बदनाम गजल
इश्क की बातो से गुलजार हो गई
निकली गलियो से तो बदनाम हो गई
ऊडते रहे पैसे और महकते रहे जाम
ऐयासो के मनोरंजन का मकाम हो गई
नाजीज कनीज पाकीजा सी नाचती रही
बनारस की गलियो का नाम हो गई
छीनती रही स्वतंत्रता उनकी बाई ऐसे ही
देह उनकी. रूपयो की गुलाम हो गई
चलता रहा सब ऐसे ही श्रीकांत उनका सब
कब सुबह दोपहर रात और शाम हो गई
मनोज दुबे श्रीकांत

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