Thursday, May 28, 2020

गज़ल


      मै चलूंगी प्रिय




आ जाऊंगी साथ तुम्हारे प्रिय
तुम जहा ले चलोगे मै चलूंगी प्रिय

सुख मिले या मिले दुख मुझे
तुम जैसा रखोगे मैं रहूंगी प्रिय

  हो कभी नादानियां मुझसे कहीं
माफ करना मुझे मैं चाहूंगी प्रिय

 कहोगे जो लगेगा उचित गर मुझे
 हर कहना  सदा मै मानूंगी प्रिय

 दिए जो वचन परिणय सूत्र मे
एक-एक कर मैं निभाऊंगी  प्रिय

ये वादा मेरा है तुमसे  ही सदा
छोड़ मझधार में मै  ना जाऊंगी प्रिय

  मिले साथ तुम्हारा मुझको ही सदा
बार बार में यही वर मै मागूंगी प्रिय

तुम  हो मेरे मन मीत से श्रीकांत
 कोई कविता  सी मै रहूंगी प्रिय

मनोज दुबे श्रीकांत 


Sunday, May 24, 2020

गजल

निपटा दिया उन्होने ऐसे



पहले उन्होने हमे बातो से निपटा दिया
बनी न बात तो फिर हाथो से निपटा दिया

फिर प्रेम करने की दी ऐसी सजा उनने
अपनी लडकी से विवाह करके निपटा दिया

फिर निपटे हम अपने आप से ही जेसे तैसे
बड़े होने पर  फीर बच्चो ने निपटा दिया

निपटते रहे घर समाज जमाने के तानो से
कुछ निपटे प्रेम से कुछ गुस्से ने निपटा दिया

निपटने का सिलसिला रूका नहीं श्रीकात अपना
कभी लोगो ने आधा तो कभी पूरा निपटा दिया

मनोज दुबे श्रीकांत

निपटाना का तात्पर्य अपने काम से विरोधियों को पस्त करना

गजल

            निपटा दिया उन्होने ऐसे

   



पहले उन्होने हमे बातो से निपटा दिया
बनी न बात तो फिर हाथो से निपटा दिया

फिर प्रेम करने की दी ऐसी सजा उनने
अपनी लडकी से विवाह करके निपटा दिया

फिर निपटे हम अपने आप से ही जेसे तैसे
बड़े होने पर  फीर बच्चो ने निपटा दिया

निपटते रहे घर समाज जमाने के तानो से
कुछ निपटे प्रेम से कुछ गुस्से ने निपटा दिया


निपटने का सिलसिला रूका ना श्रीकात अपना
कभी लोगो ने आधा तो कभी पूरा निपटा दिया

मनोज दुबे श्रीकांत

Wednesday, May 20, 2020

कविता

लाकडाउन मे रियायत है क्या



लाक डाउन में तुम घर में पड़े रहे
खा खाकर दुश्मन अनाज  के होते रहे

 अब प्रीतम अपने काम पर लग जाओ
   लाक डाउन हटा  बाजार फिर से  खुल रहे

 अब  सोओ तुम देर तक सुबह नो बजे तक
बॉस  रास्ता तुम्हारी आफिस मे देख रहे

चाय नाश्ता भोजन सब कुछ दिया मैन
अब तुम्हारे दिन आराम के लद रहे

चाय पान  चौराहे के मित्र बेचैन मिलने को
 सब्जी राशन के झोले  टंगने हाथ  बेताब हो रहे

 खिल खिलाकर  यू बोली  सखी से पत्नी सबकी
गुईया  बड़े दिन बाद  आज ये काम पर जा रहे

सब की पत्नियों ने  ली  सांस सुकून की श्रीकांत
 बड़बड़ाते खिजियाते घर अब शांत हो रहे

