Tuesday, July 7, 2020

बदनाम गजल









                           बदनाम गजल
           



इश्क की बातो से  गुलजार हो गई
निकली गलियो से तो बदनाम  हो गई

ऊडते रहे पैसे और महकते रहे जाम 
ऐयासो के मनोरंजन का मकाम हो गई

 नाजीज कनीज पाकीजा सी नाचती रही
बनारस की गलियो का   नाम हो गई

 छीनती रही स्वतंत्रता उनकी बाई ऐसे ही
 देह  उनकी. रूपयो की गुलाम हो गई

चलता रहा सब ऐसे ही श्रीकांत उनका सब
   कब सुबह  दोपहर रात और   शाम हो गई

मनोज दुबे श्रीकांत





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