16 – पिता जब तुम थे
पिता जब तुम थे
तब तक सही था
सब खामोश थे
तुम्हारे दबदबा में
किसी ने चूं तक
नहीं की थी
सब हाँ में हाँ
मिलाते थे आपकी
जो भी कहते थे आप
पिता जब तुम थे
तो हम निष्फिक्र थे
हम भान नहीं था
रीति रिवाज परंपरा का
जो थे
समाज में व्याप्त अपने
पिता जब तुम थे
तो
जमाना कितना
सस्ता था
बाजार से ले
आते थे
सब कुछ
मुट्ठी भर
पैसों में
खरीद कर
अपनी खुशियाँ
पिता जब तुम थे
तो रस था
त्योहारों में
उत्सव में
होली दशहरा
दीपावली सब
लगते थे
मन को अच्छे
क्योंकि नहीं होता था
कोई द्वेष विरोध
लोगों के मन में
और न ही
होती थी चिंता
पर्यावरण की
पिता जब तुम थे
तो लहलहाते थे
खेत
फसलों के
अन्न – धन से
भरे रहते थे
भंडार
बोरों से बंडा तक
टचाटच
नहीं होता था
अनाज का खालीपन
ओर टोटा
बोरों सा
बट जाता था
मजदूरों और समाज में
पिता जब तुम थे तो
घर चलता था
सरपट
दौड़ता पटरी
पर गृहस्थी की
बिना तू – तू मैं – मैं के
सब परिवार के
“वसुदैव कुटुम्बकम”
साथ का सन्देश देते
समाज के
और तुम
करते थे काम
मुखिया से
आगे होकर
घर के आंगन
का बरगद
होकर
पिता जब तुम थे
तो समय कब
निकल जाता था
घोड़ों पर
सवार
पता ही नहीं चलता था
मंजिलों का
वे कब मिल जाती थी
ईमानदारी की
मेहनत से
थोड़े ही परिश्रम से
पिता जब तुम थे
तो भान
नहीं था हमें
कुछ भी कर
लेते थे हम
बिंदास बेधड़क
हमें पता
होता था पीछे
आपका साथ
जो हमें
लड़ने की संभावनाओं
प्रबल बनाता था जीवन
की समस्याओं में
पिता जब तुम थे
तो मेहरबान
था मौसम
सर्दी – गर्मी – बरसात
का
बसंत का भी
जब खिलते थे
पुष्प लहलाते थे
श्वेत जिन पर
मंडराती थी तितलियों
के साथ
भौरें करते थे
गुंजन
घर की दीवारों
की चौखट
में बना कर घर
अपना
पिता जब तुम थे
तो कितना
आसान था
घर बनाना
चार दीवारी का
यही विश्वास था
कच्चे घर के
आँगन में
मिल जाती थी
खुशियाँ
अनायास ही
जीवन में
अपने में
कही थी
चुपके से
किसी भी बहाने से
पिता जब तुम थे
रिश्ते बनते थे
सहज ही काका
दादा - मामा
बुआ – फूफा
चाचा – चाची सबके
सब मिलते थे
छुपी ख़ुशी
मिलते मिलाते
बढ़ाते माधुर्य
परिवार में
कोई भी नहीं
होना चाहता था
अलग
अपने लोगों से
उन दिनों
पिता जब तुम थे
तो
दुरुस्त था सब
इम्युनिटी से
लेकर शरीर
तक बीमारियाँ
नहीं होती थी
कभी किसी को
सब रहते थे
स्वस्थ तंदरुस्त
घूमते खाते
सुबह की हवा
ब्रह्ममुहूर्त
में उठकर के
अपने घर के बाहर
पिता जब तुम थे
तो नहीं था
कोई बेईमान
और न ही
बेईमानी ज़माने
में सब
भक्त थे एकदूसरे
के कामों के
और क्लीयर
रखते थे
अपना – अपना
हिसाब जो
जड़ बनता था
झगड़े की
कभी - कभी
परिवार में
जब कभी भी
होता था बंटवारा
पिता जब तुम थे
तो नहीं थे
टेक्नोलॉजी के
कोई समान
सब मित्रवत
रहते थे
बतियाते चौपाल
चौक – चौराहों
गुमठियों पर
नहीं रहते थे
चौपाल खाली
जब हाथ भले
रहते थे
खाली
आजकल तो
हाथ में सबके
रहता है मोबाइल
और सबका मुंह
रहता है बंद
आज के ज़माने में
टुच टुचाते कीबोर्ड
हों या
सरकाते
