Thursday, January 17, 2019

ग़ज़ल

              1. तुनक मिजाजी उनकी

जो बात करते थै कभी  हमारे साथ जाने की
उन्हे फुर्सत नही अब हमसे बतियाने की

कुछ शब्दो मे ही हमसे यू किनारा कर गए
हद हो गई उनके इस तुनक मिजाजी की

वो वादे करके कसमे खाते रहे दम भर  कर
जमती रही वादो पर परत दर परत धूल की

डर लगता है  जीवाश्म न बन जाए हम दोनो
बात करेगा जमाना फिर हमारी कई सदियो की

मिट मिट कर सवारता रहा श्रीकांत तशवीरो को
जो सजी थी एल्बम मे सबब सी तेरी यादो की

                2.   तजुर्बा

तजुर्बा ही अपना काबिले तारीफ रहा
जैब  ए  दिनाब से हरदम फखत रहा

बुलंदियों के बुल बांधते रहे हवाओ में
पिलर ए पुल हमेशा धसकता ही रहा

गुजर गए मेरी राहो  से  तीन दो पांच
हम राही  सदा ही नो दो ग्यारह रहा

स्वप्न में भी सुकून न मिलने दिया कभी
चिंताओं की सुई ले  कोई कचोटता  रहा

दोडता रहा राहो पर मंजिलों की आश मे
समय चाबुक दो चार अपने भी लगाता रहा

कसर किसी ने छोडी मुराद पूरी करने की
मिला जो गले उसके हाथो मे  खंजर रहा

क्या गुनाह कर दिया होकर के लाजमी
सितम जिंदगी तेरा भी कोई कम न रहा

मिल जाए आराम कही श्रीकांत दो पल
दरख़्त  घना कोई ताउम्र तलाशता रहा

        3. तुम ऐसी तो न थी

तुम ऐसी तो नही थी जैसे पहले दिखती थी
मेरे मन मंदिर में तुम कोई मूरत सी बस्ती थी

आजकल हो जाती हो जाने क्यो पलाश सी
कभी लाजवंती बन नजाकत से झुकती थी

कभी महकती थी बन मधु मालती मधुकामनी सी
 जाने क्यो कभी मेथी और मिर्ची सी लगती थी

हल्दी कुम कुम सुहाग मंगल सूत्र की मिन्नत सी
तपस्या मे रत  कभी कभी साध्वी सी लगती थी

दिखा देती हो रास्ता कभी कभी वैराग्य का
 अप्सरा मेनका और कभी रंभा सी लगती थी

 लगती थी देखने मे जन्नत की कोई हूर सी कल
बातो मे जाने क्यो अटपटी अटपटी सी लगती थी

क्या करे देख ये परिवर्तन तुम्हारे श्रीकांत आज
गृह लक्ष्मी से पहले  कोई प्रेमिका सी तुम लगती थी


          4. बदलाव

सुना इंसा आजकल कुछ बदल रहे है
खुद के आस्तीन गिरेबान सम्हाल रहे हैं

हो जाते हैं सरे राह बेनकाब लोगो से
आज उन्ही के दिलो को सम्हाल रहे हैं

पूछते फिर रहे हाल ए तबियत  उनसे
लोग जो मरहम चोटो पर लगा रहे हैं

सुना है पास ही के घर मे रहमत बरसती
न जाने क्यूँ फिर खुदा के घर जा रहे हैं

एक फूल रख लेना किताबो के बीच उनका
कल जो विदा होकर अपने घर जा रहे हैं

याद कुछ कुछ है श्रीकांत उन दिनो की ही
दिन आजकल  के तो हवा हुए जा रहे हैं

       5. क्या दोगे राम को जवाब

छोडकर राम को कहा जाओगे
अपने अंदर ही राम  को पाओगे

दोगे हिसाब जाकर के ऊपर क्या
क्या राम से ही झूठ बोल पाओगे

क्या कसमे और क्या वादे मंदिर के
बेईमान हो  किसे मुह दिखाओगै

पडे रहेगे बंगले मोटर और गाडी
सवार हो कंधो पर जब जाओगे

वोट पाकर फरेबी से पा ली कुर्सी
बाधकर क्या ऊपर ले जाओगे

राम दे देगे गर जरा आराम तुम्हे
नाम फिर राम का किसे सुनाओगे

वादा खिलाफी  ठीक नही श्रीकांत
राम के बिना वहा कैसे जाओगे


         6. प्रैमिका सी हो जाओ


छोडकर चोका चूल्हा तुम मेरे पास बैठ जाओ
त्याग कर गृहस्थी सब तुम मेरे साथ आ जाओ

होकर के रही तुम बेहतर पत्नी जीवन भर मेरे
दो पल के लिए प्रेमिका  सी कालेज की हो जाओ

