मैं हूं एक का पौधा नन्हा मुन्ना सा भाई साहबआं
0गन में उगता या गमलों में तुम्हारे बच्चों सा भाई साहब
न करता हूं जिद कभी अपने मन की होने पर
ना मांगता हूं टॉफी बिस्किट मेगी पिज्जा भाई साहब
ऊगता हूं गमले में या फिर कच्चे आंगन में
देने को फूल दो या छांव सुख की भाई साहब
कोई देखता है मुझे प्रेम से सींचता लगाता है
कोई हीन दृष्टि से देख जलता है मन मे भाई साहब
मैं हाथ जोड़कर करना चाहता हूं बस विनती
रह रहा हूं किसी कोने में तो मुझे पढ़ने दो भाई साहब
नहीं काम का तो शुद्ध वायु करूंगा
फुलो सी घर मे मुस्कान बिखेर जाउगा भाई साहब
रहा काम का तो फूल के साथ फल दे जाऊंगा
या आराधना को ईस को दो फूल दे जाऊंगा भाई साहब
सूखकर झंकड हो ही गया आंगन के कोने में तो
मर कर भी तापने को आग काष्ठ भाई साहब
पालकर कीट पतंगो को तितलियों को रंग बिरंगी छटा दिखा करके बच्चों को खुशियां अपार दे जाऊंगा भाई साहब
चिड़ियों की चहचहाहट और कोयल की कूक मीठी कभी कभी हुआ पौधे से पेड तो सुना जाऊंगा भाई साहब
पलने दो बढने दो मुझे पोधे से वृक्ष तो होने दो आगन का
बुढापे मे आपके बहुत का मै आऊंगा भाई साहब
मनोज दुबे श्रीकांत
होशंगाबाद म प्र
होऊंगा पौधा बेल या रात रानी तुम्हारे आंगन का जब कभी
खुशबुओं से घर मोहलले को महका जाऊंगा भाई साहब
और हुआ गर बड़ा फलदार वृक्ष तो फल फ्रूट से घर भर ताकत सो गुना दे हर एक को फफल की दे जाऊंगा भाई साहब
उम्मीद है आपसे देखरेख बस थोड़े से जल की उससे क ई गुना आक्सीजन दे वातावरण शुद्ध कर जाऊगा भाई साहब
दे जाऊंगा एक ऐसी याद जीवन मे अपने होने की
प्रकृति से तुम्हारी एक मुलाकात करवा जाऊगा भाई साहब