गजल
काम के नाम परिवार का हिस्सा हूँ
निकला तो डस्टबिन का डब्बा हूँ
हिंदी की कोई किताब का
अधूरी कहानी का किस्सा हूँ
इसी बात को लेकर अनबन सी
तुम्हारे व्यवहार से गुस्सा हूँ
मजबूरी में अक्सर तुम्हारे साथ
गेहूँ संग घुन सा पिसता हूँ
बनाने को स्वाद को मिला लेते हो
चाट की दुकान का जो खस्ता हूं
मजबूर लाचार जिंदगी में श्रीकांत
जटिल समस्याओं का बस्ता हूँ
मनोज दुबे
काम के नाम परिवार का हिस्सा हूँ
निकला तो डस्टबिन का डब्बा हूँ
हिंदी की कोई किताब का
अधूरी कहानी का किस्सा हूँ
इसी बात को लेकर अनबन सी
तुम्हारे व्यवहार से गुस्सा हूँ
मजबूरी में अक्सर तुम्हारे साथ
गेहूँ संग घुन सा पिसता हूँ
बनाने को स्वाद को मिला लेते हो
चाट की दुकान का जो खस्ता हूं
मजबूर लाचार जिंदगी में श्रीकांत
जटिल समस्याओं का बस्ता हूँ
मनोज दुबे

No comments:
Post a Comment