अनंत पर सवार कावय संगृह से ली गई कविता
मेरा मन
धरा से उडकर मेरा मन कभी कभी
आसमान तक चला जाता है
वहा से फिर घूमने को जहा दोड़ आता है
ढूढ लाता मोती गहरे सागर से
खुशियो की सुमन गंध को फैला जाता है
मेरा मन मेरे मन की उसकी मुसकान हुआ जाता है
मेरा मन मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है
जाने कब उसके मन से
दिल के करीब पहुच जाता है
हाथ मे हाथ थाम थडकता
सासो का सपंदन हुआ जाता है
निहारता राहे कभी किसी पार्क या
किनारे दरिया के टिक टिक करता
समय सा निकल जाता है
मेरा मन मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है
मेरा मन पहुच जाता है
कभी कभी सज्जन के मन से दुर्जन के
पास प्रेम से विषाद की ओर मुड़ जाता है
ढूंढने को कुछ संबध की थाह
अपनो की मन की गहराईयो मे उतर जाता है
देखनो को संबध के कच्चे
धागो को खीचतान मचा कर मन मे
अजीब अंतर्द्वंद का मंथन मचा जाता है
मेरा मन मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है
कभी कभी निकल जाता घर गृहस्थी से
दूर ढूढने को वैराग्य की शांति प्रभु के
श्री चरणो से तीन लोक चोदह भुवन से
उनके धाम तक पहुच जाता है
करके अपना हिसाब मन से ही
मनगणत गणित मे उलझ कर रह जाता है
भव सागर मे खाता गोता विकारो का
वापस फिर जन्मकर बालक हुआ जाता है
मेरा मन मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है।
मेरा मन रखता गिदध सी
पैनी नजर देखने को मन की सबकी
पैमाना सा बदल बदल कर
आकलन करने को बातो बातो
मे उसकी मेरी सबकी तुमहारी
तो कभी रातो मे अखियो के सपनो से
दिवास्वप्न सा सपनो सा धरा पर धमक आता है
मेरा मन मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है
मनोज दुबे श्रीकांत
मेरा मन
धरा से उडकर मेरा मन कभी कभी
आसमान तक चला जाता है
वहा से फिर घूमने को जहा दोड़ आता है
ढूढ लाता मोती गहरे सागर से
खुशियो की सुमन गंध को फैला जाता है
मेरा मन मेरे मन की उसकी मुसकान हुआ जाता है
मेरा मन मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है
जाने कब उसके मन से
दिल के करीब पहुच जाता है
हाथ मे हाथ थाम थडकता
सासो का सपंदन हुआ जाता है
निहारता राहे कभी किसी पार्क या
किनारे दरिया के टिक टिक करता
समय सा निकल जाता है
मेरा मन मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है
मेरा मन पहुच जाता है
कभी कभी सज्जन के मन से दुर्जन के
पास प्रेम से विषाद की ओर मुड़ जाता है
ढूंढने को कुछ संबध की थाह
अपनो की मन की गहराईयो मे उतर जाता है
देखनो को संबध के कच्चे
धागो को खीचतान मचा कर मन मे
अजीब अंतर्द्वंद का मंथन मचा जाता है
मेरा मन मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है
कभी कभी निकल जाता घर गृहस्थी से
दूर ढूढने को वैराग्य की शांति प्रभु के
श्री चरणो से तीन लोक चोदह भुवन से
उनके धाम तक पहुच जाता है
करके अपना हिसाब मन से ही
मनगणत गणित मे उलझ कर रह जाता है
भव सागर मे खाता गोता विकारो का
वापस फिर जन्मकर बालक हुआ जाता है
मेरा मन मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है।
मेरा मन रखता गिदध सी
पैनी नजर देखने को मन की सबकी
पैमाना सा बदल बदल कर
आकलन करने को बातो बातो
मे उसकी मेरी सबकी तुमहारी
तो कभी रातो मे अखियो के सपनो से
दिवास्वप्न सा सपनो सा धरा पर धमक आता है
मेरा मन मन से कभी कभी अनंत मे घूम आता है
मनोज दुबे श्रीकांत
No comments:
Post a Comment