Thursday, April 30, 2020

गजल

निकलकर देखू बाहर

निकलकर देखू तो बाहर क्या हो रहा है
 चोक चोराह बाजार मे क्या चल रहा है

क्या खुली है  कोइ दुकाने कही की आज 
समोसा कचोरी और नमकीन मिल रहा है

 क्या किसी गली मोहल्ले के टप पर तुम्हारे
राजसी गुटका पान या जरदा मिल रहा है

  खुली है कही कलारी या मिल रही है कच्ची
बहुत दिनो से पीने का मन चल रहा है

 कहा लगे हैं बेरीगेट और पुलिस के जवान
देखू कोन कोन उनसे  बच के निकल रहा है

लाक डाउन के कहने क्या है अब श्रीकांत
हर कोई घर से निकलने को मचल रहा है

मनोज दुबे श्रीकांत

Wednesday, April 29, 2020

गज़ल

                               उई अम्मा 


                       उई अम्मा  मै मर गई
                        प्रेम मे  क्या कर गई

                     देखकर पहली बार ही
                       दिल मे घर कर गई
    

                      देखने  जब  सात बजे 
                     अपनी छत पर गई

                  भैया देख कर  रोड पर 
                   हाय उनसे मै डर गई

                    प्रेम मे बावरी श्रीकांत
                    ये क्या तु कर गई


      मनोज दुबे श्रीकांत
   



      


Tuesday, April 28, 2020

गजल

                            लाक डाउन मे



                     लॉक डाउन में  बस घर में पड़े हैं
                     बात पर हम अपनी ऐसे अड़े हैं

               सुना देती है वह अपनी और हम भी
                 दिन में कई बार उससे लड़े हैं

                       मनाने को  दिन मे कई बार उसे
                       हुकूम पर उसके हमेशा खड़े हैं

                निकालने को सामान रखा  ऊंचा
              कहने पर कई बार टंट  पर चढ़े हैं

                     हाथ सफलता मे श्रीकांत पत्नी का
                     उसी के दम पर ही हम आगे बढ़े हैं

                                    मनोज दुबे श्रीकांत

Monday, April 27, 2020

गजल

                           गजल
           



               


               काम के नाम परिवार का हिस्सा हूँ
               निकला तो डस्टबिन का डब्बा हूँ


                  हिंदी की कोई किताब का
                 अधूरी कहानी का  किस्सा हूँ

                 इसी बात को लेकर अनबन सी
                   तुम्हारे व्यवहार से गुस्सा हूँ

                    मजबूरी में अक्सर तुम्हारे साथ
                      गेहूँ संग घुन सा पिसता हूँ

                 बनाने को स्वाद  को मिला लेते हो
                  चाट की दुकान का जो खस्ता हूं

                    मजबूर लाचार जिंदगी में श्रीकांत
                      जटिल समस्याओं का बस्ता हूँ

मनोज दुबे 

Sunday, April 26, 2020

गजल

हर हर महादेव



रहे कर  के मस्ती में सदा अपनी
 वो भोले भंडारी शिव हो जाते हैं

 गरल का घूंट पीकर के  हलक मे
  वो नीलकंठेशवर  से हो जाते हैं

जन्मते ब्रह्म  पालते विष्णु जहां में
वो  हर के  प्राण महाकाल हो जाते हैं

 होते है रक्षक  जब जीवन के तो
वो मृत्युंजय महादेव हो जाते है

 दे देते  वर में मांगने पर थोड़ा
 वो औघणदानी शिव हो जाते हैं

बन राम के ईश्वर कामना को राम की
वो सागर तट रामेश्वर हो जाते है

 देवों के देव बन करके श्रीकांत
 वो देवाधिदेव महादेव हो जाते हैं

मनोज दुबे श्रीकांत

Saturday, April 25, 2020

कविता

                                 याद आता है स्कूल मेरा



               

                      आज भी याद  बहुत आता है  स्कूल मेरा
                       स्कूल की वो ड्रेस जूता और बस्ता मेरा

                        कक्षा की बाल भारती की वो कविता मेरी
                        सर के कहने पर जोर से पाठ पढ़ना मेरा

                         लंच की छुट्टी के लिए  ढाई बजे घंटा बजना
                       क्लास से  दोडकर  खेल मैदान मे जाना मेरा

                       खेल खेल मे हारने पर मेरी टीम का अक्सर
                     बात बात पर खीझकर  दोस्तो से चिढ़ना मेरा

                     मस्ती करने पर  पीरियड में सर का समझाना
                        सर का छड़ी से हथेली पर  मारना मेरा

                               गोल मारने के प्रश्न पूछने के कारण में
                          रोज रोज सर को  नया बहाना बनाना मेरा

