Tuesday, September 22, 2020

गजल

 हाथो मे हाथ जरा रहने दे


मेरे  हाथों में तेरा हाथ जरा रहने दे

 कुछ बाते मेरे मन की जरा कहने दे


 बैठू कुछ पल को तेरे सामने तो मैं

 मेरी आंखों  आंखों को जरा मिलने दे


 कुछ कह दूं मैं और कुछ कहते तू अपनी

 बातें   दिलो की गौर से जरा सुनने दे 


अभी अभी तो बैठी हो मेरे पास में तुम

 4:00 बज गए  है अभी जरा ढलने  दे


 सुहानी शाम से ढलती रात तक रुको तुम 

 बातें प्रेम की अपनी परवान जरा चढने दे


मोहबबते मेरी बिंदास है समझ ले श्रीकांत

कोई नयी कहानी अपनी भी जरा बनने दे 


मनोज दुबे श्रीकांत

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