पारिवारिक गजल
अपने परिवार को सदा ऐक बना के रखना
बुरी नजरो से सबकी उसको बचा के रखना
सुन लेना कभी सबके मन की बातो को
अपने मन की सदा मन मे दबा के रखना
न रखना भेद कभी अपने तुपने का मन मे
व्यवहार सबके साथ एक सा बना के रखना
क्या तेरा क्या मेरा न लाना मन मे कभी
जमीन जायदाद की दूरियो. को बढा के रखना
चार दिवारी न बन जाए कभी घुटन का घर
अपने घर को सदा ऐक घर बना के रखना
लडने को मत लड़ जाना अपनो से द्वापर से
अपने घर को महाभारत से बचा के रखना
रहना राम लखन भरत शत्रु घन भाई से सदा
दुर्योधन शकुनी की नीति से बचा के रखना
काका दादा के नाम मत करना भेद कभी भी
स्नेह सब पर ऐक सा सदा बना के रखना
पनपने न देना काटे कभी श्रीकांत बैर के
घर के आंगन मे प्रेम बीज बचा के रखना
मनोज दुबे श्रीकांत
अपने परिवार को सदा ऐक बना के रखना
बुरी नजरो से सबकी उसको बचा के रखना
सुन लेना कभी सबके मन की बातो को
अपने मन की सदा मन मे दबा के रखना
न रखना भेद कभी अपने तुपने का मन मे
व्यवहार सबके साथ एक सा बना के रखना
क्या तेरा क्या मेरा न लाना मन मे कभी
जमीन जायदाद की दूरियो. को बढा के रखना
चार दिवारी न बन जाए कभी घुटन का घर
अपने घर को सदा ऐक घर बना के रखना
लडने को मत लड़ जाना अपनो से द्वापर से
अपने घर को महाभारत से बचा के रखना
रहना राम लखन भरत शत्रु घन भाई से सदा
दुर्योधन शकुनी की नीति से बचा के रखना
काका दादा के नाम मत करना भेद कभी भी
स्नेह सब पर ऐक सा सदा बना के रखना
पनपने न देना काटे कभी श्रीकांत बैर के
घर के आंगन मे प्रेम बीज बचा के रखना
मनोज दुबे श्रीकांत





