एक पिता की सोच
जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे
मेरे सिर और कंधे और ऊचे होने लगे हैं
जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे हैं
अरमान फिर आखो में नए नए गढने लगे
ओर पंख मेरे सपनो को फिर लगने लगे हैं
कपडे़ मेरे नए से पुराने से होने लगे हैं
जूतो को नए पेर रास्ते मिलने लगे हैं
कालर के करीने अब और सजने लगे हैं
जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे हैं
दिन फिक्र के अब यू ही गुजरने लगे हैं
जो आम नीम मेरे आगन बढने लगे हैं
सहारा उन हाथो को मिलनै लगा आज
हाथ जो मेरे आजकल कापने से लगे है
दिन जाने अब. कहा बीत जाने लगे हैं
शहर मोहल्ला अब आगन होने लगे हैं
दिन मेरे बचपन के फिर लोटने लगे हैं
जिस दिन से मेरे बच्चे बडे होने लगे हैं
घडि़यों के काटे आजकल थमने लगे हैं
दिन एलबमो से तस्वीर मे उकरने लगे हैं
बैठता हूं दहलान के पलंग पर जब भी
सुख दुख फिर बूढे़ बरगद से होने लगे हैं
हाल जानने को मेरे चक्कर लगने लगे हैं
दिन चिंता के मेरे अब उसके लगने लगे हैं
तलाशता रहता हूँ खुद को अब उनमे ही मै
जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे हैं
मनोज दुबे श्रीकांत
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