Tuesday, January 15, 2019

Kavita

एक पिता की सोच

जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे

मेरे सिर और कंधे और ऊचे  होने लगे हैं
जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े  होने लगे हैं
अरमान फिर आखो में नए नए गढने लगे
 ओर पंख मेरे सपनो को फिर लगने लगे हैं

कपडे़ मेरे नए से पुराने  से होने लगे हैं
जूतो को नए  पेर  रास्ते मिलने लगे हैं
कालर के करीने अब और सजने लगे हैं 
 जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे हैं 

दिन फिक्र के अब यू ही गुजरने लगे हैं
 जो आम नीम मेरे आगन बढने लगे हैं
सहारा उन हाथो को मिलनै लगा आज
 हाथ जो  मेरे आजकल कापने से लगे है

दिन  जाने अब. कहा बीत जाने लगे हैं
शहर मोहल्ला अब आगन होने लगे हैं
दिन मेरे बचपन के फिर लोटने लगे हैं 
जिस दिन से मेरे बच्चे बडे होने लगे हैं

घडि़यों के काटे आजकल थमने लगे हैं
दिन एलबमो से तस्वीर मे उकरने लगे हैं
बैठता हूं दहलान के पलंग पर जब भी
सुख दुख फिर बूढे़ बरगद से होने लगे हैं

हाल जानने को मेरे चक्कर लगने लगे हैं 
दिन चिंता के मेरे अब उसके लगने लगे हैं
तलाशता रहता हूँ खुद को अब उनमे ही मै 
जिस दिन से मेरे बच्चे बड़े होने लगे हैं 
मनोज दुबे श्रीकांत

No comments:

Post a Comment

व्यंग

 [12/9/2020, 11:56 AM] Manoj Dubey: आन लाईन कलास का पंगा  कल आन लाईन कलास मे  हमने कैमरा आन करने का  बोला कुछ छातरो का  मन भय से डोला  पंद्र...