                   क्या बात है श्रीकांत बचपन के मेरे  स्कूल की
                    शहर के किसी सरकारी स्कूल में पढ़ना मेरा

                          मनोज दुबे श्रीकांत

Friday, April 24, 2020

गज़ल

गजल


            जंग
       

 प्रधान ही है जो हमारे  डट गए
लाक डाउन कर करोना से भिड़ गए

घृणा  के कीड़े पडे इतने उनके
 अवरोध बन  जो सामने अड  ग ए

करने को निकले विरोध  रोड पर
 फिर  पीछे  पुलिस के डंडे पड़ गए

भंग करने को लाकडाउन के सपने
पलकों से उनकी सारे झड़ गए

 मिटाने चले हस्ती देश की श्रीकांत
 देश की मिट्टी में ही शव बन गड़ ग ए

मनोज दुबे श्रीकांत 

Thursday, April 23, 2020

कविता


                  लाकडाउन मे अपनी दिनचर्या


               

उठ सुबह मुंह धो कर दूध लेकर आऊ
 आकर के गरमा गरम चाय  बना कर लाऊं

 फिर बाहर निकल कर देखो बार बार
ठेले वाले से सब्जी को लेकर  आऊ

नहा कर पूजा पाठ करूं भगवान की
 जाकर फिर किचन में हाथ बटा कर आऊ

 फिर मिले गरमा गरम रोटी की थाली
 पहले भोग भगवान को लगाकर फिर पाऊं

 थोड़ी देर लेकर झपकी  चार बजे देखूं टीवी
फिर चाय बना श्रीमति को देकर आऊ

 रोज शाम को कुकर के लगने से पहले
दाल  और चावल बीन कर देकर आऊ

फिर मिले खाने को रात का खाना मुझे
रामायण महाभारत डीएनए देखकर सोने जाऊं

 बस यही है श्रीकांत  दिनचर्या लाकडाउन की
 श्रीमति की हाजिरी  बजा बजाकर सुख पाऊ

मनोज दुबे श्रीकांत

Wednesday, April 22, 2020

लघु कथा

                           पगार
                 

         
                     

               

   बाजार शहर और  काम बंद हुए आज कई दिन बीत चुके थे लाख डाउन का आज उनतीसवा  दिन था। रामकिशन बरामदे में चिंतित बैठा सोच रहा था। कुछ ही दिन के पैसे से बचे हैं, आगे यदि कोरोना महामारी और लाकडाउन और बड़ा तो काम भी नहीं होगा और बिना काम से मालिक  से पैसे किस प्रकार मांगूंगा समझ में नहीं आता, इतने मे पत्नी की आवाज आई  सुनो जी दो-चार दिन का राशन शेष है, कुछ राशन  ले सब्जी भाजी ले आते और आटा भी खत्म हो चुका है। आगे के दिन पता नहीं कैसे निकलेंगे भागवती के इन शब्दों ने रामकिशन की चिंता और बढ़ा दी।



                              रामकिशन उदास सा बैठा सोच रहा था। काश लाक डाउन हटे तो मालिक से बात  करू  कुछ दिन पहले ही देश के प्रधान ने तो कहा था।कि कोई भी कर्म चारी की पगार  कोई नही काटेगाऔर ना ही कोई कर्मचारी काम से निकाला जाएगा, परंतु सोचने में आता है, कि पिछले महीने मुनीम जी ने गत महीने का   पैसा  काटकर पगार दी थी  तो फिर उनसे मैं किस प्रकार से महीने भर की पगार मांगू सोचने में और बोलने में संकोच होता है।

भगवती ऐसा नहीं हो सकता,  बिना काम के मालिक के सामने हाथ पसारना उचित नहीं समझता,नहीं नहीं नहीं मैं नहीं जाऊंगा मालिक से किसी भी प्रकार से मदद कीबाबात कहने या पगार की बात कहने
                       तो फिर क्या परिवार और बच्चों को भूखे रखोगे या खुद भी भूखे रहोगे क्या विगत वर्षों में तुम अपने मालिक का इतना विश्वास भी नहीं जीत पाए कि वह मुसीबत के समय तुम्हारी मदद कर सके  नहीं नहीं  भागवती ऐसी कोई बात नहीं फिर भी यदि तुम कहती हो तो मैं जाकर बात करने की कोशिश करता हूं
मालिक  रामकिशन से - - - कहो रामकिशन कैसे आना हुआ जी जी मालिक बस मिलने चला आया कुछ काम-वाम हो तो बता दीजिए कर भी दूंगा और  बदले मे कुछ पैसे भी मिल जाते तो मालिक इन तंग दिनो मे घर का खर्च भी निकल जाता नहीं-नहीं रामकिशन तुम्हें पता नहीं है कोरोना के चलते अभी सभी को घर पर रहना है सब कुछ बंद है और फिर क्या तुम्हें प्रधान जी का आदेश पता नहीं है  रामकिशन मालिक से जी  पता तो है रामकिशन के माथे पर पसीने की बूंदें झलक रही थी वह अपने गमछे से पहुंचकर संकोच बस खड़ा रहा कुछ ना बोल पाया

