आदत
तेरी आदत ही कुछ ऐसी थी कि मै बदल न सका
अपने आप को तुझमे कभी खुद को ढाल न सका
बगावती तू था दुर्जन जलता मन ही मन मुझसे
तरककी को मेरी तू कभी पेट मे पचा न सका
बदलने को कोशिश की बहुत कि तुझे बदल दू
दुर्जन से तुझे सज्जन कभी मै बना न सका
तेरे शबदो का कोई ईलाज बचा नही था पास मेरे
चाहकर भी मै मन से कभी तुझे माफ न कर सका
क्या कहे श्रीकांत तुझे जालसाज नमक हराम
तु काला धब्बा का दोष कागज से मिटा न सका
मनोज दुबे श्रीकांत
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