मै चलूंगी प्रिय
आ जाऊंगी साथ तुम्हारे प्रिय
तुम जहा ले चलोगे मै चलूंगी प्रिय
सुख मिले या मिले दुख मुझे
तुम जैसा रखोगे मैं रहूंगी प्रिय
हो कभी नादानियां मुझसे कहीं
माफ करना मुझे मैं चाहूंगी प्रिय
कहोगे जो लगेगा उचित गर मुझे
हर कहना सदा मै मानूंगी प्रिय
दिए जो वचन परिणय सूत्र मे
एक-एक कर मैं निभाऊंगी प्रिय
ये वादा मेरा है तुमसे ही सदा
छोड़ मझधार में मै ना जाऊंगी प्रिय
मिले साथ तुम्हारा मुझको ही सदा
बार बार में यही वर मै मागूंगी प्रिय
तुम हो मेरे मन मीत से श्रीकांत
कोई कविता सी मै रहूंगी प्रिय
मनोज दुबे श्रीकांत

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