लघुकथा मुआवजा
अरे राम भैया नर्मदा मैया की बाढ उतरे महीना हो गए जा तुम्हरी टपरिया की मरम्मत अब तक काहे नही भ ई ठंड और धूप मे पडे रहोगे तो बीमार पड जाओगे अब का बताए भैया सोच रहे है नर्मदा मैया को तनक प्रसाद मिल जातो तो टपरियां सुधार लेतो सुनो है कल तहसील से बाबू आर रहे है इनसपेकसन काजे नुकसान को पता लगाए सोच रहो है देख जाते लिख के ले जाते कछु ब ई आस मे बैठे पननीऊ चददर तान के और का इंतजार कर रहे है
कुछ महीने बाद अरे कक्का अब तो ठंड ई आ ग ई अबे तक न ई करी मरम्मत शीत लहर चलन लगी अब बैटा सोच रहे थे कि मिल जातो कछु सरकार से नुकसान को अरे कक्का मुआवजा हा बेटा और का वो तो बटे कजन कित्ते दिन हो गए दो महीना हो ग ए बटे सब शहर मे बट गयो तुम्हे नही मिलो कल तहसील मे जाके मिल ल ईयो बाबू सेआधार कार्ड ले जाके
अगले दिन कक्का आफिस मे ही मिल ग ए बेटा दिखवाए ले हमार मुआवजा को का भयो
फाईल मे देखते ही जब पढ के बताया तो कक्का के होश उड ग ए फाईल मे लिखा
था नर्मदा के एप्रोच क्षेत्र के अतिक्रमण पर किसी प्रकार का मुआवजा देय नही होगा.......
कक्का की टपरियां पर कल काम जोर शोर से चल रहा था और मुआवजा लेने का सपना फटी पनी सा दूर उड रहा था......
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