उड़ाना चाहते है अब मुझको
टहनियां काटने को आतुर है लोग
शाख से उड़ाने को आतुर है लोग
बना ले न आशियाना हम पक्का
मारने को पत्थर आतुर है लोग
गिराने को खींचते है टांग मेरी अक्सर
खोदने को गड्ढा आतुर हैं लोग
गुजारता हूँ रात जैसे तेसे शाख पर अपनी
भगाने को कल भोर मे आतुर हैं लोग
बचोगे कहा तक श्रीकांत तुम अपनो से
आस्तीन के साप बनने को आतुर है लोग
मनोज दुबे श्रीकांत
टहनियां काटने को आतुर है लोग
शाख से उड़ाने को आतुर है लोग
बना ले न आशियाना हम पक्का
मारने को पत्थर आतुर है लोग
गिराने को खींचते है टांग मेरी अक्सर
खोदने को गड्ढा आतुर हैं लोग
गुजारता हूँ रात जैसे तेसे शाख पर अपनी
भगाने को कल भोर मे आतुर हैं लोग
बचोगे कहा तक श्रीकांत तुम अपनो से
आस्तीन के साप बनने को आतुर है लोग
मनोज दुबे श्रीकांत

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