Tuesday, June 30, 2020

गजल


                            पत्नी जब घर आएगी
       

         बहुत दिनो बाद पत्नी मायके से फिर आएगी
         बड़बड़ाते हुए मेरा  सारा घर फिर  जमाएगी

       मै घर मे न रहू  तो तुमहारा काम न चले बिलकुल
          नोकरानी हू क्या घर  इस की फिर  फरमाएगी

         निकालेगी कचरा घर के  कोने कोने का झाड़ू से
        मैले कपड़ो  धोकर  घड़ी करके   फिर जमाएगी

        अलमारी अस्त व्यस्त बिखरी बिखरी देखकर के
       बच्चो के साथ साथ मुझ पर फिर  बिफराएगी

         फिर जाकर किचिन देखेगी क्या है या नही
     राशन की लिस्ट सब्जी का झोला फिर  थमाएगी

      बनाकर गरमा गरम रोटी सबजी और  दाल चावल
     खाना खा लो जी आज  किचिन से फिर  चिल्लाएगी

        सच पूछो तो श्रीकांत उसके मायके से आने पर
         शात से घर आंगन मे  रौनक  फिर  बरसाएगी


                            मनोज दुबे श्रीकांत



Monday, June 29, 2020

लघु कथा

लघु कथा
आन लाईन कलास
गाव मे बहुत दिनो से विदयालय नही खुले थे
रवि चिंतित उसके पुराने बस्ते की किताब काफी पेंसिल को निकालकर बार बार देख रहा था तो कभी अपनी टूटी सलेट मे से झाकते कह रहा था बाबू जी पटेल साहब की बिटिया कल हमारे साथ खेल रही थी तो उसकी मम्मी चिल्लाते हुए कह रही थी सोनू आन लाईन  कलास जवाईन नही करनी देर हो रही है बाबू जी ये आन लाईन कलास कया होती बाबू जी मूक थे और सोच रहे थे काश उनके पास भी एक ऐंडराईड मोबाइल होता तो रवि भी पटेल साहब की सोनू जैसा आन लाईन पढता
मनोज दुबे श्रीकांत


मुक्तक

राष्ट्र नमन

हम युद्ध को नही अमन चैन चाहते
 ये न समझना कि लडना नही जानते
निकाल कर रख देते है हम हेकड़ी सारी
आखो मे आख डाल कर जब बात करते

रखते है दिल हाथो पर अपने दोस्त की खातिर
रखते हैं जान हथेली पर  दुश्मनों के खातिर
घोपता है  छुरा  जो पीठ  मे लगाकर गले
माफ करते नही गददार जो दोस्त हो शातिर

 हम करे  सुरक्षा सीमा की तुम अपनी की करो
करने को कब्जा की  मनशा दूर ही करो
इंच इंच फुट फुट नाप लेंगे हम  कदमों से
चीन   तु हमारे  दम को   देखा न करो

मनोज कुमार दुबे श्रीकांत

Saturday, June 6, 2020

कविता




                मोबाइल पर झगड़ते बच्चे
मोबाइल पर झगड़ते बच्चे
एक दूसरे से छुड़ाते बच्चे
चिल्लाते जम जम कर के
एक दूसरे पर झल्लाते बच्चे

मम्मी को चुप कराते बच्चे
अपनी बात सुनाते बच्चे
डांटने पर पापा के अक्सर
गुस्सा अपना जताते बच्चे

वाटस अप फेस बुक देखते
इंस्टा टिकटाक चलाते बच्चे
जीतने को मोबाइल गेम मे
अपनी आखें गडाते बच्चे

घर के  अंदर अंदर रहते बच्चे
दीवाल से गर्दन टिकाते बच्चे
बार बार देखते मोबाइल अपना
लाईक कमेंट के कायल बच्चे

अपने  अब कैसे होते बच्चे
सच्चे सच्चे से झूठे बच्चे
अपनी बात मनवाने को
अक्सर जिद्दी होते बच्चे


घर मे  अकेले खेलते बच्चे
बाहर नही निकलते बच्चे
दुबले पतले वजन बढाते
टेंशन मे डूबे लगते बच्चे

मोबाईल अपना देखते बच्चे
पाठ याद न करते बच्चे
मा बाप सर की न सुनते
अपनी अपनी धकाते बच्चे

परिवार मे चुपचाप रहते बच्चे
मोबाईल पर चेट करते बचचे
समाज परिवेश से रहकर दूर
डिजिटल वर्ल्ड से होते बच्चे

गुमसुम गुमसुम से रहते बच्चे
दिखते हरपल व्यस्त से बच्चे
मोबाइल की दुनिया मे डूबकर
संस्कारो  से  दूर होते बच्चे

धार्मिक न सामाजिक बच्चे
आज्ञाकारी रहे न बच्चे
इंटर्नेट के अंधे युग मे
सब कुछ ताक मे रखते बच्चे



मनोज दुबे श्रीकांत


Monday, June 1, 2020

गज़ल

                      दो जून की बात




           मिलती नही है रोटी अब दो जून की
              दिखती रोटी जो तस्वीर मून की

               साक सब्जी दाल कहा  मजदूरी मे
                पुडिया भी नही तेल मिर्च नून की
 
             मेहनत हाड़ तोड़ती थका देती है रोज
             पसीना की बूंद जो बह जाती खून की

                मैले कुचले वस्त्र मे दुत्कार देते लोग
               मागने को देते नही  दो मूठी चून की


               थकने को थका देती है बहुत श्रीकांत
               बात जब जब  भी होती है दो जून की

                  मनोज दुबे श्रीकांत

व्यंग

 [12/9/2020, 11:56 AM] Manoj Dubey: आन लाईन कलास का पंगा  कल आन लाईन कलास मे  हमने कैमरा आन करने का  बोला कुछ छातरो का  मन भय से डोला  पंद्र...