Thursday, January 24, 2019

मुक्त गजल

तुम रहो आसपास ही

तुम रहो आस पास मेरे ही जहां मे रहू
तुम चलो मेरे साथ साथ ही जहा मै चलू

चुन लेना वो मोती अरमानो के बरसे जहां
समय की तातो का जाल मै जहा पर बुनू

कर लैना जीवन तरंग मयी सरिता सा तुम
प्रेम सागर सा बन जब जब भी मैं उमडू

कर लेना बाते दो चार जिंदगी की बैठकर
जिस दिन  बैठकर पास  मै सुकून से सुनू

सुख दुख जीवन के पहलू से गुजरनै लगे
जख्म मिलने  पर कभी मैं मरहम सा रहू

थम जाएगा वक्त पल भर देखने को हमे
जब जब जहां भी साथ में  मै तुम्हारे  रहू

चल देना हाथ थामकर श्रीकांत कही भी
जब चाहे जहा जहा मै तुम्हे भी ले चलू

मनोज दुबे श्रीकांत


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