Saturday, September 26, 2020

लघु कथा

 

अनलाक फोर और राखी 


लाक डाऊन के बाद शहर मे धीरे धीरे अन लाक चालू हो रहे थे पर विदयालय नही खुल रहे थे राखी के पेरेंट और उसको चिंता थी इस बार उसका बारहवी की बोर्ड परिक्षा थी आन लाईन कलाश मे पर्याप्त मार्ग दर्शन नही मिल पा रहा था कही कोई कोचिंग संस्थान भी नही लग रहे थे

बडे दिन बाद विदयालय खुलने की परमीशन सरकार के दवारा दी गई इससे उसकी खुशी का कोई ठिकाना नही रहा वह उसकी काफी किताब बैग जमा रही थी स्कूल जाने के लिए तभी फोन बजा मै सी बी बी एस सी विदयालय से प्रिंसिपल बोल रहा हूं आपकी बेटी की शेष फीस जमा कराकर एडमीशन शुल्क भी जमा करा दीजिये तभी हम बच्ची को परामर्श कक्षा मे प्रवेश दे पाएगे

 कितना होगा सर जी यही कोई पंदरह बीस हजार सर एक दम से इतना रूपय तो जमा नही पाएगा लाकडाउन के चलते विगत महीनो से पगार नही है घर खर्च भी नही हो पा रह है आप अभी कुछ रियायत दे दे तो उचित होगा

नही रमेश जी हमारे मालिक का हुकुम है हमे भी टीचरो को पेमेंट मेंटनेस करना पडता है रमेश इधर सोच रहा था मेरा मंझला बेटा उसी के जैसे विदयालय मे शिक्षक है उसे तो लाकडाऊन के दोरान पेमेंट नही मिला और अब भी बमुश्किल पचास पर्सेंट मिल रहा है मगर फीस के लिए दवाब कैसा इस समय  मे ऊपरवाला ही जाने सरकार के नियम कानून रमेश गहरी सास लेकर अपनी पत्नी से गोरी तुम्हरे ऐक जोडी कंगनहो तो वही दे दो गिरवी रख बिटिया की फीस जमा कर आऊ

राखी पिता की मजबरी भाप रही थी और अपनी आखो से आसू पोछते हुए बैग से किताब निकाल कर अलमारी मे  रख रही थी कहते हुए बाबू जी मेरा नाम सी बी एस सी से निकालकर पास के ही ऐम पी बोर्ड के विदयालय मे करा दीजिये वैसे भी परसेट ऐम पी बोर्ड मे अचछे से बन जाएगे कालेज मे दाखिला अंकसूची बेस पर नहीपरसेंट बेस पर होता है 


