हे राधे तुम जमना किनारे आ जाती
तान मुरली की मधुर तुम सुन जाती
मै होता तुम होती और न होता कोई
रास उस दिन तुम साथ.रचा जाती
मैं कहता कुछ तुमसे अपने मन की
तुम कुछ अपने मन की कह जाती
होती लहरे जमना जी की कदम पेड
किसी शाम को तुम अकेली आ जाती
कह देता जाने से पहले कुछ बाते तुमसे
तुम मथुरा जानें से पहले मिल जाती
पहुचाया था संदेश लेकर अकरूर जी को
काश तुम मेरे मन को जरा समझ पाती
मनोज दुबे श्रीकांत
तान मुरली की मधुर तुम सुन जाती
मै होता तुम होती और न होता कोई
रास उस दिन तुम साथ.रचा जाती
मैं कहता कुछ तुमसे अपने मन की
तुम कुछ अपने मन की कह जाती
होती लहरे जमना जी की कदम पेड
किसी शाम को तुम अकेली आ जाती
कह देता जाने से पहले कुछ बाते तुमसे
तुम मथुरा जानें से पहले मिल जाती
पहुचाया था संदेश लेकर अकरूर जी को
काश तुम मेरे मन को जरा समझ पाती
मनोज दुबे श्रीकांत
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