करवा चौथ के बाद
कल के वृत के बाद पत्नी
ऐसी बरसी
जो लगी कही बिजली कडकी
कल का प्यार गुस्सा बन बरस रहा था
और मै मन ही मन अपनी
गलती खोज रहा था
उसकी कल की आवभगत
की बात मेरे पहले ही गले
नही ऊतर रही थी करवा चौथ
की न जाने कोन सी गलती
आज भारी पड रही थी
सोच रहा था
रात नौ बजे तक के हर ऐक
काम लिस्ट के अनुसार किए थे
जो जो काम कहे थे
एक एक सब किए थे
साड़ी के साथ गिफ्ट मिठाई भी
लाना नही भूला था फिर भी पत्नी
का मुह आज गुस्से से क्यो फूला था
कल के स्वादिष्ट भोजन पकवान
और ढेर सारे प्रेम की
बाते हवा हो रही थी
पत्नी न जाने कौन सी बात पर
आग बबूला हो रही थी आज
तो जनाब बमुश्किल ही
चाय मिल पाई है रोटी
सबजी न जाने कब
कहा नसीब पाई है कल की
सरलता सहजता की
शांति मेरी गृहस्थी को भारी
पड़ रही थी और भाई साहब
मेरी गृहस्थी करवा चौथ के बाद
के तुफान से गुजर रही थी
मनोज दुबे श्रीकांत
No comments:
Post a Comment