Thursday, November 19, 2020

व्यंग

 करवा चौथ के बाद 


कल के वृत  के बाद पत्नी

 ऐसी बरसी

जो लगी कही बिजली कडकी

कल का प्यार गुस्सा बन बरस रहा था

और मै मन ही मन अपनी

गलती खोज रहा था

उसकी कल  की आवभगत

की बात मेरे पहले ही गले

 नही ऊतर रही थी करवा चौथ

की न जाने कोन सी गलती

आज भारी पड रही थी

सोच रहा था

रात नौ बजे तक के हर ऐक

काम लिस्ट के अनुसार किए  थे

जो जो काम कहे थे

एक एक सब किए  थे

  साड़ी के साथ गिफ्ट मिठाई भी

लाना नही भूला था फिर भी पत्नी

 का मुह आज गुस्से से  क्यो फूला था

कल के स्वादिष्ट भोजन पकवान

और ढेर सारे प्रेम की

बाते हवा हो रही थी

पत्नी न जाने कौन सी बात पर

आग बबूला हो रही थी आज

 तो जनाब बमुश्किल ही

चाय मिल पाई है रोटी

सबजी  न जाने कब

कहा नसीब पाई है कल की

 सरलता सहजता  की

शांति मेरी गृहस्थी को भारी

पड़ रही थी और भाई साहब

मेरी गृहस्थी करवा चौथ के बाद

 के तुफान से गुजर  रही थी


मनोज दुबे श्रीकांत

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