भारत चीन के रिशतो पर
दोस्त बन कल तक तलवे चाटता रहा
खाया जिस थाली मे छेद करता रहा
नमक हराम नामाकूल बेईमान सा तू
दोस्ती के रिशते को दागदार करता रहा
समर्पण को तू मजबूरी समझता रहा
वक्त बे वक्त आखे भी दिखाता रहा
मै मानता रहा तुझे अपना अजीज
मिलकर गले पीठ पर छुरा घोपता रहा
वक्त तुझको भी बता देगा ऐक दिन
हिसाब तेरा भी कर देगा पूरा ऐक दिन
काटो को बोकर फूल मिलेगे कब तक
दिल को लहूलुहान कर देगा ऐक दिन
मनोज दुबे श्रीकांत
दोस्त बन कल तक तलवे चाटता रहा
खाया जिस थाली मे छेद करता रहा
नमक हराम नामाकूल बेईमान सा तू
दोस्ती के रिशते को दागदार करता रहा
समर्पण को तू मजबूरी समझता रहा
वक्त बे वक्त आखे भी दिखाता रहा
मै मानता रहा तुझे अपना अजीज
मिलकर गले पीठ पर छुरा घोपता रहा
वक्त तुझको भी बता देगा ऐक दिन
हिसाब तेरा भी कर देगा पूरा ऐक दिन
काटो को बोकर फूल मिलेगे कब तक
दिल को लहूलुहान कर देगा ऐक दिन
मनोज दुबे श्रीकांत

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