Sunday, January 20, 2019

गजल

पुरानी किताब सी तुम 

बात तुम जब भी मुस्कुराकर करती हो
कुछ कुछ अजब गजब सी लगती हो
करीने से सजी एल्बम की तस्वीरों सी 
कालेज  की कोई लडकी  सी लगती हो
कालेज के मैदान का पुराना पेड सा मै 
 तुम पेड के नीचे टिपटी सी लगती हो
बिखरते हैं जहा से प्रेम के रंग आज तक 
बसंत की बसंती सरसो सी लगती हो 
वनस्पति की कक्षा की वो खिडकिया 
बाटनी की किताब सी  तुम लगती हो 
गुजरते कालखंड ने बदल डाला सब 
कोई परिक्षा के परिणाम सी लगती हो 
उलट लेता है पन्ना श्रीकांत कभी कभी 
जिदगी की पुरानी किताब सी लगती हो 
मनोज दुबे श्रीकांत 




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