Thursday, November 19, 2020

लघु कथा

 लघुकथा कपटी 


मोहन सफेद धोती पीला  कुर्ता पहने पीला  गमझा कंधे  पर डाले और माथे पर चंदन का तिलक और टोपी  लगाकर जब घर से निकलता था तो रास्ते मे जो भी मिलते सबसे राधे राधे कहता जाता था बड़ा ही ही विनम्र स्वभाव से एकदम साधू पुरूष दिखाई देता था


          मगर जब भी वह मंगो बाई के घर के सामने से गुजरता तो मंगो बाई का मुंह चालू हो जाता कपटी कुटिल बगला भगत मुह मै राम बगल मे छुरी बड़ा भगत बनता है हरामी नामाकूल नरक मे भी जगह नही मिलेगी सब समझता है भगवान तेरी भक्ति को मुआ मरे तेरी पुसते भोगेगी


             मंगो के सामने वहभी चालू हो जाता बुढिया मरेगी सड सड कर के कोई पानी वाला भी नही मिलेगा जा पापिनी चांडालनी कुलटा न जाने क्या क्या

बहुत दिनो तक यही चलता रहा आखिर ऐक दिन ऐपिसोड होनै के बाद मै मंगो के पास गया अम्मा तुम ऐसा क्यों कहती हो अरे बेटा मेरे पति के  पुरखो  की जमीन जायदाद सोने चांदी के गहने  लील गया मुझे झोपड़ी मे रहने को मजबूर कर दिया कुछ हजार रूपये का बयाज लेकर सब खतम कर दिया काका दादा की संपत्ति हडप कर गया और कयाबताऊ बेटा हर गरीब की प्रापरटी पर फन लगाए बैठा है कमबख्त भगत नही बगला भगत है कपटी

अम्माँ फिर चालू हो ग ई थी तो बंद होनै का नाम नही ले रही मै चुपचाप बैठा सोच रहा था यदि भगवान ऐसे भकतो का साथ देता है फली भूत  सुख संपन्न करता है तो फिर लाचार अम्माँ जैसो का धयान रखने वाला भगवान कहा है...........