मनोज दुबे श्रीकांत

Monday, May 18, 2020

गजल


मिल कही पर
चल कही पर

एक बार आ
तू कही पर

मिल फुर्सत से
फिर वही पर

मै आऊंगा
तेरे घर पर

मिलेगा श्रीकांत
चाहे कही पर

Sunday, May 17, 2020

गजल


             शुक्र है परिवार का

हम खामखा श्रीमती को बदनाम करते रहे
 जमाने के सामने खुद बेईमान होते रहे

 रिश्ते की अहमियत को समझा लाक डाउन में
 जिंदगी भर अपने घर में मेहमान होते रहे

 करती रही जी हजूरी हमारी आई जब से 
कुछ  उसके भी अधूरे अरमान  होते रहे

 समझ मे  आया परिवार कोरोना  काल में
 परिवार के सदस्य अपने कदरदान होते रहे 

कर लेते थे ना नुकुर पहले श्रीकांत उनसे 
अब उनकी खिदमत पर मेहरबान होते रहे

मनोज दुबे श्रीकांत 

Saturday, May 16, 2020

कविता









     लाकडाउन के बाद शहर घूमकर आऊंगा
     



देख लूंगा अपने शहर को आज फिर मन भर के
खुलेगा लाक डाउन तो फिर मै घूमने जाऊंगा
 गली मोहल्ला  रोड चौक चौराहा शहर का 
चप्पा चप्पा  तसल्ली से घूम कर आऊंगा देखूंगा

बहुत दिनो बाद नर्मदा जी मे कूद कूद कर नहाऊंगा
कोरोना की मुक्ती के लिए मनोती मांग आऊंगा
घंघरा फरिया पान प्रसादी चढ़कर के मा नर्मदा को
लाकडाउन के बाद साष्टांग प्रणाम करके आऊंगा


 शहर को अच्छे से घर से निकल कर पर्यटन घाट से
 होकर मोड़ चली चौक होता हुआ बाजार जाऊंगा
 होटल नाश्ते की केला  गुप्ता जी की खुली है या नहीं देखकर 
 अग्रवाल जी नाश्ता कर लाल सिंह जी की चाय पीने जाऊंगा

 घूमूगा  बाजार की एक एक दुकान  आज मै सारी 
चप्पल खरीदने अनिल और मनसा बूट हाउस जाऊंगा
 फिर खरीदूंगा भास्कर से कुछ कपड़े अपने और बच्चो के
पूछने को दाम फैशन हाउस और मंगलम जाऊंगा फिर

 लूंगा सब्जी मंडी से सब्जियां लेने को फल सत रस्ते जाऊंगा
लौटते मेंअपने स्कूल पंडित रामलाल शर्मा को देखूंगा कुछ प
एसएनजी गर्ल्स स्कूल की रोड से वापस घर आऊंगा शाम को घूमने बस स्टैंड से होता हुआ रामजी बाबा की समाधि जाऊंगा

 फिर निकालूँगा  रैलवै स्टेशन के लिए वहां से सुसताकर
 बैठ कर ट्रेन की छुक छुक आवाज सुनकर  वापस आऊंगा
फिर खरीद लूंगा कुछ टोस बिस्किट ब्रेड सुंदरम गोवर्धन बेकरी से घमंडी लस्सी पर फ्रूट जूस और लस्सी पी कर आऊंगा

फिर शाम को मंदिर में काले महादेव खेड़ापति के मत्था टेक सेठानी घाट से फिर  बांके बिहारी राधा वल्लभ मंदिर जाऊंगा
रुकूंगा दो पल को पंडित जी की छोला टिकिया के पास अग्रवाल पुरी भंडार के सेव लेकर फुलकी खाऊंगा

 रात का खाना खाऊंगा बैठकर तसल्ली से परिवार के साथ
 देर रात फिर पर्यटन  घाट की रोड पर टहलने जाऊंगा
सच बेखौफ घूमूगा दिन भरबिना डरे कोरोना ओर पुलिस से
देर रात रामायण  महादेव देख कर फिर सोने जाऊंगा


