Tuesday, January 15, 2019

मुक्त गजल

     
         अजीज है जो
        हर कोई मुझे धोकर चला जाता है
        मोटर गाड़ी कपडा बना जाता  है
       बिना सर्फ ऐरियल के चमकता हूँ मै
       शब्दो से दो चार मुझे कर जाता है
       नजाकत उसकी रह जाती कोने में
       सरेयाम बैनकाब जो कर जाता है
       मै मै और तु तु हैं गालिब जमाने में
       फर्क मुझमे तुझमे हो ही जाता है
       देखता हूँ बानगी हर एक शख्स की
      जोहरी किसी हीरे का हुआ जाता है
     क्या रंग तेरा क्या रंग है मेरा पानी मे
    पानी जो निर्मल निश्चल सा रह जाता है
     जख्म दे दे श्रीकांत जमाने कितने ही
     अजीज है कोई सिराने दवा रख जाता है
    मनोज दुबे श्रीकांत
   
     
   
   
   

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