दो ग़ज़ले
1....रंग मेरे
जमाने के रंग देख देख बदला हूँ
आज मै गिरगिट सा हुआ हू
भाप न सका रंग जमाना मेरा
जहा बेठा हूँ उसी रंग का हुआ हूँ
काम क्रोध मद मोह लोभ रंग मेरे
संसार का विकारी सा हुआ हूँ
फास लू शिकार मे कभी भी तुझको
जटिल मकड़जाल जाल सा हुआ हूँ
तू कोन और आया कहा से क्या मतलब
अपने लिए ही स्वार्थी सा हुआ हूँ
मत पूछो मतलब रंग क्यो बदला श्रीकांत
वातावरण के अनूकूल सा हुआ हूँ
2...दरख़्त तेरे आगन का
कई गम खुशी और आसू सहे मैनै
मै तेरे दर्द का हमदर्द हुआ हूँ
करता रहा छाव घनी घर पर तेरे
आगंन की बूढ़ा दरख़्त हुआ हूँ
फैला कर शाखाएं खड़ा रहा तन के
जड़ से इतना मजबूत हुआ हूँ
बिखराई खुशबू फूलो की दिए फल फूल
तेरे परिवार अन्न दाता हुआ हूँ
चुका रहा हूँ मै कर्जा तेरा कई जनमो से
मूलधन चक्रवर्ती ब्याज हुआ हूँ
मिट न सकेका नाम श्रीकांत का कभी
तेरी मिट्टी से ही सोना हुआ हूँ
मनोज दुबे श्रीकांत
1....रंग मेरे
जमाने के रंग देख देख बदला हूँ
आज मै गिरगिट सा हुआ हू
भाप न सका रंग जमाना मेरा
जहा बेठा हूँ उसी रंग का हुआ हूँ
काम क्रोध मद मोह लोभ रंग मेरे
संसार का विकारी सा हुआ हूँ
फास लू शिकार मे कभी भी तुझको
जटिल मकड़जाल जाल सा हुआ हूँ
तू कोन और आया कहा से क्या मतलब
अपने लिए ही स्वार्थी सा हुआ हूँ
मत पूछो मतलब रंग क्यो बदला श्रीकांत
वातावरण के अनूकूल सा हुआ हूँ
2...दरख़्त तेरे आगन का
कई गम खुशी और आसू सहे मैनै
मै तेरे दर्द का हमदर्द हुआ हूँ
करता रहा छाव घनी घर पर तेरे
आगंन की बूढ़ा दरख़्त हुआ हूँ
फैला कर शाखाएं खड़ा रहा तन के
जड़ से इतना मजबूत हुआ हूँ
बिखराई खुशबू फूलो की दिए फल फूल
तेरे परिवार अन्न दाता हुआ हूँ
चुका रहा हूँ मै कर्जा तेरा कई जनमो से
मूलधन चक्रवर्ती ब्याज हुआ हूँ
मिट न सकेका नाम श्रीकांत का कभी
तेरी मिट्टी से ही सोना हुआ हूँ
मनोज दुबे श्रीकांत
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