एक तेरा गुस्सा
एक तेरा गुस्सा भी लाजमी था
मै भी तो आखिर आदमी ही था
घर गृहस्थी मे उलझाती रही तु
संसार तो आखिर जाल ही था
तेल शक्कर दाल चावल सब्जी
काटता रहा जैब तो तंगहाली ही था
ये मुआ मुह और दाल मसूर की
ढोऊ गधा गृहस्थी का तो मै ही था
डांटती रही डपटती रही लडती रही
रूठने पर मनाने वाला तो मे ही था
जप तप तेरा रहना दिन दिन भर भूखा
पति तेरा और परमेशवर तो मै ही था
चलती रहे ऐसी ही श्रीकांत अपनी गाडी
एक चका.गृहसथी की तू दूजा मै ही था
मनोज दुबे श्रीकांत
एक तेरा गुस्सा भी लाजमी था
मै भी तो आखिर आदमी ही था
घर गृहस्थी मे उलझाती रही तु
संसार तो आखिर जाल ही था
तेल शक्कर दाल चावल सब्जी
काटता रहा जैब तो तंगहाली ही था
ये मुआ मुह और दाल मसूर की
ढोऊ गधा गृहस्थी का तो मै ही था
डांटती रही डपटती रही लडती रही
रूठने पर मनाने वाला तो मे ही था
जप तप तेरा रहना दिन दिन भर भूखा
पति तेरा और परमेशवर तो मै ही था
चलती रहे ऐसी ही श्रीकांत अपनी गाडी
एक चका.गृहसथी की तू दूजा मै ही था
मनोज दुबे श्रीकांत
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