रामकिशन के संकोच को देखते हुए रामकिशन मुझे मालूम है आप कितने आत्म स्वाभिमानी हो मैं यह पैसे तुम्हें मदद के लिए दे रहा  हूं रामकिशन यह पिछले महीने की पगार है  फ्री में ना  समझना और फिर रही बात बिना काम के पैसे की तो मुनीम जी किश्त के रूप मे यह अतिरिक्त पगार थोड़ा थोड़ा करके काट लेना रख लो  काम आएंगे  रामकिशन इस लाकडाउन के दोरान तुम्हारे परिवार के इन पैसो की आवश्यकता है तुम्हें , रामकिशन  संकोच वशअपने पैसे लेकर वहां से मालिक को प्रणाम करके निकल गया और रास्ते मे वह सोच रहा था कि मैं खामखा मालिक के प्रति संदेह रख रहा था मुनीमजी की बातों में आकर वास्तव में मालिक मालिक है  वह हम सब की आवश्यकता को समझते है वह चाहे मेरी  हो या मुनीम जी की

                                     मनोज दुबे श्रीकांत

   



Tuesday, April 21, 2020

कविता

                 
                    मेरा निवेदन स्वीकार हो


                 



               प्रणय निवेदन मेरा स्वीकार हो
             निर्मल निश्चल प्रेम स्वीकार हो
           सात सगुण लग्न के शुभ दिन
          हल्दी कुमकुम मेहंदी स्वीकार हो


               मातृका गणेश पूजन मंडप में
                 पाणिग्रहण स्वीकार हो
             विवाह के गठजोड़ मे मेरा
                रिश्तो का बंधन स्वीकार हो


               हल्दी टीके मेल मिलाप मे
                 परिवार का परिचय स्वीकार हो
              फूलो की जयमाल के रूप मे
                  समर्पण दोनो का स्वीकार हो


              अग्नि के समक्ष लिए सात फेरों में
                 सात वचनों का निर्वाहन स्वीकार हो
              विवाह की रस्मों  के बाद तुम्हें
                 मेरा  घर परिवार स्वीकार हो


              दांपत्य जीवन में अपने तुम्हें प्रिय
                 गृहस्थी का कर्तव्य पथ स्वीकार हो
              साथ गर देती रहो हर जन्म मे
                   सात जन्मों का संबंध स्वीकार हो

                                                      मनोज दुबे श्रीकांत 

Monday, April 20, 2020

कविता



                                सोलह श्रृंगार

                 


                सोलह श्रृंगार से आज फिर सजा दूं तुमको
               सिंदूर और  मांग का टीका लगा दू तुमको

            नाक में पहना कर नथ आंखों में लगा दूं काजल
            कानों में कर्णफूल  और गले मे हार पहना दूं तुमको

              बालों में लगाकर फूलो गजरा और  केशपरचन
               हाथों में बाजूबंद और चूड़ियां पहना दूं तुमको

              अंगुली मे पहनाकर अंगूठी और कमर बंध कमर मे
            पांव में पायल और बिछिया पहना दूं तुमको

              पहनाकर लाल जोड़ा लगाकर शगुन की मेहंदी
             सदा सुहागन और सौभाग्यवती बना दूं तुमको

               आदित्य अनुपम अद्भुत श्रीकांत की तुम हो कविता
              विविध प्रकार के अलंकारों से सजा दूं तुमको

                                       मनोज दुबे श्रीकांत

Sunday, April 19, 2020

गज़ल

             कविता आज भी

 वो आज भी मेरी कविता चुपचाप पढती होगी
 गीत गजलों को मन ही मन में गुनगुनाती होगी

 शरमा  के रख लेती होगी पल्लू मुंह में अपना
 जब  प्रेम और श्रृंगार की रचना को पढ़ती  होगी

उसकी आंखों में होती होगी एक विशेष चमक
  जब कभी वो मुस्कान होठों पर अपने लाती होगी

 वह बनाती होगी आशियाना अपने सपनो का
 जब कभी वो मन से मेरे आस पास  रहती होगी

 मैं अजनबी हूं ना वह अजनबी है मेरे लिए अब
  पल भर के लिए  वो  मेरे बारे मे सोचती  होगी