मनोज दुबे श्रीकांत 

Wednesday, September 23, 2020

गजल

 बड़ी ही खूबसूरत लगती हो फेसबुक और तुम 

मुझे तो तुम अपनी लगती हो फेसबुक और तुम


 लाइक टैग कमेंट पर गुजर जाता है वक्त मेरा  

मोबाइल पर जब आती हो फेसबुक और तुम


 आन लाइव रूम से बहल जाता है मन मेरा

 बात जब कभी कर लेती हो फेसबुक और तुम


 सुंदर दोनों  लगती हो इसमें कोई दो बात नहीं

 बड़ी ही हसीन लगती हो फेसबुक और तुम 


अदाए तुम दोनो की है ऐक से बढकर के ऐक 

 कितना जुल्म सा  करती हो फेसबुक और तुम


मन मेरा भरने लगता है उड़ान अनंत आकाश

मन जब समा जाती हो फेसबुक और तुम 


 रहती हो पास तो अच्छा लगता है मन को मेरे 

दूर हो  तो  बेचैन कर देती हो फेसबुक और तुम


 मोहब्बत हुई है श्रीकांत को दोनों से इस कदर

 दिल के पास पास लगती हो फेसबुक और तुम



Tuesday, September 22, 2020

गजल

 हाथो मे हाथ जरा रहने दे


मेरे  हाथों में तेरा हाथ जरा रहने दे

 कुछ बाते मेरे मन की जरा कहने दे


 बैठू कुछ पल को तेरे सामने तो मैं

 मेरी आंखों  आंखों को जरा मिलने दे


 कुछ कह दूं मैं और कुछ कहते तू अपनी

 बातें   दिलो की गौर से जरा सुनने दे 


अभी अभी तो बैठी हो मेरे पास में तुम

 4:00 बज गए  है अभी जरा ढलने  दे


 सुहानी शाम से ढलती रात तक रुको तुम 

 बातें प्रेम की अपनी परवान जरा चढने दे


मोहबबते मेरी बिंदास है समझ ले श्रीकांत

कोई नयी कहानी अपनी भी जरा बनने दे 


मनोज दुबे श्रीकांत

Sunday, September 20, 2020

पिता जब तुम थे

 16 – पिता जब तुम थे 


पिता जब तुम थे 

तब तक सही था 

सब खामोश थे 

तुम्हारे दबदबा में 

किसी ने चूं  तक 

नहीं की थी 

सब हाँ में हाँ 

मिलाते थे आपकी 

जो भी कहते थे आप 


पिता जब तुम थे 

तो हम निष्फिक्र थे 

हम भान नहीं था 

रीति रिवाज परंपरा का 

जो थे 

समाज में व्याप्त अपने 


पिता जब तुम थे 

तो 

जमाना कितना 

सस्ता था 

बाजार से ले 

आते थे 

सब कुछ 

मुट्ठी भर 

पैसों में 

खरीद कर 

अपनी खुशियाँ 


पिता जब तुम थे

तो रस था




त्योहारों में 

उत्सव में 

होली दशहरा 

दीपावली सब 

लगते थे 

मन को अच्छे 

क्योंकि नहीं होता था 

कोई द्वेष विरोध 

लोगों के मन में 

और न ही 

होती थी चिंता 

पर्यावरण की 


पिता जब तुम थे 

तो लहलहाते थे 

खेत 

फसलों के 

अन्न – धन से 

भरे रहते थे 

भंडार 

बोरों से बंडा तक 

टचाटच 

नहीं होता था 

अनाज का खालीपन 

ओर टोटा 

बोरों सा 

बट जाता था 

मजदूरों और समाज में 


पिता जब तुम थे तो

घर चलता था 

सरपट 

दौड़ता पटरी 

पर गृहस्थी की 




बिना तू – तू  मैं – मैं के 

सब परिवार के 

“वसुदैव कुटुम्बकम”

