लघुकथा कपटी
मोहन सफेद धोती पीला कुर्ता पहने पीला गमझा कंधे पर डाले और माथे पर चंदन का तिलक और टोपी लगाकर जब घर से निकलता था तो रास्ते मे जो भी मिलते सबसे राधे राधे कहता जाता था बड़ा ही ही विनम्र स्वभाव से एकदम साधू पुरूष दिखाई देता था
मगर जब भी वह मंगो बाई के घर के सामने से गुजरता तो मंगो बाई का मुंह चालू हो जाता कपटी कुटिल बगला भगत मुह मै राम बगल मे छुरी बड़ा भगत बनता है हरामी नामाकूल नरक मे भी जगह नही मिलेगी सब समझता है भगवान तेरी भक्ति को मुआ मरे तेरी पुसते भोगेगी
मंगो के सामने वहभी चालू हो जाता बुढिया मरेगी सड सड कर के कोई पानी वाला भी नही मिलेगा जा पापिनी चांडालनी कुलटा न जाने क्या क्या
बहुत दिनो तक यही चलता रहा आखिर ऐक दिन ऐपिसोड होनै के बाद मै मंगो के पास गया अम्मा तुम ऐसा क्यों कहती हो अरे बेटा मेरे पति के पुरखो की जमीन जायदाद सोने चांदी के गहने लील गया मुझे झोपड़ी मे रहने को मजबूर कर दिया कुछ हजार रूपये का बयाज लेकर सब खतम कर दिया काका दादा की संपत्ति हडप कर गया और कयाबताऊ बेटा हर गरीब की प्रापरटी पर फन लगाए बैठा है कमबख्त भगत नही बगला भगत है कपटी
अम्माँ फिर चालू हो ग ई थी तो बंद होनै का नाम नही ले रही मै चुपचाप बैठा सोच रहा था यदि भगवान ऐसे भकतो का साथ देता है फली भूत सुख संपन्न करता है तो फिर लाचार अम्माँ जैसो का धयान रखने वाला भगवान कहा है...........
मनोज दुबे श्रीकांत
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