गुस्सैल गजल
पास मेरे आई ऐसे भनभना के
जैसे बदरा हो कोई घनघना के
चला दिए कई शब्दो के बाण उसने
आई हो जैसे कि पास मन बना के
आई लाल मरचा सी बनके उस दिन
मेरे सामने ऐसे कि तमतमा के
मार देती दो चार छापड तो क्या
बात करती रही दिन मे दनदना के
ऐसा रुप देखकर उसका भैया
रह गया मै अटपटा सनसना के
बैठा रहा श्रीकांत दिन भर चुपचाप
गृहस्थी से अपनी अब अनबना के
मनोज दुबे श्रीकांत
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