Friday, February 8, 2019

गजल

तुम बसंती हो जाना 

मै प्रेम और तुम रंग बसंती सी हो जाना
मन में तुम अनुराग जगा प्रेम बरसा रंग जाना

खिले कामिनी और मधुमालती आगन में
मन को मेरे तुम सुमन गंध सा महका जाना

हो जाए निस्तब्ध निशा जब  कभी कभी 
बनकर चाँद तुम मेरे आंगन में उतर जाना

मै हू निर्मल निश्चल नीर  सा किसी झील का 
 रूप सौन्दर्य तुम अपना कभी सवार  जाना

बनकर तूलिका चलके कैनवास पर मेरे मन के 
 खुशियो कै वो सात रंग  तुम बिखेर जाना 

  रितुराज सा श्रीकांत बिखरै जहा होकर बसंत 
वहा वहा खिलकर  तुम सरसो बसंती हो  जाना

मनोज दुबे श्रीकांत

No comments:

Post a Comment

व्यंग

 [12/9/2020, 11:56 AM] Manoj Dubey: आन लाईन कलास का पंगा  कल आन लाईन कलास मे  हमने कैमरा आन करने का  बोला कुछ छातरो का  मन भय से डोला  पंद्र...