Friday, July 31, 2020

गजल

पारिवारिक गजल

अपने परिवार को सदा  ऐक बना के रखना
बुरी नजरो से  सबकी उसको  बचा के रखना

सुन लेना  कभी सबके मन की बातो को
अपने मन की  सदा मन मे दबा के रखना

न रखना  भेद कभी अपने तुपने का मन मे
 व्यवहार सबके साथ एक सा  बना के  रखना

क्या तेरा  क्या मेरा  न लाना  मन मे  कभी
 जमीन जायदाद की दूरियो. को  बढा के रखना

 चार दिवारी न बन जाए कभी  घुटन का घर
अपने घर को सदा ऐक  घर   बना के रखना

लडने को मत लड़ जाना अपनो से द्वापर से
 अपने घर को    महाभारत से बचा  के रखना

रहना राम लखन भरत शत्रु घन भाई से सदा
दुर्योधन शकुनी की नीति  से बचा के रखना

काका दादा के नाम मत करना भेद कभी  भी
स्नेह सब पर   ऐक सा सदा   बना के   रखना

पनपने न देना काटे कभी श्रीकांत बैर के
  घर के आंगन मे  प्रेम बीज बचा के रखना

मनोज दुबे श्रीकांत

Sunday, July 26, 2020

गजल


बरसती गजल



घिर के आए बदरा तो बरसी ऐसी
बिन पानी के जो महीनो तरसी ऐसी

चमकी बिजुरिया  बनके आकाश मे
डरा करके मन को  जो  दमकी  ऐसी

रिमझिम रिमझिम सी बरसती बूंदे
 तन मन को मेरे  जो भिगाती ऐसी

सूखे दरख्त पर लाती बहार अक्सर
कर पल्लवित  डाल पर कोपल ऐसी

झूमकर डोलता श्रीकांत वन उपवन मन
बूंद अमृत की सावन जो बरसी ऐसी

मनोज दुबे श्रीकांत


गुस्सैल गजल


गुस्सैल गजल




पास मेरे आई ऐसे भनभना के
जैसे   बदरा हो कोई घनघना के

चला दिए कई शब्दो के बाण उसने
आई हो जैसे कि पास मन बना के

 आई  लाल मरचा सी  बनके उस दिन
 मेरे सामने ऐसे  कि तमतमा के

मार देती दो चार छापड तो क्या
बात  करती रही  दिन मे दनदना के

ऐसा रुप  देखकर  उसका भैया
रह गया मै अटपटा  सनसना के

बैठा रहा श्रीकांत दिन भर चुपचाप
गृहस्थी से अपनी अब अनबना के

मनोज दुबे श्रीकांत

गुस्सैल गजल


गुस्सैल गजल




पास मेरे आई ऐसे भनभना के
जैसे   बदरा हो कोई घनघना के

चला दिए कई शब्दो के बाण उसने
आई हो जैसे कि पास मन बना के

 आई  लाल मरचा सी  बनके उस दिन
 मेरे सामने ऐसे  कि तमतमा के

मार देती दो चार छापड तो क्या
बात  करती रही  दिन मे दनदना के

ऐसा रुप  देखकर  उसका भैया
रह गया मै अटपटा  सनसना के

बैठा रहा श्रीकांत दिन भर चुपचाप
गृहस्थी से अपनी अब अनबना के

मनोज दुबे श्रीकांत

गुस्सैल गजल


गुस्सैल गजल




पास मेरे आई ऐसे भनभना के
जैसे   बदरा हो कोई घनघना के

चला दिए कई शब्दो के बाण उसने
आई हो जैसे कि पास मन बना के

 आई  लाल मरचा सी  बनके उस दिन
 मेरे सामने ऐसे  कि तमतमा के

मार देती दो चार छापड तो क्या
बात  करती रही  दिन मे दनदना के

ऐसा रुप  देखकर  उसका भैया
रह गया मै अटपटा  सनसना के

बैठा रहा श्रीकांत दिन भर चुपचाप
गृहस्थी से अपनी अब अनबना के

मनोज दुबे श्रीकांत

गजल

     घंटा गजल






नही कोई ज्ञान लिख रहै है  क्या घंटा गजल
तरननुम है नही गा रहे हैं  क्या घंटा गजल

न शेर  है न  शायरी है न  मिश्रे का कोई तुक
बिना रदीफ काफिए के है क्या घंटा गजल

बहर तुक मे आ नही रही कही से कही तक
  बे हया बेकार बेजार  है क्या घंटा गजल

न इश्क न मोहब्बत और नजाकत  की बाते
 गम ए  बेवफाई के बिना है क्या घंटा गजल

करते रहे गजल ऐक से बढकर एक श्रीकांत
मिले न दाद शेर पर तो है क्या घंटा गजल

मनोज दुबे श्रीकांत


Tuesday, July 7, 2020

बदनाम गजल









                           बदनाम गजल
           



इश्क की बातो से  गुलजार हो गई
निकली गलियो से तो बदनाम  हो गई

ऊडते रहे पैसे और महकते रहे जाम 
