कविता आज भी
वो आज भी मेरी कविता चुपचाप पढती होगी
गीत गजलों को मन ही मन में गुनगुनाती होगी
शरमा के रख लेती होगी पल्लू मुंह में अपना
जब प्रेम और श्रृंगार की रचना को पढ़ती होगी
उसकी आंखों में होती होगी एक विशेष चमक
जब कभी वो मुस्कान होठों पर अपने लाती होगी
वह बनाती होगी आशियाना अपने सपनो का
जब कभी वो मन से मेरे आस पास रहती होगी
मैं अजनबी हूं ना वह अजनबी है मेरे लिए अब
पल भर के लिए वो मेरे बारे मे सोचती होगी
वो और कोई नहीं श्रीकांत मेरी है कविता
साहित्य में जो मेरे अलंकारों को गढती होगी
मनोज दुबे श्रीकांत
वो आज भी मेरी कविता चुपचाप पढती होगी
गीत गजलों को मन ही मन में गुनगुनाती होगी
शरमा के रख लेती होगी पल्लू मुंह में अपना
जब प्रेम और श्रृंगार की रचना को पढ़ती होगी
उसकी आंखों में होती होगी एक विशेष चमक
जब कभी वो मुस्कान होठों पर अपने लाती होगी
वह बनाती होगी आशियाना अपने सपनो का
जब कभी वो मन से मेरे आस पास रहती होगी
मैं अजनबी हूं ना वह अजनबी है मेरे लिए अब
पल भर के लिए वो मेरे बारे मे सोचती होगी
वो और कोई नहीं श्रीकांत मेरी है कविता
साहित्य में जो मेरे अलंकारों को गढती होगी
मनोज दुबे श्रीकांत
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