दो जून की बात
मिलती नही है रोटी अब दो जून की
दिखती रोटी जो तस्वीर मून की
साक सब्जी दाल कहा मजदूरी मे
पुडिया भी नही तेल मिर्च नून की
मेहनत हाड़ तोड़ती थका देती है रोज
पसीना की बूंद जो बह जाती खून की
मैले कुचले वस्त्र मे दुत्कार देते लोग
मागने को देते नही दो मूठी चून की
थकने को थका देती है बहुत श्रीकांत
बात जब जब भी होती है दो जून की
मनोज दुबे श्रीकांत
मिलती नही है रोटी अब दो जून की
दिखती रोटी जो तस्वीर मून की
साक सब्जी दाल कहा मजदूरी मे
पुडिया भी नही तेल मिर्च नून की
मेहनत हाड़ तोड़ती थका देती है रोज
पसीना की बूंद जो बह जाती खून की
मैले कुचले वस्त्र मे दुत्कार देते लोग
मागने को देते नही दो मूठी चून की
थकने को थका देती है बहुत श्रीकांत
बात जब जब भी होती है दो जून की
मनोज दुबे श्रीकांत

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