साथ का सन्देश देते 

समाज के 

और तुम 

करते थे काम 

मुखिया से 

आगे होकर 

घर के आंगन 

का बरगद

 होकर


पिता जब तुम थे 

तो समय कब 

निकल जाता था 

घोड़ों पर 

सवार 

पता ही नहीं चलता था 

मंजिलों का 

वे कब मिल जाती थी 

ईमानदारी की 

मेहनत से 

थोड़े ही परिश्रम से  


पिता जब तुम थे

तो भान 

नहीं था हमें

कुछ भी कर

लेते थे हम 

बिंदास बेधड़क 

हमें पता 

होता था पीछे 




आपका साथ 

जो हमें 

लड़ने की संभावनाओं 

प्रबल बनाता था जीवन 

की समस्याओं में 


पिता जब तुम थे 

तो मेहरबान 

था मौसम 

सर्दी – गर्मी – बरसात 

का 

बसंत का भी 

जब खिलते थे 

पुष्प लहलाते थे 

श्वेत जिन पर 

मंडराती थी तितलियों 

के साथ 

भौरें करते थे 

गुंजन 

घर की दीवारों 

की चौखट 

में बना कर घर 

अपना 


पिता जब तुम थे

तो कितना

आसान था

घर बनाना 

चार दीवारी का 

यही विश्वास था 

कच्चे घर के 

आँगन में 

मिल जाती थी 




खुशियाँ 

अनायास ही 

जीवन में 

अपने में 

कही थी 

चुपके से

किसी भी बहाने से 


पिता जब तुम थे 

रिश्ते बनते थे 

सहज ही काका 

दादा - मामा 

बुआ – फूफा 

 चाचा – चाची सबके 

सब मिलते थे 

छुपी ख़ुशी 

मिलते मिलाते 

बढ़ाते माधुर्य 

परिवार में 

कोई भी नहीं 

होना चाहता था 

अलग 

अपने लोगों से 

उन दिनों 


पिता जब तुम थे 

तो 

दुरुस्त था सब 

इम्युनिटी से 

लेकर शरीर

तक बीमारियाँ 

नहीं होती थी 

कभी किसी को 




सब रहते थे

स्वस्थ तंदरुस्त 

घूमते खाते 

सुबह की हवा 

ब्रह्ममुहूर्त 

में उठकर के 

अपने घर के बाहर 


पिता जब तुम थे 

तो नहीं था 

कोई बेईमान 

और न ही 

बेईमानी ज़माने 

में सब 

भक्त थे एकदूसरे 

के कामों के 

और क्लीयर 

रखते थे 

अपना – अपना 

हिसाब जो 

जड़ बनता था 

झगड़े की  

कभी - कभी 

  परिवार में 

जब कभी भी 

होता था बंटवारा 


पिता जब तुम थे 

तो नहीं थे 

टेक्नोलॉजी के 

कोई समान

सब मित्रवत 

रहते थे  




बतियाते चौपाल 

चौक – चौराहों 

गुमठियों पर 

नहीं रहते थे 

चौपाल खाली 

जब हाथ भले 

रहते थे 

खाली 

आजकल तो 

हाथ में सबके 

रहता है मोबाइल 

और सबका मुंह 

रहता है बंद 

आज के ज़माने में 

टुच टुचाते कीबोर्ड 

हों या 

सरकाते 

स्क्रीन की टच को 

अपने मोबाइल की 

अपनी अँगुलियों 

अनसुनी करते 

बातों को अपनों 

के बीच की 


पिता जब तुम थे 

तो 

उपज आ 

जाती थी 

भरपूर 

दानों में 

फसलों की फली 

में

मूंग – मटर – चना 




मसूर 

सोयाबीन सब 

होते थे 

और कटती थी 

फसल 

मनचाही 

एवरेज से 

लबरेज होकर 

गाड़ी भर – भर कर 

भूसा भी 

गायों के लिए 

आ जाती थी घर पर 

और आज 

ढूँढ़ते फिरते हैं 

चारा 

ट्रैक्टर ओर हार्वेस्टर 

युग में 

हम गाँव – गाँव 

हम अपने गौधन के लिए 


पिता जब तुम थे तो 

थी गाय कई 

ओर आठ जोड़ी 

बैल 

बंधते थे सार में 

सुबह शाम लगता 

था दूध 

ग्लास भर भर    

पीते थे सब 

जब माँ 

पकाती थी 

कड़ाईया में 

डालकर



 

