Sunday, August 9, 2020

कविता

अनंत पर सवार कावय संगृह से ली गई कविता

मेरा मन

धरा से उडकर  मेरा मन कभी कभी
आसमान तक चला जाता है
वहा से फिर घूमने को जहा दोड़ आता है
ढूढ लाता मोती गहरे सागर से
 खुशियो की सुमन गंध को फैला जाता है
मेरा मन मेरे मन की उसकी मुसकान हुआ जाता है
मेरा मन मन से  कभी कभी अनंत मे घूम आता है

जाने कब  उसके मन से
 दिल के करीब पहुच जाता है
हाथ मे हाथ थाम थडकता
 सासो का सपंदन हुआ जाता है
निहारता राहे कभी किसी पार्क या
 किनारे दरिया के टिक टिक करता
समय सा निकल जाता है
मेरा मन  मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है

मेरा मन पहुच जाता है
कभी कभी सज्जन के मन से दुर्जन के
 पास  प्रेम से विषाद की ओर मुड़ जाता है
 ढूंढने को कुछ संबध की थाह
अपनो की मन की गहराईयो मे उतर जाता है
देखनो को संबध के कच्चे
धागो को खीचतान मचा कर मन मे
अजीब  अंतर्द्वंद  का मंथन मचा जाता है
मेरा मन  मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है

कभी कभी निकल जाता घर गृहस्थी से
 दूर ढूढने को वैराग्य की शांति प्रभु के
श्री चरणो से तीन लोक चोदह भुवन से
 उनके धाम तक पहुच जाता है
करके अपना हिसाब मन से ही
मनगणत गणित मे उलझ कर रह जाता है
भव सागर मे खाता गोता विकारो का
वापस फिर जन्मकर बालक हुआ जाता है
मेरा मन  मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है।

मेरा मन रखता गिदध सी
 पैनी नजर देखने को मन की  सबकी
 पैमाना सा बदल बदल कर
आकलन  करने  को बातो बातो
मे उसकी मेरी सबकी तुमहारी
 तो कभी रातो मे  अखियो के सपनो से
दिवास्वप्न सा सपनो सा धरा पर धमक आता है
मेरा मन  मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है
मनोज दुबे श्रीकांत

Saturday, August 8, 2020

कविता

मल्टी सब्जेक्ट स्पेशलिस्ट

कल घर के सामने ऐक गधा
जोर जोर से रैक रहा था।
जाने वो क्या कहने की सोच रहा था
फिर उसने हद ही कर दी



घर के गेट पर दो लतती जड दी
मै ताव  मे लठ लेकर घर से बाहर आया
गुससै मे उससे फरमाया
अबे गधे जाता है
कि दो चार लठ पुटठे पर  जमाऊ
अपनी पिछली बार वाली
औकात पर आऊ
वह बोला भैया मेरे गले
एक बात हजम नही  हो रही है
और आपकी कोचिंग मे आजकल
 हर विषय की पढ़ाई हो रही है
आपके बोर्ड की डिग्रियां भी
 मेरे पल्ले नही पड रही है
B A BSc BCom MA M Sc M Com
सब  ऐक सी  लग रही  है
इतनी सारी डिग्रियों के नाम
और बोर्ड देखकर मेरा सर चकरा रहा है
 ऐक शिक्षक गणित भोतिक रसायन
कामर्स आर्ट सब कैसे पढा रहा है
यही देख देख कर मेरा दिल और
  दिमाग फैल हो रहा है
मेरा गधापन दुबे जी आजकल
 सरचढ कर बोल रहा है
मैने कहा भैया आजकल
हमारी कोचिंग मे ये सब
नए नए अपाइंट हुए
शिक्षक  महोदय पढा रहे है जो
 अभी अभी  ग्रेजुएट होकर  आ रहे है
 ऐसे तो फिर दुबे जी विषय विशेषज्
 कहा  रह पाएगा और हमारा शिक्षा तंत्र
 बीरबल की खिचड़ी बन जाएगा
 अपने गधे पन का ऐक आईडिया
आपको भी दिए जा रहा हूं
 और अब आपके बोर्ड के  नीचे
मल्टी सब्जेक्ट स्पेशलिस्ट लिखा जा रहा हूँ