मनोज दुबे 

Friday, May 15, 2020

गजल

तुम्हारे सिवाय कोई ओर नही





तुम्हारे सिवाय   कोई और नही
तुम्हारे से अनुपम कोई और नही

आता हूं जब भी पास ही तुम्हारे
तुम्हारे से अलग  कोई ठौर नही

जानते हो तुम कोन हो मेरे लिए
अनमोल तुमसे कोई और नही

कह लेता हूँ मन भर के तुमसे ही
ओर किसी पर कोई जोर नही

दे दे बस खुशी के दो पल श्रीकांत
मांगता हूँ थोड़ा तुमसे कोई मोर नही








Thursday, May 14, 2020

गजल

उसका तो हीरो था मै



सबको नापसंद था तो क्या
उसको तो पसंद था मै

औरो की नजरो मे रहू विलेन
उसका तो हीरो न 1 था मै

कोई ढूँढता रहे बुराई मुझमे
उसका तो आदर्श था मै

लंफटू आवारा टपोरी सबके लिए
उसका तो आशिक था मै

कहता था जमाना फिसड्डी भले
उसका तो नंबर 1 था मै

भला बुरा जैसा भी था श्रीकांत
 उसके प्रेम का पुजारी तो था मै

मनोज दुबे श्रीकांत

Wednesday, May 13, 2020

गजल

उड़ाना चाहते है अब मुझको



टहनियां काटने को आतुर है लोग
शाख से उड़ाने को आतुर है लोग

बना ले न आशियाना हम पक्का
 मारने  को पत्थर आतुर है लोग

गिराने को खींचते है टांग मेरी अक्सर
खोदने को  गड्ढा  आतुर हैं लोग

गुजारता हूँ रात जैसे तेसे शाख पर अपनी
भगाने को  कल भोर मे आतुर हैं लोग

बचोगे कहा तक श्रीकांत तुम अपनो से
आस्तीन के साप बनने को आतुर है लोग

मनोज दुबे श्रीकांत

Sunday, May 10, 2020

गजल

ताश के पत्ते सा मै

कभी थे बादशाह  घर के हम
आई बेगम तो गुलाम हो गए

गृहस्थी के कामकाज मे लग
 किसी तुरुप के इक्के हो गए

नहला पर दहला मारते रहे लोग
 पंजा छक्का से बेकार हो गए

उतार-चढ़ाव में जिंदगी के अक्सर
 बाजार मे सट्टा अटठा के भाव गए

 दिया नहीं किसी ने मान तो हम
अपमान से दुक्की  तिक्की  हो गए

होते रहे  कभी अंदर कभी बाहर
जुए की फड़ के जो दाव हो गए

करने को टाईम पास बेकारी मे
 पत्ते लाल काले पान ईट चूड़ी हो गए

मनोरंजन करने को लोगो के लिए
देहला बेगम पकड़ गुलाम चोर हो गए

पिसते रहे श्रीकांत जिंदगी के गेम मे
ताश की गड्डी के जो बावन पत्ते हो गए

         मनोज दुबे श्रीकांत

Saturday, May 9, 2020

कविता







                          बिंदास बेधड़क जी न्यूज
                   


               नही थमेगा नही रुकेगा जी न्यूज
               आगे और  ही आगे बढ़ेगा जी नयूज

               दिखाएगा सच को हमेशा की तरह ही
             झूठ का पर्दाफाश करेगा जी न्यूज

              खोलकर  के सबकी ढोल की पोल को
              असलियत  सामने लायेगा जी न्यूज

             धर्म निरपेक्षता के पहने जो मुखौटे
             उन सबको बेनकाब करेगा जी न्यूज

            दम खम से निडर हो दिखाता है खबर
             किसी की धमकियों से नही डरेगा जी न्यूज

             मुद्दा कोई  भी हो ज्वलंत  वर्तमान का
             बोलने मे कभी नही चूकेगा जी न्यूज
         
             बात सामाजिक राजनेतिक या देश हित की
           डी एन ताल ढोककर मे बोलेगा जी न्यूज

           सेकते है जो रोटी राजनीति की अपनी
           दाल उनकी कभी न  गलने देगा जी न्यूज

             आवारड वापसी हो या टुकड़े टुकड़े गैंग
              उन  सबकी बोलती बंद करेगा जी न्यूज

               हिंदुस्तान मे हिंदुस्तानियों की आवाज
                 फिर से देश मे बुलंद करेगा जी न्यूज

             बिंदास बेधड़क जन जन की आवाज श्रीकांत
            हर एक को सुधीर चोधरी  बनाएगा जी न्यूज


