभी किचन से बाहर
कालेज की रोड पर साथ में चला करो

कैलेनडर पलटती रहती हो हिसाब मे
चोदह फरवरी को थोड़ा रुक जाया करो

देखती है अब भी वो टिपटी पेड की तुम्हे
तुम वनस्पति की किताब हो जाया करो

इंतजार आज भी करता है श्रीकांत वैसे ही
कालेज के जमाने मे कभी लोट आया करो

            9. बात इश्क की किया न करो


बात इश्क की जमाने से तुम न किया करो
अपने आपको आईने में देख लिया करो

तेरे दर पर तो पहरे  हजार लगा कर बैठे
मुझे झरोखो से तुम  छुप  कर देखा न करो

भागती हो  डरती शहमती अक्सर  डायरी में
हकीकतो मे कभी साथ  मेरे हो लिया करो

बंद है  रिवाज कागज में  प्रेम पत्र लिखने का
कभी मोबाइल पर आन लाइन हो जाया करो

ढूंढती हो बहाने क्यो मिलने के श्रीकांत से
 तुम गीत गजल  और कविता  हो जाया करो




           10 अभिनंदन हो


नव वर्ष  तुम्हारा अभिनंदन हो
नूतन दिवस  शुभ मंगल  हो

सुख दुख सब रहे सम जीवन
 इस साल ऐसे गृह नक्षत्र हो

दिन सिदूरी शाम सुनहरी
रात शीतल चांदनी हो

बयार हो सुमनगंध सी
 प्रेम रंग बसंत उत्सव हो

मिल जाए सब सहज ही
आशीष बड़े बुजुर्गों का हो

दुख तीखी धूप रहे तो
सुख छाव नीम बरगद हो

अभिनंदन करे श्रीकांत
तुम्हारा पसारे वाहे नित ही

मै रहू चाहे धूमिल गर्त सा
आगाज तुम्हारा स्वर्णिम हो

मनोज दुबे श्रीकांत

गीत

मंदिर को निर्माण

अब तो मंदिर को निर्माण
राम जी जाने है सरकार
 कांग्रेस बी जे पी को लग रहो
अब तो एक ही व्यवहार

मंदिर मस्जिद पर लडाकर बैठै
राम जी को घर तुडाकर बैठै
ठंड बरसात गर्मी सब सह रहे
टैंट मे अपने राम जी सरकार

            अब तो मंदिर को निर्माण
             राम जी जाने है सरकार

सुप्रीम कोर्ट मे मामला अटको
फैसला पे अब लगो है खटको
तारीख पे तारीख नित बढ रही
चेन की नींद मे मोदी की सरकार

            अब तो मंदिर को निर्माण
             राम जी जाने है सरकार

राम  राम कह चुनाव जीत गए
कुर्सी पाके राम काज भूल गए
संघ विहिप को ताक मे रख के
धर्म निरपेक्ष बन रही अब सरकार

          अब तो मंदिर को निर्माण
             राम जी जाने है सरकार

राम नाम को ओढै के दुपट्टा
मार रहे वोट बैंक पे झपट्टा
शूद्र जन अल्पसंख्यक काजे
घुटना टेक खड़ी सरकार

         अब तो मंदिर को निर्माण
          राम जी जाने है सरकार

 हे धर्म धुरंधर राम लला जी
दिखाओ कछु चमत्कार प्रभु जी
रास्ता देख देख प्रभु हारे
कब आओगे अयोध्या सरकार

           अब तो मंदिर को निर्माण
             राम जी जाने है सरकार

विनती तनक अब मोरी सुनियो
नेता की बात उर न धरियो
जा कल युग कै कालनेमी सब
 जज वकील कोर्ट और  सरकार

 अब तो मंदिर को निर्माण
राम जी जाने है सरकार

   बगुला भगत है सारे के सारे
मुह में राम छुरी के रखवारे
पाच प्रदेश तो निपटा दए
रखियो अल्पमत की सरकार

           अब तो मंदिर को निर्माण
             राम जी जाने है सरकार
             कांग्रेस बी जे पी के लग रहे
            अब तो एक ई व्यवहार

मनोज दुबे श्रीकांत

गजल

नाम तेरा ही है

हर जुबान पर बस तेरा ही नाम है
चोक चोराह नाम से ही आबाद है

रहती है तू जिस गली मे आजकल
वो नाम से  अब तक तेरे बदनाम है

गुजरना चाहता हूं उन राहो से कभी
जहा  आज भी तेरा  वही मकान    है

खिडकी दरवाजे बंद कर लेना तेरे
 मेरा घर तेरे दिल के कौने मै ही है

बात करता हूँ श्रीकांत बस तेरी ही
तशवीर आज भी तेरी एल्बम में है

मनोज दुबे श्रीकांत

Wednesday, January 16, 2019

गजल

गजल

देख ले मुझको एक बार आकर के
नजरो से अपनी नजरे मिलाकर के
बैठा हूँ मै बरसो से इंतजार मे तेरे
सुकून दिला दे दिल को आकर के
राह सूनी है सूना आगन अब तक
जमा दे  रंग बसंती सा तू आकर के
रंग हरा लाल बिखरा दे जीवन में
जीवन पथ की संगनी होकर के
सुना है जमाने और उसकी बातो को
मिटा दे सब शंकाए  तू आकर के
क्या जवाब दे श्रीकांत जमाने को
दे दे जवाब सारे तू ही आकर के