वो और कोई नहीं   श्रीकांत मेरी है कविता
साहित्य में   जो मेरे अलंकारों  को  गढती  होगी

मनोज दुबे श्रीकांत

Wednesday, April 15, 2020

कामगार

घर का कामगार

लाकडाउन मे बेरोजगार हो गया हूँ
घर मे पत्नी  का कामगार हो गया हूँ

झाड़ू पोछा से लेकर के कपड़े तक
गृहस्थी  अब आधार का हो गया हूँ

जैब से हो गया हूं  मै बिल्कुल कडका
रोटी संग राई का  अचार हो गया हूँ

ताने मिल रहे  अब पत्नी और बच्चो से
सो सुनार की एक लोहार हो गया हूँ

दुबले पर दो आषाढ से भारी है दिन
लंबे कार्यक्रम का आभार हो गया हूँ

बोलने पर भी बोलते नही श्रीकांत
 किसी दुकान दार का उधार हो गया हूँ

मनोज दुबे श्रीकांत

Tuesday, April 14, 2020

गज़ल

                              आरज़ू
                 
                   

                       एक आरजू थी मन में
                    कि घुमा के लाऊं तुझको

                       ख्वाब दिखाकर कितने
                      अब  जन्नत बताऊं तुझको

                     होकर के खिन्न मुस्कुराना
                       कैसी भी सुनाऊं तुझको

                         रहना सदा साथ मेरे
                      छोड़ के न जाऊं तुझको

                     चाहू बस श्रीकांत यही
                         बार बार  पाऊ तुझको

                                                 मनोज दुबे श्रीकांत 

गज़ल


                             जानवर

                     


                     खिलाफत  हम कर गए
                     उनको  काट खा गए

                     फर  हमे  लिबास को
                      जाने क्यो  भा गए

                       बना के उनकी डिश
                       अंगुली चाट खा गए

                       लगी दूषित जब हवाए
                        घर  पर घाट पा गए

                     रोग लिए तन मन  मे
                         भर के लाट आ गए

                         लूटकर फिर कोई
                        बंदर बाट मचा गए

                          भीड़ भार  नदारत
                        शहर विषाणु छा गए

                          मूक  रहा श्रीकांत
                        अब  कौन बतिया गए

                  मनोज दुबे श्रीकांत





Sunday, April 12, 2020

                  गज़ल

             



         वो लेकर  किताब आ गए
       बताने को हिसाब आ गए 

       बढने लगी उम्र जब उनकी
       लगाकर जब खिजाब आ गए

         बेपर्दा ना रहे देखते वो
         लगने को हिजाब आ गए 

          लगे ना नजर उन्हे अबकी 
          लेकर के सिताब आ गए 

          हार कर बैठ गया श्रीकांत
         लेकर  जब  खिताब आ गए

                   मनोज दुबे श्रीकांत

शब्द

हिजाब  पर्दा या आड़   सिताब नजर दूर करने का एक पौधा 

Saturday, April 11, 2020

गजल

                    ये कैसी बला
             
           


            कैसी आ गयी बला है
              कोई अंग तो गला  है

                सुनसान सा शहर मेरा
             कोई इसमें न ढला है

                 बाटी नेक राह  हमने
                   सबका फिर क्यो न  भला है

                  रहे खामोश से बैठै
                  कही कुछ तो अब जला है

                  रहे दूर दूर सदा हम
                  चलन अब कैसा चला है

                  देखता है श्रीकांत बस
               ये टाले  से न टला है


मनोज दुबे श्रीकांत


Friday, April 10, 2020

                     
                      खामोशी 

              

 लूंगी बनियान पर दिन गुजर जाता है
 पैंट शर्ट खूंटी पर नजर आता है 

घर की खिड़कियों से देखने पर अक्सर
 खाली रोड गुमसुम शहर नजर आता है

मजमा परिंदों का लगा है शाखों पर 
इंसान लांघ न अपनी दहर पाता है 

 घूमता है हर कोई पहनकर मास्क 
जाने कौन फिजा में जहर घोल जाता है

 कितना रहा शहर अब बीमार मेरा 
इसी उधेड़बुन में पहर बीत जाता है 

घड़ी दो घड़ी ठहर जाता है श्रीकांत 
शहर से जाने कौन गुजर जाता है

मनोज दुबे श्रीकांत 


व्यंग

 [12/9/2020, 11:56 AM] Manoj Dubey: आन लाईन कलास का पंगा  कल आन लाईन कलास मे  हमने कैमरा आन करने का  बोला कुछ छातरो का  मन भय से डोला  पंद्र...