दूध को 

बनाती थी हरी 

शाम को 

खिलाती थी 

कभी दूध – भात 

जब आते थे 

सब घर 

के सदस्य 

या 

रूठ जाता था 

मैं अपनी 

जिद में 


पिता जब तुम थे 

नहीं थे

बनावटी रिश्ते 

कोई नहीं हटता था

 अपनी बात

 से 

सब के सब 

बंधे थे एक 

सूत्र में 

रेशम के 

धागे से 

निभाने को 

अपनी 

रिश्तेदारी

निःस्वार्थ 

बिना किसी

भेदभाव के 

सींचते अपने 

रिश्ते को 

केवल एक 




मुस्कुराहट 

पर 

झुकते देखते थे 

हम दुश्मनों 

को घुटने के बल पर 

आत्मसमर्पण करते 


पिता जब तुम थे 

दो रिश्तों की 

माधुर्यता छलकती थी 

दोस्त और दोस्ती 

की मिसाल थी 

नहीं खोदते थे 

दोस्त अपनों

के लिए गड्ढा 

और न ही 

आल्हादित होते थे 

अपने मित्र की 

बुराई पर 

न ही जलते थे 

सफलता पर 

अपने मित्र की   

आपके बाद

 बदल गया

सब कुछ 

कब पता नहीं चला 

दबे पाँव 

जैसे वक़्त 

निकल गया

टिक – टिक करता 

घड़ियों के काँटों में 


पिता जब तुम थे 




तो नहीं थे 

मनोरंजन के ज्यादा साधन 

कुछ श्वेत – श्याम फिल्मों 

के साथ 

नाटक – नौटंकी रासलीला   

रामायण , रामसत्ता थे 

जिनमें सीख थी 

समाज को 

एक दिशा देने की 

मर्यादा से लेकर 

अत्याचारों के 

दमन की कहानियों 

में 

प्रमुख भूमिका 

दिखाई देती थी रामराज्य 

के राम की कल्पना में 

तो श्री कृष्ण के 

गीता के संदेशों में 

कर्म की प्रधानता को 

विध्वंश और सृजन 

सब कुछ 

दिख जाता था सहज ही 

मौखिक केवल वृतांत से ही 

समय गुजर जाता था 

भाव भक्ति के साथ 

कुछ नया करने को 

परलोक के लिए 

गाकर कुछ पद – चौपाई 

दोहा सारे या पढ़कर श्लोक 


पिता जब तुम थे 

तो जमाना ही 

अलग था 




पता है मुझे

सब चलता था 

नदी के प्रवाह सा 

बहता कल - कल  

निर्मल – निश्छल 

प्रेम बरसाता 

टिमटिमाता बूंदों 

की बारिश सा 

जगमगाता सितारों 

सा 

खिलता फूलों

 सा 

सुमनगंध 

से महकाता 

कोना – कोना 

मन का 

दूर कहीं से 

मन की गहराईयों  

में उतरकर 

बनाता घर 

आँगन को 

रिश्ते की 

मधुरता को 

पहले से कल तक 

और कल से आज तक 

वैसे ही जैसे 

तुम आते – जाते 

थे कभी घर से 

बाहर 

और आते थे 

लौटकर कभी 

घर में





लेकर खुशियों 

के लड्डू 

और मुस्कानों 

को 

जो देती थी 

हमें एहसास 

सुखों के पलों 

का 

जब – जब 

हम हार जाते 

थे कभी 

अपनी जिंदगी की 

उन समस्याओं के 

मकड़जाल में 

तब आ 

जाती थी 

तुम्हारी 

स्मृतियाँ 

उबारने को 

हमें बनकर 

आशीर्वाद 

करने को 

कालजयी समय के फेर में 

जीतकर गढ़ने को 

अपना स्वर्णिम 

भविष्य    


मनोज दुबे श्रीकांत 

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Saturday, September 19, 2020