मनोज दुबे श्रीकांत

Friday, August 7, 2020

गजल

मनचली गजल

जब चाहे जिधर से निकली
इठलाती बलखाती निकली

मुड़कर पीछे पलट पलट के
 देखते मुस्कुराती निकली

घुमाती फिरी सबको पीछे
गली मोहल्ले से निकली

चर्चे चलते रहे उसके ही
चौक चौराहो से निकली

करते  इंतजार सब उसका
सुबह शाम दोपहर   निकली

बिखेरती अदा श्रीकांत अपनी
  मनचली  जहाँ  से निकली

मनोज दुबे श्रीकांत

Thursday, August 6, 2020

कविता

नमक हलाली  का मतलब 

मालिक के पीछे दौडते कुत्ते को
घाट के कुछ आवारा कुत्तो ने
रोका टोकते हुए भौका
बड़ी वफादारी निभा रहे हो भैया
मालिक के पीछे पीछे फालतू मे
 क्यो दोड़ रहे हो भैया
तुमहारे मालिक थुल थुल शरीर के
साथ अपनी तोंद कम कर
वजन घटा रहे
और आप अपने आप को
जबरदस्ती थका रहे है
तभी उनमे से एक खबीस
 अवारा कुत्ता बोला बीडू फुल
वफादार कुत्ता क्या बात है
अपुन साला गवार अवारा
टुकड़े तोड़ता झूटन चाटता
कमाल की जिंदगी जी रेला है
बांस बिंदास मालिक के
सामने दुम हिला रैला है
दोड़ लगाता कुत्ता फबतियो से
खाक हो गया
बिन बोले उससे रहा नही
गया कहने लगा गाडी मेघूमता हू
 ऐसी घर मे रहता हूँ।
दूध मलाई रोटी के साथ
 टोस बिस्कुट खाता हूँ
 और अपनी लाईफ मालिक
के साथ बिंदास बिताता हूऐ
इसमे तुम्हारा कया जाता है
मुझे मेरी इसी जिंदगी मे मजा
 आता पर बीडू तेको गुलामी
की गले  मे पड़ी जंंजीर
गले का पटटा और गुलामी का
 जीवन नजर नही आता तू वफादार नही
नमक हलाली कर रहा है
मालिक के तलवा चाटू जिदंगी जी रहा है
अपुन  कुत्तो की जमात
पर तू धब्बा सा लगता
तु जिसे ऐस की जिंदगी समझता है बीडू 
अपुन को तो फासी का फंदा लगता है

मनोज दुबे श्रीकांत

Monday, August 3, 2020

गजल

मिर्ची गजल

खेत से घर जब आई मिर्ची
हरी लाल काली कहाई मिर्ची

बनाई जब तरकारी उसने
  मुह मे जमके लगाई मिर्ची

तेज तरार वो भी ऐसी की
लोगो मे  खुद  कहाई  मिर्ची

बातो से कभी कभी तो उसने
दिल मे सबके लगाई मिर्ची

जल भुन  गए देख के उसको
तरक्की की जो बताई मिर्ची

सुनाकर खरी खोटी मन से
 उसने जब   जब लगाई मिर्ची

भाई बहन दोस्त सहेलियों संग
 रिसतेदारो को  भी लगाई मिरची

लग जाती किसी को  भी श्रीकांत
दुनिया मे   जब से  आई  मिर्ची

मनोज दुबे श्रीकांत

व्यंग

 [12/9/2020, 11:56 AM] Manoj Dubey: आन लाईन कलास का पंगा  कल आन लाईन कलास मे  हमने कैमरा आन करने का  बोला कुछ छातरो का  मन भय से डोला  पंद्र...