छोडकर सब्जी भाजी नमक मिर्ची तेल के नगमे
गजल फिर कालेज की टिपटी की सुना जाओ

बदलकर लिबास अपना साडी और ब्लाउज का
लाल हरे रंग का शूट और रेशमी दुपट्टे मे आ जाओ

छोडकर चिंता भविष्य पैसो बच्चो ओर दुनिया की
बाटनी की किताब का रखा गुलाब सी हो जाओ।

गुनगुनाने ले कविता श्रीकांत तुम्हे मन से अपने भी
गीत गजल कविता सा मै और तरन्नुम  तुम हो जाओ

          7. प्रियतुम  रूठकर मान जाया करो


बात करती  हो रूठ जाने कीकभी मान भी जाया करो
छोटी छोटी गलतियों को नजर अंदाज कर जाया करो

दिए थे वचन दोनो ने अग्नि के सामने ही एक दूजे को
 कभी मै रूठू तो तुम सहज ही  मुझसे मान जाया करो

खटपट होती है विचारो की मन में कभी कभी अपनो में
कभी उग्र हो जाऊ तो कभी शांत तुम ही हो जाया करो

क्या मेरा क्या तुम्हारा है प्रिय इस गृहस्थी के जीवन में
कभी मै प्राणप्रिय तो कभी तुम सर्वेशवर हो जाया करो

लगा रहता है जीवन में सुख दुख धूप छाव सा जीवन में
कभी मै बरगद तो तो तुम नीम आगन की हो जाया करो

मै रहूगा साथ साथ सदा तुम्हारे ही श्रीकांत हर जन्म मे
मै राही और  तुम हमराही  मेरे जीवन की  बन जाया करो


           8.फुर्सत मिले तुम्हे


चाय मे  थोड़ी चीनी कम मिलाया करो
बात प्रेम के मिठास वाली की किया करो

नमक मिर्च तेल  और हल्दी को छोड़कर
कभी कभी कुंकुम मोती बिंदी हो जाया करो

निकलकर कभी कभी किचन से बाहर
कालेज की रोड पर साथ में चला करो

कैलेनडर पलटती रहती हो हिसाब मे
चोदह फरवरी को थोड़ा रुक जाया करो

देखती है अब भी वो टिपटी पेड की तुम्हे
तुम वनस्पति की किताब हो जाया करो

इंतजार आज भी करता है श्रीकांत वैसे ही
कालेज के जमाने मे कभी लोट आया करो

            9. बात इश्क की किया न करो


बात इश्क की जमाने से तुम न किया करो
अपने आपको आईने में देख लिया करो

तेरे दर पर तो पहरे  हजार लगा कर बैठे
मुझे झरोखो से तुम  छुप  कर देखा न करो

भागती हो  डरती शहमती अक्सर  डायरी में
हकीकतो मे कभी साथ  मेरे हो लिया करो

बंद है  रिवाज कागज में  प्रेम पत्र लिखने का
कभी मोबाइल पर आन लाइन हो जाया करो

ढूंढती हो बहाने क्यो मिलने के श्रीकांत से
 तुम गीत गजल  और कविता  हो जाया करो




           10 अभिनंदन हो


नव वर्ष  तुम्हारा अभिनंदन हो
नूतन दिवस  शुभ मंगल  हो

सुख दुख सब रहे सम जीवन
 इस साल ऐसे गृह नक्षत्र हो

दिन सिदूरी शाम सुनहरी
रात शीतल चांदनी हो

बयार हो सुमनगंध सी
 प्रेम रंग बसंत उत्सव हो

मिल जाए सब सहज ही
आशीष बड़े बुजुर्गों का हो

दुख तीखी धूप रहे तो
सुख छाव नीम बरगद हो

अभिनंदन करे श्रीकांत
तुम्हारा पसारे वाहे नित ही

मै रहू चाहे धूमिल गर्त सा
आगाज तुम्हारा स्वर्णिम हो

मनोज दुबे श्रीकांत

3 comments:

  1. ग़ज़ल कहना आसान नहीं होता...... इसमें क़ाफिया , रदीफ़ , मात्रा , बह्र......आदि तमाम बारीकियों का हिसाब रखना लाज़मी रहता है....... इसे यूँ ही दुनिया की सबसे कठिन काव्यविधा नहीं कहा जाता....... आइंदा ग़ज़ल लेखन के पूर्व आप उसके लिखने की विधि का गहराई से अध्ययन करें......

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  2. इन रचनाओं में सुधार कर और निखारूगा

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