                             मनोज दुबे श्रीकांत





Sunday, May 3, 2020

कविता


लाक डाउन ने सिखा दिया

न मिले  कार बस रेल गाड़ी हवाई जहाज
 बिना घोड़े गाड़ी आटो रिक्शा के रह सकते है

न मिले ब्रेड टोस्ट बिस्किट क्रीम रोल
 बिना पिज्जा बर्गर  हाट डाग के रह सकते है

न मिले आइसक्रीम कोल्ड ड्रिंक फ्रूट जूस
बिना लस्सी श्रीखंड दही के रह सकते

न मिले समोसा कचोरी जलेबी आलूगोंडा
बिना नमकीन बर्फी के रह सकते है

न मिले रसगुल्ला गुलाब जामुन चम चम
बिना जलेबी इमरती रसमलाई के रह सकते है

न मिले इडली डोसा सांभर बड़ा खमण
बिना  खस्ता चाट फुल्की  के रह सकते है

न मिले जरदा पान सुपारी गुटखा खैनी
बिना सिगरेट बीडी  हुक्का के रह सकते है

न मिले पीने को  विलायती दारू या कच्ची
बिना वियर विस्की ब्रांडी के रह सकते है

न मिले  महंगे कोट सूट शूट पेंट शर्ट
बिना टाई बेल्ट जूतों के  रह सकते है

न मिले महंगी साड़ी  कपड़े और ज्वेलरी
बिना पाऊडर  मेक अप के रह सकते

न मिले दोस्त अजीज अपने या और कोई
बिना  हाँके लम्बी गपासटिक के रह सकते

न मिले घूमने को इधर उधर गली मोहल्ला
बिना तफरी के अपने घर मे रह सकते है

न मिले रिश्तेदार पडोस के लोग रोज रोज
बिना इनके परिवार के साथ रह सकते है

न मिले मेहनताना रूजगारी लाकडाउन की
बिना तनखा पगार के कडके  रह सकते है

न करे खर्चा अपना रुपया फालतू कामो मे
बिना शोक के अपन फकीरी मे रह सकते है

सिखा दिया लाक डाउन ने श्रीकांत अबकी
बिना राज सी ठाठ के साधारण रह सकते है

मनोज दुबे श्रीकांत

Friday, May 1, 2020

कविता

                 दरोड़ो के नाम
             

       

 बहुत दिनों से नहीं मिली दर्शन हो
तरस रहे हैं हम तो घूंट पीने को

 चढ़ाते थे बॉटल पर बॉटल उन दिनों
अब मिल भी नहीं रही चखने को

शौक था पीने को बियर व्हिस्की जिन रम
 तरस गए हैं अब देखने भी कच्ची को

 देखता हूं खाली गिलास बार-बार अपना
भूल गया उस्ताद साकी और पैमाने को

लॉक डाउन में ड्राई डे चल रहा ये कैसा
मजबूर. है सेनीटाइजर को सूंघने को

चलना डगमगा कर रोड पर  बोलना अर बर
जा रहा है दरोड़ा तरस रहे  सुनने को

 सोचा ना था यह दिन भी आएंगे श्रीकांत
 मिलेगी बस दवा और तरसेंगे हम  दारु को

मनोज दुबे श्रीकांत

गज़ल


                        डर डंडे से नही लगता बाबूजी




 अब  डर डंडे से नही मार से लगता है बाबू जी
   डर भीख से नही भूख से लगता है बाबू जी

  लाक डाउन मे बंद पड़े है घर महीने भर से
   डर पुलिस से नही घरवाली से लगता है बाबू जी

    इलाज कितना ही हो जाए बीमारी का कोई
 डर कोरोना से नही कवारैंटाईन से लगता है बाबू जी

 करने को कर दे इलाज किसी का भी डाक्टर
डर स्क्रीनिंग से नही हमलों से लगता है बाबू जी

कोरोना की लड़ाई लड़ ले सब हिलमिल कर श्रीकांत
डर धर्म से नही हिंदु मुस्लिम करने से लगता है बाबू जी

मनोज दुबे श्रीकांत





 


व्यंग

 [12/9/2020, 11:56 AM] Manoj Dubey: आन लाईन कलास का पंगा  कल आन लाईन कलास मे  हमने कैमरा आन करने का  बोला कुछ छातरो का  मन भय से डोला  पंद्र...