Sunday, May 17, 2020

गजल


             शुक्र है परिवार का

हम खामखा श्रीमती को बदनाम करते रहे
 जमाने के सामने खुद बेईमान होते रहे

 रिश्ते की अहमियत को समझा लाक डाउन में
 जिंदगी भर अपने घर में मेहमान होते रहे

 करती रही जी हजूरी हमारी आई जब से 
कुछ  उसके भी अधूरे अरमान  होते रहे

 समझ मे  आया परिवार कोरोना  काल में
 परिवार के सदस्य अपने कदरदान होते रहे 

कर लेते थे ना नुकुर पहले श्रीकांत उनसे 
अब उनकी खिदमत पर मेहरबान होते रहे

मनोज दुबे श्रीकांत 

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