कविता


सानेट का ऐक


प्रयाश


कल वो मुझसे कुछ ऐसा बोली

खलती रहे मुझे उसकी भाषा बोली

गुनता रहा मे मन ही मन मे सब

घर से बाहर न निकला जब वो निकली

चलता रहा मन मे अजीब अंतर्द्वंद

छलकर के वो मुझे कुछ ऐसी डोली

जलता रहा मै और जलती रही वो

झमकती लता सी होकर ऐसी होली

टूटता सा  काच सा चरमराय करके

ठुमक ठुमक के वो  बनके निकली

डब डबाती आखो से निकलते आसू

ढलती शाम  उस दिन की ऐसी निकली 

तुम ऐसी तो थी नही कभी फिर बदली कैसे

थमे निशचल नीर कोई हलचल हो जैसे 

दमकती रही दामिन तुम डाराती मन को

धुनता रहा मन मे उधेडबुन मे खुशियो मे

मनोज दुबे श्रीकांत 


Friday, September 18, 2020

मेरे पिता




मेरे पिता 


घर आंगन परिवार मेरे पिता 

नीम बरगद छाव  मेरे पिता

सुख समृद्धि यश धन वैभव

ईशवर का वरदान मेरे पिता


 घर दीवार आंगन छत  मेरे पिता 

सुख दुख  धूप  छांव मेरे पिता 

 नदी तालाब झरना  से निरझर 

उमड़ता घुमडता सागर मेरे पिता 


ग्रह नक्षत्र तारे सितारे  मेरे पिता 

 सूरज चंदा चांदनी मेरे पिता 

 पर्वत वन  लता वृक्ष और पत्ते 

 वन उपवन  और बाग मेरे पिता


 वर्षा शरद ग्रीष्म मेरे पिता

सावन भादो  फागुन  मेरे पिता

फलते फूलते वृक्ष जो आगन के

रितुराज  बसंत से  मेरे पिता  


अनार आम क ख ग घ मेरे पिता 

मात्रा बारहखडी शब्द मेरे पिता

कागज कलम स्लेट और कापी 

 पढाते सिखाते  पाठ  मेरे  पिता


खेत खलिहान हल मेरे पिता

लहलहाती फसल मेरे पिता

मेहनत लगन इच्छा मेरे मन की 

कर्तव्य पथ अनुशासन मेरे पिता


धन धान्य  और अनाज मेरे पिता 

घर बाजार होटल  रेसतरा मेरे पिता 

साग सबजी का छोला का रखे हाथ 

चलती फिरती कोई दुकान मेरे पिता 


जन्मदिन त्योहार उत्सव मेरे पिता 

रीति रिवाज और  परंपरा मेरे पिता 

घर  के कर्तव्यों का निरवाहन सदा 

 पजाने माने  प्रतिष्ठित  मेरे पिता 


बारात  बैड बाजा तुरही मेरे पिता 

ढोल ढमाका डी जे डांस  मेरे पिता 

माता पूजन गणेश पूजन  मंडप 

कन्या दान पाव पखराई मेरे पिता 




अखबार मैगजीन  मेरे पिता 

टीवी मोबाइल टेबलेट मेरे पिता 

मेमोरी  रख सम्हालते वर्र्षो की 

 कोई सुपर कम्पयूटर मेरे पिता 


समाचार खबरों विज्ञापन मेरे पिता 

जांच परख परीक्षण मेरे पिता 

लगा लेते हैं अनुमान सच झूठ का

एकदम  सटीक  पैमाना मेरे पिता


 दया करुणा आशीष मिश्रा मेरे पिता

दुख दर्द  दवा खुराक  मेरे पिता

 मरहम से हर लेते हैं पीआ सब 

डाक्टर वेद हकीम मेरे पिता


सोना चांदी लोहा  तांबा मेरे पिता 

रत्न हीरे जवाहरात मेरे पिता 

सोलह श्रंगार मां के तीज तयोहार 

सौभाग्यवती का आशीर्वाद मेरे पिता


कल आज परसो नरसो  मेरे पिता 

दिन सप्ताह महीनो  मेरे पिता 

जन्म से जीवन भर निभाते साथ 

साल दशक शताब्दी मेरे पिता 


सरल सहज सौम्य मेरे पिता 

जीवन कर्तव्य पथ मेरे पिता

जटिल समस्या विकट घडी मे 

कोई साल्यूशंन से  मेरे पिता


अनंत अनवरत अडिग मेरेपिता 

द्रढ संकल्प इच्छा शक्ति मेरे पिता

पूजा पाठ रीति रिवाज परम्परा 

ईमान करम  धरम  मेरे  पिता 


मन के सपने रात दिन मेर पिता 

स्वछंद आकाश मे उडान मेरे पिता 

इच्छा शक्ति अनंत जिजीविषा मन की 

लगन परिश्रम  मंजिल  मेरे पिता  


डंडा घड़ी चश्मा एल्बम मेरे पिता 

 यादो की तशवीर से मेरे पिता 

 गाव शहर राह और  पगडंडी 

 मेरे मन की मंजिल से मेरे पिता 


