महिला दिवस की शुभकामनाएं
तुम मुस्कुराती रहो
तुम मुस्कुराती रहो फूलो सी
मै सुमनगंध बिखेरता रहूँ
खुशियों कै मोतियों को
अपने आंगन मे बिखेरता रहूँ
तुम बुनती गढती रहो ख्वाब
मै साकार उन्हे करता रहूं
दामन तुम्हारा खुशियो से
मै रोज रोज भरता रहूँ
तुम चलती रहो तूलिका सी
मै कैनवास सा होता रहू
जीवन के बेरंग बिम्ब मै
सात रंगो उकेरता रहूँ
तुम होना रिमझिम फुहार
मै सावन सा होता रहूं
मेघदूत सा बन कर प्रिय
प्रेम को बरसाता रहूँ
तुम होना जूही लाजवंती सी
मै बसंत सा होता रहूँ
होकर के रंग हरा लाल
फागुन मे बरसता रहूँ
तुम होना कभी नदियो सी
तो मै सागर सा होता रहूं
क्षितिज बन दूर कही
आकाश धरा सा मिलता रहूँ
जीवन की परिणय बेला मे
मै वचन सात सा होता रहू
थामकर हाथ तुम्हारा धामकर
बस दूर तक चलता ही रहू
तुम होना रिश्तो की कडी सी
मै घर आंगन सा होता रहू
हौ संगनी तुम श्रीकांत की कविता
साथ तुम्हारा ईश से मांगता रहूँ
मनोज दुबे श्रीकांत
तुम मुस्कुराती रहो
तुम मुस्कुराती रहो फूलो सी
मै सुमनगंध बिखेरता रहूँ
खुशियों कै मोतियों को
अपने आंगन मे बिखेरता रहूँ
तुम बुनती गढती रहो ख्वाब
मै साकार उन्हे करता रहूं
दामन तुम्हारा खुशियो से
मै रोज रोज भरता रहूँ
तुम चलती रहो तूलिका सी
मै कैनवास सा होता रहू
जीवन के बेरंग बिम्ब मै
सात रंगो उकेरता रहूँ
तुम होना रिमझिम फुहार
मै सावन सा होता रहूं
मेघदूत सा बन कर प्रिय
प्रेम को बरसाता रहूँ
तुम होना जूही लाजवंती सी
मै बसंत सा होता रहूँ
होकर के रंग हरा लाल
फागुन मे बरसता रहूँ
तुम होना कभी नदियो सी
तो मै सागर सा होता रहूं
क्षितिज बन दूर कही
आकाश धरा सा मिलता रहूँ
जीवन की परिणय बेला मे
मै वचन सात सा होता रहू
थामकर हाथ तुम्हारा धामकर
बस दूर तक चलता ही रहू
तुम होना रिश्तो की कडी सी
मै घर आंगन सा होता रहू
हौ संगनी तुम श्रीकांत की कविता
साथ तुम्हारा ईश से मांगता रहूँ
मनोज दुबे श्रीकांत
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