Friday, January 18, 2019

गजल

तुम ऐसी तो न थी

तुम ऐसी तो नही थी जैसे पहले दिखती थी
मेरे मन मंदिर में तुम कोई मूरत सी बस्ती थी

आजकल हो जाती हो जाने क्यो पलाश सी
कभी लाजवंती बन नजाकत से झुकती थी

कभी महकती थी बन मधु मालती मधुकामनी सी
जाने क्यो कभी मेथी और मिर्ची सी लगती थी

हल्दी कुम कुम सुहाग मंगल सूत्र की मिन्नत सी
तपस्या मे रत  कभी कभी साध्वी सी लगती थी

दिखा देती हो रास्ता कभी कभी वैराग्य का
 अप्सरा मेनका और कभी रंभा सी लगती थी

 लगती थी देखने मे जन्नत की कोई हूर सी कल
बातो मे जाने क्यो अटपटी अटपटी सी लगती थी

क्या करे देख ये परिवर्तन तुम्हारे श्रीकांत आज
गृह लक्ष्मी से पहले  कोई प्रेमिका सी तुम लगती थी

मनोज दुबे श्रीकांत

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