Monday, April 15, 2019

कविता

व्यंग्य
चुनावी सीख

भैया कल तक पार्क मोहल्ला
 घाट पर फालतू घूमते थे
 आजकल तो बिल्कुल भी
दिखाई नही दे रहे हो लगता है
 आजकल आप लोग
ज्यादा व्यस्त दिख रहै हो
तूमहारा भोकना धमा चोकडी
 करना काउ काऊ करके
 चिल्लाना आजकल बिल्कुल भी
 सुनाई नही दे रहा है
मोहल्ला  गली  घाट पर अब
आपका हल्ला सुनाई नही दे रहा है
दुबे जी आजकल हम पर चुनावी रंग
  इस कदर चढ रहा है
वोट राजनीति रैली भाषण के
सिवाय और कुछ नही सूझ रहा है
भैया आजकल खाना पीना रहना खाना
सब कुछ फी मिल रहा है और जीवन की
 मत पुछो दुबे जीवो तो
बडा मस्त गुजर रहा है
भोकने चिल्लाने रोटी के
लिए लडने की जद्दोजहद
भी कम हो रही है जिदगी अपनी
आजकल चुनावी दोर मे
मतदान सी कट रही है
रात को थक हार के पार्टी
आम सभा के टैट मे ही
सो जाते है पार्टी के नमक
 का कर्ज हम तुरंत उतार देते है
तो हम ने कहा आजकल
तुम बढिया चोकीदार निभा रहै
 हो और हम ने जो तुम है
पाला पोसा बचपन से उसे भुला
रहे हो चुनाव के बाद बेटा हम
तुम्हारा एक एक हिसाब पूर्ण कर
 देगे जी एस टी काट
कर  ही रोटी पानी  देगे
फिर मत हिलाना न दिखाना
पेट न चाटना तलवा और न
करना पहरे दारी  ओर बन
जाना आवारा गरीब कुत्ता
फिर हाथ मिलाउंगा पारटी
नेता रेली कितने
काम आते है बताऊगा
तुम कुत्ते थे कुत्ते और
कुत्ते ही रहोगे न सुधरे हो
न सुधरे थे और न कभी सुधरोगे
दुबे जी आप तो खाम खा गुस्सा हो रहे है
अरे चुनावी माहोल का
आप भी आनंद लीजिये
अपनी बेरोजगारी के दिनो मे
आप भी रोज गार पाईये
चुनाव रैली आमसभा रोड सो मे
रोजाना पाच सो खाना पीना मुफ्त पाइए
मनोज दुबे श्रीकांत

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