मनोज दुबे श्रीकांत

व्यंग

 करवा चौथ के बाद 


कल के वृत  के बाद पत्नी

 ऐसी बरसी

जो लगी कही बिजली कडकी

कल का प्यार गुस्सा बन बरस रहा था

और मै मन ही मन अपनी

गलती खोज रहा था

उसकी कल  की आवभगत

की बात मेरे पहले ही गले

 नही ऊतर रही थी करवा चौथ

की न जाने कोन सी गलती

आज भारी पड रही थी

सोच रहा था

रात नौ बजे तक के हर ऐक

काम लिस्ट के अनुसार किए  थे

जो जो काम कहे थे

एक एक सब किए  थे

  साड़ी के साथ गिफ्ट मिठाई भी

लाना नही भूला था फिर भी पत्नी

 का मुह आज गुस्से से  क्यो फूला था

कल के स्वादिष्ट भोजन पकवान

और ढेर सारे प्रेम की

बाते हवा हो रही थी

पत्नी न जाने कौन सी बात पर

आग बबूला हो रही थी आज

 तो जनाब बमुश्किल ही

चाय मिल पाई है रोटी

सबजी  न जाने कब

कहा नसीब पाई है कल की

 सरलता सहजता  की

शांति मेरी गृहस्थी को भारी

पड़ रही थी और भाई साहब

मेरी गृहस्थी करवा चौथ के बाद

 के तुफान से गुजर  रही थी


मनोज दुबे श्रीकांत

लघु कथा

व्यंग

 आन लाईन कलास का पंगा 


कल आन लाईन कलास मे

 हमने कैमरा आन करने का

 बोला कुछ छातरो का

 मन भय से डोला

 पंद्रह बीस छात्रों मे से

 क ईयो ने कैमरा नही खोला

दो चार छात्रों मे जिनने खोला

उनमे से किसी का

भाई बहन ही बोला

 ऐक छात्र की लिंक पर

उसका पेरेंट आ गया

मेऔर मेरे से ऊल जूलूल

बाते कहने लगा

विगत पंद्रह दिनो

 से मै ही बच्चे की

कलास जवाईन कर रहा हूँ

और आन लाईन कलास के

नेटवर्क मे उलझ रहा हूं

कभी कुछ समझ  नही आता है

 मेडम सर क्या पढा रहे है 

दिमाग मे नही आता है 

 और तो और आजकल स्कूल

प्रशासन फीस पर

दवाब बना रहा है

शिक्षको को पेमेंट देने

की बात बता रहा है

पर सर जी हमे पता है विदयालय

आपको कितना वेतन दे रहा

लाक डाऊन का भार हम

और आप पर एक सा पड रहा है

फीस जमा नही करने पर 

 बच्चे को आन लाईन

 कलास से भगा रहा है

वो तो आप ने कैमरा

आन करवा के

सबको आज देख लिया

वर्ना गुडडू उनके दोस्तो को

  बुला  रहा था

 और मैदान पर क्रिकेट क्रिकेट

 खेलने की बोल रहा था

अभी अभी आपकी कलास के

 तीन बच्चे मेरे घर

पर बतिया रहे है

और उनके  भाई

बहन कैमरा आफ

कर आन लाईन कलास

जवाईन रहे है

 सर जी लाकडाऊन मे

 हाफ पेमेट का दर्द हम

 भी समझ रहे है

 पर बच्चे तो बच्चे भाई बहन

 पेरेंट सभी आन लाईन

कलास सेत्रस्त हो रहे है

इस आन लाईन व्यवस्था ने

बच्चो को इंटर्नेट का कीडा बना दिया है

 पढना बढना रहा ऐक तरफ

पूरा फेसबूकिया बना दिया है

 मोबाईल हमारै घर मे कलेश

 का कारण बन गया है

 और सर जी  आजकल

हमारा बेटा हमारा ही बापबन गया है

 अब इस ताम झाम को

यही बंद कर दीजिए और सकूल

खोल कर  हमारे बच्चे को वही

अनुशासित शिक्षा और

 उज्जवल भविष्य दीजिए

 हमे पता है हमारे बच्चो को

आपकी रोक टोक डाट डपट

सजा दंड  और अनुशासन के

साथ सीखता है घर पर वो कहा

किसी की सुनता है किताब के

साथ साथ बसता कई दिनो से

 बंद पड़ा और मेरे बच्चे का

उज्जवल भविष्य केवल

मोबाइल पर ही अडा है

  सर जी हम आपकी साल

भर की  पूरी की

 पूरी फीस भर देगें

सर  गरआप हमे इस

 आन लाईन कलास की

मुसीबत पीछा छुड़ा देंगे 


मनोज दुबे श्रीकांत

गजल

 तुमहारी मुस्कुराहटो से 


तुम्हारी मुस्कुराहट से ही  सब धन बरस जाता है

मेरा घर आंगन कौना कौना खुशियों से भर जाता है


तुम लक्ष्मी अन्नपूर्णा सी  जब मेरे घर मे रहती हो

 मेरे घर का अन्न धन का   सारा भंडार भर जाता है


हीरे  जवाहरात सोने चांदी रत्न सब फीके पड जाते

 सरल सहज सौम्य तुम्हारा व्यवहार झलक जाता है


धन दौलत सुख संपन्नता ऐश्वर्य सब कुछ ही तुम हो

तुमहारे साथ होने से सब कुछ सहज मिल जाता है


क्या  दशहरा दीपावली  होली   या और कोई त्यौहार

तुम्हारी खुशियों से ही मेरा हर दिन उत्सव  हो जाता है


प्रिय तुम हो श्रीकांत के संग तो कोई गम नही और 

