बरसती गजल
घिर के आए बदरा तो बरसी ऐसी
बिन पानी के जो महीनो तरसी ऐसी
चमकी बिजुरिया बनके आकाश मे
डरा करके मन को जो दमकी ऐसी
रिमझिम रिमझिम सी बरसती बूंदे
तन मन को मेरे जो भिगाती ऐसी
सूखे दरख्त पर लाती बहार अक्सर
कर पल्लवित डाल पर कोपल ऐसी
झूमकर डोलता श्रीकांत वन उपवन मन
बूंद अमृत की सावन जो बरसी ऐसी
मनोज दुबे श्रीकांत
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