Sunday, April 19, 2020

गज़ल

             कविता आज भी

 वो आज भी मेरी कविता चुपचाप पढती होगी
 गीत गजलों को मन ही मन में गुनगुनाती होगी

 शरमा  के रख लेती होगी पल्लू मुंह में अपना
 जब  प्रेम और श्रृंगार की रचना को पढ़ती  होगी

उसकी आंखों में होती होगी एक विशेष चमक
  जब कभी वो मुस्कान होठों पर अपने लाती होगी

 वह बनाती होगी आशियाना अपने सपनो का
 जब कभी वो मन से मेरे आस पास  रहती होगी

 मैं अजनबी हूं ना वह अजनबी है मेरे लिए अब
  पल भर के लिए  वो  मेरे बारे मे सोचती  होगी

वो और कोई नहीं   श्रीकांत मेरी है कविता
साहित्य में   जो मेरे अलंकारों  को  गढती  होगी

मनोज दुबे श्रीकांत

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