सुख दुख चाहे हो जीवन मे सब  सूकून से गुजर जाता है 


मनोज दुबे श्रीकांत

दिवाली

दीपावली व्यंग

 रात का सपना 


कल रात को दीपावली की

पूजा के बाद जब मे सोया

गहरी नींद मे सपनो मे खोया

तो एक अजीब सपना आया

 लक्षमी जी का वाहन उललू आया

कहने लगा भैया तुम लक्ष्मी

 जी के आने के चककर मे

अपने हाथ की लक्ष्मी गवा देते हो

साफ सफैयत लीपा पोती

सजावट लड़ पटाखा मे

कितने रूपये गवा देते हो

इसी खर्चे को लेकर धन तेरस से

दीपावली तक अक्सर तुममे और

तुमहारी पतनी मे खटक जाती है

और भाई साहब अपने घर की

 लक्ष्मी माता लक्षमी की

प्रसन्नता की खातिर रूठ जाती है

पहले अपनी अपनी गृह लक्ष्मी को

 मनाया कीजिए वो जो बोले

 वो वो ही किया कीजिए

 कयोकि श्रीमन शास्त्र भी

झूठ नही बोलते  हैं  जहा रहती है

पत्नी प्रसन्न वही देवता रमते है

 धन दोलत सुख ऐश्वर्य

सब कुछ सहज ही मिल जाता है

और भाई साहब पत्नी की

प्रसन्नता से और माता लक्ष्मी का वरदान भी

फल जाता है

मैने कहा उललू महाराज आप

बिलकुल सही फरमा रहे है

माता लक्षमी का इंतजार है

हमे आखिर कब बुला रहे है

तभी मेरी आखो के सामने

 बहुत तेज प्रकाश छा गया।

माता लक्ष्मी का मुस्कुराती

 छवि का दीदार हो गया

फिर उनहोने मुझे धन धान्य

 सुख संपन्नता का वर तो दिया

पर जाते जाते मेरा मन खट्टा कर दिया

कहने लगी गृह लक्ष्मी को खुश

 रखोगे तो दीपावली पर मेरी कृपा

सहज ही पा जाओगे

और घर लिपाई पुताई लड़ बम पटाखा

मिठाई नए कपडे लतते के

खर्चे से बच जाओगे ऐसा सुनकर 

मेरा सपना टुट गया और मेरा

मन पतनी को खुश रखने की उधेडबुन मे लग गया

पत्नी को हर वक्त खुश रखना टेढ़ी खीर लग रहा था

दीपावली के  सारे खर्चे का बोझ

 उससे कही हलका लग रहा था 


मनोज दुबे श्रीकांत होशंगाबाद

कुत्ता व्यंग्य

 तैसार होते देख


कल हमे तैयार होते

 देख कुत्ता गुरराया

बहुत दिनो बाद सकूल 

जा रहे हो फरमाया

क ई दिनो से  लाकडाऊन मे 

पडे पडे खा रहे थे

घर मे पत्नी बच्चो 

को टोक रहे थे

रात भर तुम्हारे घर की 

रखवारी के बाद

दिन मे दिन मे सोना 

मुशिकल कर रहे थे

तुम्हारे स्कूल जाने से मेरा

 भी जायका बदल जाएगा

और बहुत दिनो से रुखी रोटी से

 कुछ अचछा मिल जाएगा

तुमहारी आधी पीएमएस से 

घर खरच नही चल रहा है

भाभी जी और तुम्हारी 

बहस मे मेरा टेंशन बढ रहा है

भगवान करे अब तुम्हारे 

सकूल कभी बंद न हो

और थरटी फिफटी 

पेमेंट से जलदी ही फुल हो

मैने कहा गांव बसा नही 

और लुटेरो सी नजरे गढा रहा है

अभी सकूल को निकला 

नही तू नजर लगा रहा है

दुबे जी नजर नही ये बंदा 

भैरव के रूप मे आशीर्वाद दे

 रहा है और करोना लाकडाऊन 

फिपटी थरटी पेमेंट का  वक्त 

अब जा रहा है ईश्वर तुमहारे

 रोजगार वेतन को सलामत 

रखता रहे 

और तुमहारे   

दुशमनो का मुह काला  करता रहे

मनोज दुबे श्रीकांत

आदत गजलय

 आदत


तेरी आदत ही कुछ ऐसी थी कि मै बदल न सका

 अपने आप को तुझमे कभी खुद को  ढाल न सका


बगावती तू था दुर्जन  जलता मन ही मन मुझसे

तरककी को मेरी तू  कभी पेट  मे पचा न सका


बदलने को कोशिश की बहुत कि तुझे बदल दू 

दुर्जन से तुझे सज्जन कभी मै बना न सका


तेरे शबदो का कोई ईलाज बचा नही था पास मेरे 

चाहकर भी मै मन से  कभी तुझे माफ न कर सका


क्या कहे श्रीकांत तुझे जालसाज नमक हराम

तु काला धब्बा का दोष  कागज से मिटा न सका


मनोज दुबे श्रीकांत

लघु कथा

 लघुकथा मुआवजा

अरे राम भैया नर्मदा मैया की बाढ उतरे महीना हो गए जा तुम्हरी टपरिया की मरम्मत अब तक काहे नही भ ई ठंड और धूप मे पडे रहोगे तो बीमार पड जाओगे अब का बताए भैया सोच रहे है नर्मदा मैया को तनक प्रसाद मिल जातो तो टपरियां सुधार लेतो सुनो है कल तहसील से बाबू आर रहे है इनसपेकसन काजे नुकसान को पता लगाए सोच रहो है देख जाते लिख के ले जाते कछु ब ई आस मे बैठे पननीऊ चददर तान के और का इंतजार कर रहे है

