भीम बैठका से कलम का सफर
अनुपम प्रकृति और तुम
एक अनुपम सौंदर्य प्रकृति का ओर तुम
पत्ते लताए वृक्ष डाली. पुष्प और तुम
पक्षी चहचहाते फुदकते शाखाओ पर
नीड मे बच्चो का कलरव और तुम
राहे टेढी मेढी सघन वृक्षों से घिरी घिरी
सफर मे मील का पत्थर और तुम
उछल कूद करते वानर दल चोपाए
कोयल मोर चकोर मृगनयनी ओर तुम
उची उची पहाडि़यों का मंजर हसीन
मानव जातिवृत की निशानिया और तुम
दफन इतिहास समय के पन्नो मे वर्षो का
माह बरष शताब्दी और सह शताब्दी तुम
भीम बैठका के पहाडो की कृति श्रीकांत
यादे संस्मरण शब्द मात्रा और कविता तुम
मनोज दुबे श्रीकांत
अनुपम प्रकृति और तुम
एक अनुपम सौंदर्य प्रकृति का ओर तुम
पत्ते लताए वृक्ष डाली. पुष्प और तुम
पक्षी चहचहाते फुदकते शाखाओ पर
नीड मे बच्चो का कलरव और तुम
राहे टेढी मेढी सघन वृक्षों से घिरी घिरी
सफर मे मील का पत्थर और तुम
उछल कूद करते वानर दल चोपाए
कोयल मोर चकोर मृगनयनी ओर तुम
उची उची पहाडि़यों का मंजर हसीन
मानव जातिवृत की निशानिया और तुम
दफन इतिहास समय के पन्नो मे वर्षो का
माह बरष शताब्दी और सह शताब्दी तुम
भीम बैठका के पहाडो की कृति श्रीकांत
यादे संस्मरण शब्द मात्रा और कविता तुम
मनोज दुबे श्रीकांत

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