स्क्रीन की टच को
अपने मोबाइल की
अपनी अँगुलियों
अनसुनी करते
बातों को अपनों
के बीच की
पिता जब तुम थे
तो
उपज आ
जाती थी
भरपूर
दानों में
फसलों की फली
में
मूंग – मटर – चना
मसूर
सोयाबीन सब
होते थे
और कटती थी
फसल
मनचाही
एवरेज से
लबरेज होकर
गाड़ी भर – भर कर
भूसा भी
गायों के लिए
आ जाती थी घर पर
और आज
ढूँढ़ते फिरते हैं
चारा
ट्रैक्टर ओर हार्वेस्टर
युग में
हम गाँव – गाँव
हम अपने गौधन के लिए
पिता जब तुम थे तो
थी गाय कई
ओर आठ जोड़ी
बैल
बंधते थे सार में
सुबह शाम लगता
था दूध
ग्लास भर भर
पीते थे सब
जब माँ
पकाती थी
कड़ाईया में
डालकर
दूध को
बनाती थी हरी
शाम को
खिलाती थी
कभी दूध – भात
जब आते थे
सब घर
के सदस्य
या
रूठ जाता था
मैं अपनी
जिद में
पिता जब तुम थे
नहीं थे
बनावटी रिश्ते
कोई नहीं हटता था
अपनी बात
से
सब के सब
बंधे थे एक
सूत्र में
रेशम के
धागे से
निभाने को
अपनी
रिश्तेदारी
निःस्वार्थ
बिना किसी
भेदभाव के
सींचते अपने
रिश्ते को
केवल एक
मुस्कुराहट
पर
झुकते देखते थे
हम दुश्मनों
को घुटने के बल पर
आत्मसमर्पण करते
पिता जब तुम थे
दो रिश्तों की
माधुर्यता छलकती थी
दोस्त और दोस्ती
की मिसाल थी
नहीं खोदते थे
दोस्त अपनों
के लिए गड्ढा
और न ही
आल्हादित होते थे
अपने मित्र की
बुराई पर
न ही जलते थे
सफलता पर
अपने मित्र की
आपके बाद
बदल गया
सब कुछ
कब पता नहीं चला
दबे पाँव
जैसे वक़्त
निकल गया
टिक – टिक करता
घड़ियों के काँटों में
पिता जब तुम थे
तो नहीं थे
मनोरंजन के ज्यादा साधन
कुछ श्वेत – श्याम फिल्मों
के साथ
नाटक – नौटंकी रासलीला
रामायण , रामसत्ता थे
जिनमें सीख थी
समाज को
एक दिशा देने की
मर्यादा से लेकर
अत्याचारों के
दमन की कहानियों
में
प्रमुख भूमिका
दिखाई देती थी रामराज्य
के राम की कल्पना में
तो श्री कृष्ण के
गीता के संदेशों में
कर्म की प्रधानता को
विध्वंश और सृजन
सब कुछ
दिख जाता था सहज ही
मौखिक केवल वृतांत से ही
समय गुजर जाता था
भाव भक्ति के साथ
कुछ नया करने को
परलोक के लिए
गाकर कुछ पद – चौपाई
दोहा सारे या पढ़कर श्लोक
पिता जब तुम थे
तो जमाना ही
अलग था
पता है मुझे
सब चलता था
नदी के प्रवाह सा
बहता कल - कल
निर्मल – निश्छल
प्रेम बरसाता
टिमटिमाता बूंदों
की बारिश सा
जगमगाता सितारों
सा
खिलता फूलों
सा
सुमनगंध
से महकाता
कोना – कोना
मन का
दूर कहीं से
मन की गहराईयों
में उतरकर
बनाता घर
आँगन को
रिश्ते की
मधुरता को
पहले से कल तक
और कल से आज तक
वैसे ही जैसे
तुम आते – जाते
थे कभी घर से
बाहर
और आते थे
लौटकर कभी
घर में
लेकर खुशियों
के लड्डू
और मुस्कानों
को
जो देती थी
हमें एहसास
सुखों के पलों
का
जब – जब
हम हार जाते
थे कभी
अपनी जिंदगी की
उन समस्याओं के
मकड़जाल में
तब आ
जाती थी
तुम्हारी
स्मृतियाँ
उबारने को
हमें बनकर
आशीर्वाद
करने को
कालजयी समय के फेर में
जीतकर गढ़ने को
अपना स्वर्णिम
भविष्य
मनोज दुबे श्रीकांत
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