रामायण कुरान गीता मेरे पिता 

धर्म संस्कृति परमपरा मेरे पिता 

रंग गुलाल अबीर पिचकारी 

होली दिवाली दशहरा मेरे पिता। 


लड पटाखा फुलझरिया मेरे पिता 

खील बताशे  मिठाईया मेरे पिता। 

अनार चकरी राकेट आफताब 

तयोहारो की खुशियां मेरे पिता 


देव मनुज  सज्जन  मेरे पिता 

सरल सहज सुगम मेरे पिता 

भावना इच्छा मनोकामना मन की 

मन्नत  दुआ प्रार्थना  मेरे पिता 


गुणा जोड घटाना भाग मेरे पिता 

गिनती पहाडे  संख्या मेरे पिता 

हल एक कठिन सवाल   का गणित 

सरल सहज  सुगम विधी मेरे पिता 


सरल सहज लघु दीरघ  मेरे पिता 

प्रश्न  कापी  उत्तर  मेरे पिता 

पेपर परीक्षा टाईम टेबल मेरे पिता 

 परिक्षक निरीक्षक शिक्षक मेरे पिता 


लहरे पल्लर जलतरंग मेरे पिता 

स्तब्ध निशचल नीर मेरे पिता 

कल कल से निर्झर रहते सदा

अमृत जल बिंदु से मेरे पिता 


धरा पर्वत नदी सागर मेरे पिता

लोक परलोक दे धाम मेरे पिता 

वरद-हस्त और कृपा ईशवर की

मन्नत जन्नत  कामना  मेरे पिता 



साहस धैर्य  ओर संकल्प मेरे पिता 

अविरल अडिग अचल मेरे पिता 

करने को खवाब पूरे मेरे मन के 

उममीद  आशा की उडान मेरे पिता


तिलांजली अंजुली भर  जल मेरे पिता 

पुरखा पाठ धूप दीप नेवेद  मेरे पिता

करने को दान धरम और कुछ पुण्य 

तिथि श्राद्ध मान और  दान मेरे पिता


मनोज दुबे श्रीकांत

Thursday, September 17, 2020

 कुछ यादे मन को ताजा कर जाती है और वो बाते जो हमारे जीवन की अहम तो फिर कहने ही क्या है हर ऐक के जीवन का वह दौर जब वो रूबरू होता है अपनी पहली मोहब्बत से दूसरी तीसरी से नही

   कहो तो ले चलू तुमको 





तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर तुमको

देखने को उसको जी भर के फिर से 

कालेज के  उस जमाने फिर तुमको


करा दू याद पहली मोहब्बत को

इश्क के वादे कशमे सब तुमको

देखना उसका पलटकर के लजा के

दोस्तो के संग मुस्कुराना तुमको

तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर तुमको 


चाहना बार बार मिलना उससे 

घंटो  उससे बात करना  तुमको 

कालेज के वो पेड़ों के झुरमुट मे 

टिपटी पर संग मे बैठना तुमको 


तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर तुमको


हथेली  पर नाम लिखना उसका 

किताब मे रख खत देना तुमको 

जवाब मे उसकी हा सुनने को 

कलास मे बेताब होना तुमको 

तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर तुमको

गली मोहल्ला करना उसका एक 

सज सवरकर देखना  तुमको 

चुपके चुपके से निकल कर घर से 

छत पर शाम को देखना तुमको 

तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर 

अपने मन की सब  बातो को 

छोटी बहना को बताना तुमको

बात बात पर बाबू जी का डाटना 

मा को साथ तुम्हारा देना तुमको 

तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर तुमको


बाते कुछ मीठी मीठी खटटी खटटी सी 

निकालकर यादो के एलबम से तुमको 

पहली बार की पहली पहली उससे  

मोहब्बत की वो   मुलाकात   तुमको 

तुम कहो तो  चलो ले चलू तुमको

पुरानी यादों के दिनो मे  फिर तुमको

देखने को उसको जी भर के फिर से 

कालेज के  उस जमाने मे तुमको



मनोज दुबे श्रीकांत 



व्यंग

 [12/9/2020, 11:56 AM] Manoj Dubey: आन लाईन कलास का पंगा  कल आन लाईन कलास मे  हमने कैमरा आन करने का  बोला कुछ छातरो का  मन भय से डोला  पंद्र...