तुम बसंती हो जाना
मै प्रेम और तुम रंग बसंती सी हो जाना
मन में तुम अनुराग जगा प्रेम बरसा रंग जाना
खिले कामिनी और मधुमालती आगन में
मन को मेरे तुम सुमन गंध सा महका जाना
हो जाए निस्तब्ध निशा जब कभी कभी
बनकर चाँद तुम मेरे आंगन में उतर जाना
मै हू निर्मल निश्चल नीर सा किसी झील का
रूप सौन्दर्य तुम अपना कभी सवार जाना
बनकर तूलिका चलके कैनवास पर मेरे मन के
खुशियो कै वो सात रंग तुम बिखेर जाना
रितुराज सा श्रीकांत बिखरै जहा होकर बसंत
वहा वहा खिलकर तुम सरसो बसंती हो जाना
मनोज दुबे श्रीकांत
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