मनोज दुबे श्रीकांत


गजल

ऐतबार नही

मेरी बातो  से तुझको ऐतबार नही
क्या बता तुझको मुझसे प्यार नही
तुम तो कहती थी थामकर  बाहे
क्या मेरे वादो पर  ऐतबार नही
नाम तेरा हथेली  जहन मे मेरे
क्या मोहब्बत पर  ऐतबार नही
हूँ परिदा सा मे और समा सी तू 
क्या जलने पर  मेरा तुझे ऐतबार नही
चला था राहो पर श्रीकांत तेरी ही
क्या मंजिलो पर तेरी ऐतबार नही
मनोज दुबे श्रीकांत



Tuesday, January 15, 2019

Kavita punj

अजीज है जो
        हर कोई मुझे धोकर चला जाता है
        मोटर गाड़ी कपडा बना जाता  है
       बिना सर्फ ऐरियल के चमकता हूँ मै
       शब्दो से दो चार मुझे कर जाता है
       नजाकत उसकी रह जाती कोने में
       सरेयाम बैनकाब जो कर जाता है
       मै मै और तु तु हैं गालिब जमाने में
       फर्क मुझमे तुझमे हो ही जाता है
       देखता हूँ बानगी हर एक शख्स की
      जोहरी किसी हीरे का हुआ जाता है
     क्या रंग तेरा क्या रंग है मेरा पानी मे
    पानी जो निर्मल निश्चल सा रह जाता है
     जख्म दे दे श्रीकांत जमाने कितने ही
     अजीज है कोई सिराने दवा रख जाता है
    मनोज दुबे श्रीकांत
    
      

मुक्त गजल

     
         अजीज है जो
        हर कोई मुझे धोकर चला जाता है
        मोटर गाड़ी कपडा बना जाता  है
       बिना सर्फ ऐरियल के चमकता हूँ मै
       शब्दो से दो चार मुझे कर जाता है
       नजाकत उसकी रह जाती कोने में
       सरेयाम बैनकाब जो कर जाता है
       मै मै और तु तु हैं गालिब जमाने में
       फर्क मुझमे तुझमे हो ही जाता है
       देखता हूँ बानगी हर एक शख्स की
      जोहरी किसी हीरे का हुआ जाता है
     क्या रंग तेरा क्या रंग है मेरा पानी मे
    पानी जो निर्मल निश्चल सा रह जाता है
     जख्म दे दे श्रीकांत जमाने कितने ही
     अजीज है कोई सिराने दवा रख जाता है
    मनोज दुबे श्रीकांत
   
     
   
   
   

मुक्त गजल

नाम तेरा ही है

हर जुबान पर बस तेरा ही नाम है
चोक चोराह नाम से ही आबाद है

रहती है तू जिस गली मे आजकल
वो नाम से  अब तक तेरे बदनाम है

गुजरना चाहता हूं उन राहो से कभी
जहा  आज भी तेरा  वही मकान    है

खिडकी दरवाजे बंद कर लेना तेरे
 मेरा घर तेरे दिल के कौने मै ही है

बात करता हूँ श्रीकांत बस तेरी ही
तशवीर आज भी तेरी एल्बम में है

मनोज दुबे श्रीकांत 

Kavita

एक पिता की सोच

जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे

मेरे सिर और कंधे और ऊचे  होने लगे हैं
जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े  होने लगे हैं
अरमान फिर आखो में नए नए गढने लगे
 ओर पंख मेरे सपनो को फिर लगने लगे हैं

कपडे़ मेरे नए से पुराने  से होने लगे हैं
जूतो को नए  पेर  रास्ते मिलने लगे हैं
कालर के करीने अब और सजने लगे हैं 
 जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे हैं 

दिन फिक्र के अब यू ही गुजरने लगे हैं
 जो आम नीम मेरे आगन बढने लगे हैं
सहारा उन हाथो को मिलनै लगा आज
 हाथ जो  मेरे आजकल कापने से लगे है

दिन  जाने अब. कहा बीत जाने लगे हैं
शहर मोहल्ला अब आगन होने लगे हैं
दिन मेरे बचपन के फिर लोटने लगे हैं 
जिस दिन से मेरे बच्चे बडे होने लगे हैं

घडि़यों के काटे आजकल थमने लगे हैं
दिन एलबमो से तस्वीर मे उकरने लगे हैं
बैठता हूं दहलान के पलंग पर जब भी
सुख दुख फिर बूढे़ बरगद से होने लगे हैं

हाल जानने को मेरे चक्कर लगने लगे हैं 
दिन चिंता के मेरे अब उसके लगने लगे हैं
तलाशता रहता हूँ खुद को अब उनमे ही मै 
जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे हैं 
मनोज दुबे श्रीकांत

मेरी नजर मे अपनो को करीब से देखता हूँ मे दिल को खोलके देखता है मे नजरो को मत झुकाना सामने मेरे नजरो मे झाक कर देखता हूँ मैं तुममे मै और मुझमे तुम ही हूँ बात तुम्हारे मन की जानता हूँ मै रहते हो जिस अंदाज मै आजकल उन जजबातो को भी भापता हूं मै रहनुमाई खुदा होगी एक दिन कभी बात यह सदियो से जानता हूँ मे करता हूं इबादत तेरी ही आजकल खुदा तुझको अपना ही मानता हूं मै मिट जाऊगा श्रीकांत उसके लिए कभी अजीज दिल का जिसे भी जानता हूं मै मनोज दुबे श्रीकांत


व्यंग

 [12/9/2020, 11:56 AM] Manoj Dubey: आन लाईन कलास का पंगा  कल आन लाईन कलास मे  हमने कैमरा आन करने का  बोला कुछ छातरो का  मन भय से डोला  पंद्र...