कुछ महीने बाद अरे कक्का अब तो ठंड ई आ ग ई अबे तक न ई करी मरम्मत शीत लहर चलन लगी अब बैटा सोच रहे थे कि मिल जातो कछु सरकार से नुकसान को अरे कक्का मुआवजा हा बेटा और का वो तो बटे कजन कित्ते दिन हो गए दो महीना हो ग ए बटे सब शहर मे बट गयो तुम्हे नही मिलो कल तहसील मे जाके मिल ल ईयो बाबू सेआधार कार्ड ले जाके

अगले दिन कक्का आफिस मे ही मिल ग ए बेटा दिखवाए ले हमार मुआवजा को का भयो

फाईल मे देखते ही जब पढ के बताया तो कक्का के होश उड ग ए फाईल मे लिखा

था नर्मदा के एप्रोच क्षेत्र के अतिक्रमण पर किसी प्रकार का मुआवजा देय नही होगा.......

कक्का की टपरियां पर कल काम जोर शोर से चल रहा था और मुआवजा लेने का सपना फटी पनी सा दूर उड रहा था......

Saturday, November 14, 2020

रात का सपना

 रात का सपना 


कल रात को दीपावली की

पूजा के बाद जब मे सोया

गहरी नींद मे सपनो मे खोया

तो एक अजीब सपना आया

 लक्षमी जी का वाहन उललू आया

कहने लगा भैया तुम लक्ष्मी

 जी के आने के चककर मे

अपने हाथ की लक्ष्मी गवा देते हो

साफ सफैयत लीपा पोती

सजावट लड़ पटाखा मे

कितने रूपये गवा देते हो

इसी खर्चे को लेकर धन तेरस से

दीपावली तक अक्सर तुममे और

तुमहारी पतनी मे खटक जाती है

और भाई साहब अपने घर की

 लक्ष्मी माता लक्षमी की

प्रसन्नता की खातिर रूठ जाती है

पहले अपनी अपनी गृह लक्ष्मी को

 मनाया कीजिए वो जो बोले

 वो वो ही किया कीजिए

 कयोकि श्रीमन शास्त्र भी

झूठ नही बोलते  हैं  जहा रहती है

पत्नी प्रसन्न वही देवता रमते है

 धन दोलत सुख ऐश्वर्य

सब कुछ सहज ही मिल जाता है

और भाई साहब पत्नी की

प्रसन्नता से और माता लक्ष्मी का वरदान भी

फल जाता है

मैने कहा उललू महाराज आप

बिलकुल सही फरमा रहे है

माता लक्षमी का इंतजार है

हमे आखिर कब बुला रहे है

तभी मेरी आखो के सामने

 बहुत तेज प्रकाश छा गया।

माता लक्ष्मी का मुस्कुराती

 छवि का दीदार हो गया

फिर उनहोने मुझे धन धान्य

 सुख संपन्नता का वर तो दिया

पर जाते जाते मेरा मन खट्टा कर दिया

कहने लगी गृह लक्ष्मी को खुश

 रखोगे तो दीपावली पर मेरी कृपा

सहज ही पा जाओगे

और घर लिपाई पुताई लड़ बम पटाखा

मिठाई नए कपडे लतते के

खर्चे से बच जाओगे ऐसा सुनकर 

मेरा सपना टुट चुका था मन

 पतनी को खुश रखने की उधेडबुन मे लग चुका था


मनोज दुबे श्रीकांत होशंगाबाद

Monday, November 2, 2020

करवा चौथ

 

विषय करवा चौथ

विधा स्वैच्छिक 

दिनांक  २ ११ २०२०


करवा चोथ वृत


बड़ी जतन से  दिन भर किया उपवास मैने

खुद को  वस्त्र गहनो से सजाया सवारा मैने


मनाया गणेश को  शाम करके पूजन अर्चन

अरग  चांद को परछ  करक  से  दिया मैने


देखा मुखड़ा  मैने पिया का संग संग चंदा के

तिलक कर छू  के चरण  वर उनसे मांगा मैने


पानी से अघा गई नही  अघाई प्रेम से पति के

कहावत कहके  ऐक ऐक घूट पिया पानी मैने


रहू सदा सुहागन संगनी मै हर जन्म मे  तुम्हारी 

जन्म जन्मांतर  तक  साथ  तुम्हारा पाया  मैने


आरजू श्रीकांत की भी  रहो तुम ही जीवन साथी

किसी  युग युगांतर मे जो  मानव तन  पाया मैने

मनोज दुबे श्रीकांत

होशंगाबाद नर्मदा पुरम

व्यंग

 [12/9/2020, 11:56 AM] Manoj Dubey: आन लाईन कलास का पंगा  कल आन लाईन कलास मे  हमने कैमरा आन करने का  बोला कुछ छातरो का  मन भय से डोला  पंद्र...