तलाश पूरी हुई
मिल गया कोई तो तलाश पूरी हुई
आश जीवन की जो मेरी पूरी हुई
हो गए अरमान सारे के सारे पूरे मेरे
गयी रात जब बात उसकी पूरी हुई
वो दरिया समुन्दर झील का किनारा
उस शाम दो दिलो की दूरी कम हुई
खिल गया चांद आकाश मे चुपके से
वो शाम सी जब जब भी सिंदूरी हुईं
खोजता रहा जिसे मै उम्र भर अपनी
वो मेरी किशमत से ही नसीब हुई
ओर कोई नही श्रीकांत वो कविता मेरी
शब्द की साधना से जब तुम पूरी हुई
मनोज दुबे श्रीकांत
मिल गया कोई तो तलाश पूरी हुई
आश जीवन की जो मेरी पूरी हुई
हो गए अरमान सारे के सारे पूरे मेरे
गयी रात जब बात उसकी पूरी हुई
वो दरिया समुन्दर झील का किनारा
उस शाम दो दिलो की दूरी कम हुई
खिल गया चांद आकाश मे चुपके से
वो शाम सी जब जब भी सिंदूरी हुईं
खोजता रहा जिसे मै उम्र भर अपनी
वो मेरी किशमत से ही नसीब हुई
ओर कोई नही श्रीकांत वो कविता मेरी
शब्द की साधना से जब तुम पूरी हुई
मनोज दुबे श्रीकांत
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