दिखाएगा रंग कितने तू अपने मुझखो
एक दो तीन चार पाच छह सात मुझको
मैं ढाल लूगा होकर इंद्र धनुष सा रंग
अपने से अलग समझ न तू मुझको
लाल नीला हरा पीला जामुनी हो जा
दमकूगा सफेद सा मिलाकर मे तुझको
चाल रंग ढाल वेष भूषा सब जानता
समझना ऐसा वैसा अब तो तु मुझको
रंग तेरे मेरे सबके मिल जाएँगे श्रीकांत
रंगेगा अपने प्रेम रंग मे जब तु मुझको
मनोज दुबे श्रीकांत
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