ऐयासो के मनोरंजन का मकाम हो गई

 नाजीज कनीज पाकीजा सी नाचती रही
बनारस की गलियो का   नाम हो गई

 छीनती रही स्वतंत्रता उनकी बाई ऐसे ही
 देह  उनकी. रूपयो की गुलाम हो गई

चलता रहा सब ऐसे ही श्रीकांत उनका सब
   कब सुबह  दोपहर रात और   शाम हो गई

मनोज दुबे श्रीकांत





Monday, July 6, 2020

अपनी गजल

                           अपनी गजल
         


               


कुछ अजब गजब  अपनी गजल
 रदीफ काफिया की अपनी गजल

बंधकर के बहर मे जो निकली
घर की बहू बेटी सी अपनी गजल

मिश्रा मक्ता और सेर  ए  शायरी
 मोहबबत की खुशियां अपनी गजल

झुमकती ठुमकती लाजाती शरमातीम
इठलाती बलखाती अपनी गजल

निकलती सज सवरकर जब  श्रीकांत
सारे शहर की जान अपनी गजल

मनोज दुबे श्रीकांत

Thursday, July 2, 2020

आज के मुक्तक

भारत चीन के रिशतो पर

दोस्त बन कल तक तलवे चाटता रहा
खाया जिस थाली मे छेद करता रहा
नमक हराम नामाकूल बेईमान सा तू
दोस्ती के रिशते को दागदार करता रहा

समर्पण को  तू मजबूरी समझता रहा
वक्त बे वक्त आखे भी दिखाता रहा
मै मानता रहा तुझे अपना अजीज
मिलकर गले पीठ पर  छुरा घोपता रहा

वक्त तुझको भी बता देगा ऐक दिन
हिसाब तेरा भी कर देगा पूरा ऐक दिन
काटो को बोकर फूल मिलेगे कब तक
दिल को लहूलुहान कर देगा ऐक दिन

मनोज दुबे श्रीकांत

गजल


                       टपोरी गजल


           ऐक लड़की अपनेको भी पटा दे बाबा
           फूल प्रेम  का दिल मे खिला दे बाबा

            बरसो से घूम रहा हूँ  बनकर टपोरी
            ऐक गर्ल फ्रेंड् अपनी  भी बना दे बाबा

                निकलू घर से बाहर जब जब उसके
               नजरो को बस   दीदार करा दे बाबा

               चोक चोराह स्कूल कालेज  या  मंदिर
                 ऐक बार कही  तो  उससे मिला दे बाबा

                  लगा कर कुछ जुगाड मेरी  भी उससे
                    अब चक्कर अपना भी चला दे बाबा

                      कर दूंगा जैसा भी तु चाहेगा वैसा ही
                  उसको अपना सब कुछ  बना दे बाबा

                    क्या क्या करू श्रीकांत उसको पाने को
                 मंत्र  वसीकरण का अब तो  बता दे बाबा

                     
मनोज दुबे श्रीकांत





Wednesday, July 1, 2020

आज के मुक्तक

भारत चीन के बिगडते रिश्ते



कहने को  और क्या कह दू दोस्त तुझे
गददार एहसान फरामोस कह दू तुझे
लगाकर गले करता रहा वार पीठ पर
आस्तीनों का साप क्या कह दू तुझे

दूध  मै अपने होथो से पिलाता रहा
तू सुधा को गरल  सा  करते  रहा
नही समझा मेरे जजबातो को कभी
होकर के अजगर तू  मुझे डसता रहा

अब बढा ली दुश्मनी  जो तूने इतनी
की थी कभी दोस्ती तूने नही जितनी
देता है साथ आजकल मेरे  दुश्मनो का
दोसती की कीमत थी  क्या बस इतनी

मनोज दुबे श्रीकांत




     
              वक्त की ताकत




वक्त क्या क्या जुगाड़ लगा देता है जनाब
अंधे के हाथ मे  बटेर लगा देता है जनाब

फाके पडते रहते है किसी के घर मे देखो
 कई गधो को पंजीरी खिला देता है जनाब

आता जाता भले ही नही कुछ बिल्कुल उसे
अंधो मे काना राजा बना देता है जनाब

करते रहते है जुगाड़ आगे बढने की लोग
उललू  उसका  सीधा करा देता है जनाब

कया कहे श्रीकांत वक्त मारता है जब भी
सौ टका हिसाब पूरा कर देता है जनाब

मनोज दुबे श्रीकांत



व्यंग

 [12/9/2020, 11:56 AM] Manoj Dubey: आन लाईन कलास का पंगा  कल आन लाईन कलास मे  हमने कैमरा आन करने का  बोला कुछ छातरो का  मन भय से डोला  पंद्र...