Friday, May 1, 2020

कविता

                 दरोड़ो के नाम
             

       

 बहुत दिनों से नहीं मिली दर्शन हो
तरस रहे हैं हम तो घूंट पीने को

 चढ़ाते थे बॉटल पर बॉटल उन दिनों
अब मिल भी नहीं रही चखने को

शौक था पीने को बियर व्हिस्की जिन रम
 तरस गए हैं अब देखने भी कच्ची को

 देखता हूं खाली गिलास बार-बार अपना
भूल गया उस्ताद साकी और पैमाने को

लॉक डाउन में ड्राई डे चल रहा ये कैसा
मजबूर. है सेनीटाइजर को सूंघने को

चलना डगमगा कर रोड पर  बोलना अर बर
जा रहा है दरोड़ा तरस रहे  सुनने को

 सोचा ना था यह दिन भी आएंगे श्रीकांत
 मिलेगी बस दवा और तरसेंगे हम  दारु को

मनोज दुबे श्रीकांत

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